शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] कर्नाटक : हिंदी विरोध का नाटक -समाचार, पत्राचार और विचार |


कर्नाटक :  हिंदी विरोध का नाटक ।
समाचार

   

पत्राचार

 

 ​  

विचार​

कर्नाटक में हिंदी विरोध की राजनीति पर निर्मल पाटोदी तथा ​प्रो. देविदास प्रभु​ के लेखों पर कुछ अभिमत ।

1.डॉ. परमानंद पांचाल pnpanchal30@gmail.com
खेद हॆ कि कुछ लोगों को देश की बढती एकता पसंद नहीं आरही हॆ।          
2.लोचन मखीजा  lochan.makhija @gmail.com
नमस्कार,  आपकी सभी बातें सही हैं और यह सत्य वे सभी लोग जानते हैं, जो ये दुष्प्रचार कर रहे हैं। 

इस राष्ट्र विरोधी मुहिम  का भाषाई चिंतन या भाषा प्रेम से कुछ भी लेना-देना नहीं है, यह उनकी मज़बूरी है, क्योंकि कर्नाटक में चुनाव  नज़दीक हैं..... 

अब सही हो या गलत, राष्ट्र के हित में हो या न हो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। बस, चुनाव जीतने के लिए कोई भावनात्मक मुद्दा चाहिए था,   सो मिल गया... आप और हम करते रहें राष्ट्रहित की बातें.... उन्हें तो बस अपना उल्लू सीधा करना है, सो कर रहे हैं.....

3.sunita kamboj's profile photo सुनीता कंबोज  - sunitakamboj31@gmail.com

सादर नमन सर... हमारा देश अब भी अंग्रेजी की गुलामी कर रहा है । जब तक हम अपनी भाषा को महत्व नहीं देंदे तब तब हमारे देश की उन्नति सम्भव नहीं । जय हिन्दी ..यह प्रयास अवश्य सफल होगा ।
4.chetna upadhyay's profile photo चेतना उपाध्याय, Ajmer, Rajasthan, India chetnaupadhyay14 @gmail.com
वाह ,हार्दिक साधुवाद ,अभिनंदन ।अमिट सत्य उजागर करने हुए हेतु

5.Pushpendra Dubey's profile photo पुष्पेंद्र दुबे - डॉ पुष्पेन्द्र दुबे,प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष(हिंदी) महाराजा रणजीतसिंह कॉलेज ऑफ़ प्रोफेशनल साईंसेस, इंदौर, prof.pushpendra @gmail.com
हमें संघर्ष नहीं सहयोग की राह पर चलने का प्रयास करना चाहिए।  हिंदी का प्रचार करते समय यह सन्देश कदापि नहीं जाना चाहिए कि वह अन्य भाषाओं की विरोधी है।  दक्षिण भारतीय भाषाओं और हिंदी भाषाओँ के प्रश्न को लिपि से हल किया जा सकता है।  कन्नड़ प्रेमी अपनी बात को कर्नाटक के लोगों तक पहुँचाने के लिए कन्नड़ लिपि का प्रयोग करें और देश के अन्य भागों में अपनी बात को देवनागरी लिपि में भेजें।  इस प्रकार से आपसी समझबूझ से नागरी लिपि को संपर्क लिपि में विकसित किया जा सकता है।  कर्नाटक से विश्वनागरी पत्रिका प्रकाशित होती है।  उसमें कन्नड़ लिपि के साथ नागरी में भी लेख दिए जाते हैं।  विज्ञान के ज़माने में संघर्ष का जमाना चला गया है, सहयोग और समन्वय का जमाना आ गया है। इंदौर में श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति ने पिछले दिनों 'नागरी लिपि प्रकोष्ठ' की स्थापना की है

6.अनिल कुमार साहू 
7.प्रो. देविदास प्रभु ने बेंगलूरु के हिंदी विरोधी षड़यंत्र पर सटीक टिप्पणी की है। साधुवाद।
जोगा सिंह विर्क -  ਬਿ-ਡਾਕ:  ਸਿੰਘ, ਐਮ.ਏ., ਐਮ.ਫਿਲ., ਪੀ-ਐਚ.ਡੀ. (ਯੌਰਕ, ਯੂ.ਕੇ.),ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਅਤੇ ਸਾਬਕਾ ਮੁਖੀ, ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਗਿਆਨ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਕੋਸ਼ਕਾਰੀ ਵਿਭਾਗ ਕਾਮਨਵੈਲਥ ਵਜੀਫਾ ਪ੍ਰਾਪਤ (1990-93),ਸਾਬਕਾ ਡਾਇਰੈਕਟਰ, ਸੈਂਟਰ ਫਾਰ ਡਾਇਸਪੋਰਾ ਸਟੱਡੀਜ਼,ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ, ਪਟਿਆਲਾ - 147 002 (ਪੰਜਾਬ) - ਭਾਰਤ।,ਜੇਬੀ: +91-9915709582  jogasinghvirk@yahoo.co.in,  virkjoga5@gmail.com,
हिंदी समर्थन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारतीयों को हिंदी सीखने के लिए तो बहुत कहा जाता है पर हिंदी भाषी क्षेत्र में जैसे अंग्रेजी हिंदी को खा रही है उसके लिए जो राजनैतिक शक्तियां और सरकारें जिम्मेदार हैं उनका भी पूरा समर्थन किया जाता है| ऐसे में हिंदी प्रेम एक दिखावा मात्र बन जाता है| हिंदी के विकास के लिए सबसे जरूरी है कि हिंदी भाषी बच्चों को शिक्षा हिंदी माध्यम में प्राप्त हो| इस लिए पहले इस समस्या का निदान करना होगा । 
8. उत्कर्ष - अंग्रेजी, अंग्रेजों की  'बांटो और राज करो' की नीति पर चलते हुए भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा कर सब को लीलती जा रही है। देश की एकता पर प्रहार करती जा रही है। पर लोभी- उन्मादी भाषा-प्रमियों और नेताओं को क्या इतनी सी बात समझ नहीं आ रही है? या फिर इनकी रीजनीति अपने लाभ के लिए लोगों को लड़वा रही है।
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता; संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच 
email: murarkasampatdevii@gmail.com  
.लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
 M. N. 09703982136

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