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शनिवार, 8 अगस्त 2020

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन ? वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 1, वेद प्रताप वैदिक, राहुल देव तथा आर.के. सिन्हा

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नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन... ?
वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 1

नई शिक्षा नीति बनाकर सरकार ने सराहनीय कार्य किया है लेकिन ऐसा करने में उसने छह साल क्यों लगा दिए ? उसके छह साल लग गए याने शिक्षा के मामले में उसका दिमाग बिल्कुल खाली था ? शून्य था ? क्या सचमुच ऐसा था ? नहीं ! भाजपा पहले दिन से भारत की शिक्षा-प्रणाली के सुधार पर जोर दे रही है। भाजपा के पहले जनसंघ और जनसंघ के पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मैकाले की शिक्षा-प्रणाली का डटकर विरोध करता रहा है और कांग्रेस सरकारों की शिक्षा-नीति में कई बुनियादी सुधार सुझाता रहा है। लेकिन इस नई शिक्षा नीति को मोटे तौर पर देखने से यह पता नहीं चलता कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन कैसे होंगे ? 

कुछ संशोधन और परिवर्तन तो शिक्षा के ढांचे को अवश्य सुधारेंगे लेकिन देखना यह है कि यह नई शिक्षा-व्यवस्था 'इंडिया' और 'भारत' के बीच अब तक जो दीवार खड़ी की गई है, उसे तोड़ पाएगी या नहीं ? देश के निजी स्कूलों और कालेजों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े छात्र ‘इंडिया’ हैं और सरकार के टाटपट्टी स्कूलों में पढ़े हुए ग्रामीणों, गरीबों, पिछड़ों के बच्चे ‘भारत’ हैं। इस भारत की छाती पर ही इंडिया सवार रहता है।

इस दोमुंही शिक्षा नीति का खात्मा कैसे हो ? इसका आसान तरीका तो यह है कि देश के सारे गैर-सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। संपूर्ण शिक्षा का सरकारीकरण कर दिया जाए। ऐसा करने के कई दुष्परिणाम हो सकते हैं। इसमें कई व्यावहारिक कठिनाइयां भी हैं लेकिन देश में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का एक नायाब तरीका मैंने 5-6 साल पहले सुझाया था, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाद में अपने फैसले की तौर पर घोषित कर दिया था। वह सुझाव यह है कि राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक जितने भी लोग सरकारी तनखा पाते हैं, उनके बच्चों की पढ़ाई अनिवार्य रुप से सरकारी स्कूलों और कालेजों में ही होनी चाहिए। देखिए, फिर क्या चमत्कार होता है ? रातोंरात शिक्षा के स्तर में सुधार हो जाएगा। यदि हमारा शिक्षा मंत्रालय कम से कम इतना ही करे कि यह बता दे कि हमारे कितने न्यायाधीशों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, पार्षदो, अफसरों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी शिक्षा-संस्था में पढ़ते हैं ? ये आंकड़े ही हमारी आंखें खोल देंगे। यदि हमें भारत को महान और महाशक्ति राष्ट्र बनाना है तो इस दोमुंही शिक्षा नीति को ध्वस्त करना होगा। 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
वरिष्ठ पत्रकार, विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष व भारतीय भाषा समर्थक।
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यह निश्चय ही क्रांतिकारी और अनिवार्य कदम होगा। आशा है यह निजी विद्यालयों पर भी समान रूप से लागू होगा। इसके बिना न प्रभावी होगा न अंग्रेजी का घातक वर्चस्व खत्म हो पाएगा। शिक्षा में सामाजिक व भाषिक विषमता मिटाने तथा उसे समतामूलक बनाने के लक्ष्य की भी यही माँग है।
नयी शिक्षा नीति के बारे में ख़बर है कि पाँचवीं कक्षा तक अंग्रेज़ी की पढ़ाई नहीं होगी। पाँचवी तक बच्चे हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में पढ़ेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार का शिक्षा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी क़दम है।
राहुल देव
वरिष्ठ पत्रकार
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नई शिक्षा नीति-2020 की घोषणा हो गई है। इसके विभिन्न बिन्दुओं पर बहस तो होगी ही । पर इसने एक बड़े और महत्वपूर्ण दिशा में कदम बढ़ाने का इरादा व्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में नई शिक्षा नीति में पाँचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को ही पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है।इसे क्लास आठ या उससे आगे तक भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी स्तर से होगी। नई शिक्षा नीति में यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को विद्यार्थियों पर जबरदस्ती थोपा नहीं जाएगा।

मातृभाषा में बच्चा तत्काल ग्रहण करता है> यह बार-बार सिद्ध हो चुका है कि बच्चा सबसे आराम से सहज भाव से अपनी भाषा में पढाए जाने पर उसे तत्काल ग्रहण करता है । जैसे ही उसे मातृभाषा की जगह किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाने लगता है, तब ही गड़बड़ चालू हो जाती है। जो बच्चे अपनी मातृभाषा में शुरू से ही पढ़ना चालू करते हैं उनके लिए शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावनाएं अधिक प्रबल रहती हैं। यानि बच्चे जिस भाषा को घर में अपने अभिभावकों, भाई-बहनों, मित्रों के साथ बोलते हैं उसमें ही उन्हें पढ़ने में उन्हें अधिक सुविधा रहती है । पर हमारे यहाँ तो कुछ दशकों से अंग्रेजी के माध्यम से स्कूली शिक्षा लेने-देने की महामारी ने अखिल भारतीय स्वरुप ले रखा था ।

क्या आप मानेंगे कि जम्मू-कश्मीर तथा नागालैंड ने अपने सभी स्कूलों में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही किया हुआ है? महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडू, बंगाल समेत कुछ अन्य राज्यों में छात्रों को विकल्प दिए जाते रहे कि वे चाहे तो अपनी पढाई का माध्यम अंग्रेजी रख सकते हैं । यानि उन्हें अपनी मातृभाषा से दूर करने के सरकारी स्तर पर ही प्रयास हुए लेकिन, यह स्थिति अब ख़त्म होगी ।

कोई भी देश तब ही तेजी से आगे बढ़ सकता है, जब उसके नौनिहाल अपनी जुबान में ही पढ़ाई शुरू करने का सौभाग्य पाते हैं। और, बच्चों को नर्सरी से पांचवी कक्षा तक की प्रारंभिक शिक्षा यदिउसी भाषा में दी जाय जो वह अपने घर में अपनी माँ और दादा-दादी से बोलना पसंद करता है तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता ।

आपको जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपने लिए खास जगह बनाने वाली अनेक हस्तियां मिल जाएंगी जिन्होंने अपनी प्राइमरी शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही ग्रहण की। इनमें गुरुदेव रविन्द्र नाथ टेगौर से लेकर प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और बाबा साहेब अंबेडकर शामिल हैं। गुरुदेव रविन्द्र नाथ टेगोर की शुरूआती शिक्षा का श्रीगणेश अपने उत्तर कलकत्ता के घर में ही हुआ। उनके परिवार में बांग्ला भाषा ही बोली जाती थी। उन्होंने जिस स्कूल में दाखिला लिया, वहां पर भी पढ़ाई का माध्यम बांग्ला ही था। यानी बंगाल की धरती की भाषा। देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद की आरंभिक शिक्षा बिहार के सीवान जिले के अपने गांव जीरादेई में ही हुई। उधर तब तक अंग्रेजी का नामोनिशान भी नहीं था। उन्होंने स्कूल में हिन्दी, संस्कृत और फारसी पढ़ी। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कोलकात्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से ली। बाबा साहेब की प्राथमिक शिक्षा सतारा, महाराष्ट्र के एक सामान्य स्कूल से हुई। उधर पढ़ाई का माध्यम मराठी था। भारत की चोटी की इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सक्रिय लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमेन रहे ए.वी.नाईक का संबंध दक्षिण गुजरात से है। उन्हें अपने इंदहल गांव के प्राइमरी स्कूली में दाखिला दिलवाया गया। वहां पर उन्होंने पांचवीं तक गुजराती, हिन्दी, सामाजिक ज्ञान जैसे विषय पढ़े। अंग्रेजी से उनका संबंध स्थापित हुआ आठवीं कक्षा में आने के बाद। नटराजन चंद्रशेखरन टाटा समूह के नए चेयरमेन नटराजन चंद्रशेखरन के नाम की घोषणा हुई। तब कुछ समाचार पत्रों ने उनका जीवन परिचय देते हुए लिखा कि चंद्रशेखरन जी ने अपनी स्कूली शिक्षा अपनी मातृभाषा तमिल में ग्रहण की थी।उन्होंने स्कूल के बाद इंजीनियरिंग की डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल की। यह जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण थी। खास इस दृष्टि से थी कि तमिल भाषा से स्कूली शिक्षा लेने वाले विद्यार्थी ने आगे चलकर अंग्रेजी में भी महारत हासिल किया और कैरियर के शिखर को छुआ। प्रसून जोशी बेशक, एड गुरु और गीतकार प्रसून जोशी के पिता उत्तर प्रदेश में एक सरकारी स्कूल के अध्यापक थे। इसलिए उन्होंने जगह-जगह तबादले होते रहते थे। इसके चलते प्रसून ने मेरठ, गोपेश्वर, हापुड़ वगैरह के सरकारी स्कूलों में विशुद्ध हिन्दी माध्यम से अपनी स्कूली शिक्षा लेनी शुरू की थी। वे कहते है कि अगर उन्होंने स्कूली दिनों में हिन्दी का बढ़िया तरीके से अध्ययन न किया होता तो वे एड की दुनिया में अपने पैर नहीं जमा पाते।

भारत में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने की अंधी दौड़ के चलते अधिकतर बच्चे असली शिक्षा को पाने के आनंद से वंचित रह जाते हैं। दिक्कत ये है कि अधिकतर अंग्रेजी के मास्टरजी तो अंग्रेजी की व्याकरण से स्वयं ही वाकिफ नहीं होते। शिक्षा का असली आनंद बहरहाल, आप असली शिक्षा का आनंद तो तब ही पा सकते हैं,जब आपने कम से कम पांचवीं तक की शिक्षा अपनी मातृभाषा में हासिल की हो। ऐसे सौभाग्यशाली लोगों में मैं भी शामिल हूँ और मुझे इस बात पर गर्व है ।

स्पष्ट कर दूं कि अंग्रेजी का कोई विरोध नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा या अध्ययन को लेकर कोई आपत्ति भी नहीं है। मसला यह है कि हम अपनी मातृभाषा, चाहे हिन्दी, तमिल, बांग्ला असमिया, उड़िया, तेलगू, मलयालम, मराठी, गुजरती में प्राइमरी स्कूली शिक्षा देने के संबंध में कब गंभीर होंगे? अब नई शिक्षा नीति के लागू होने से स्थिति बदलेगी। अभी तक तो हम बच्चों को सही माने में शिक्षा तो नहीं दे रहे थे। हां, शिक्षा के नाम पर प्रमाणपत्र जरूर दिलवा देते थे। शिक्षा का अर्थ है ज्ञान। बच्चे को ज्ञान कहां मिला? हम तो उन्हें नौकरी पाने के लिए तैयार करते रहते हैं।

हमारे य़हां पर दुर्भाग्यवश स्कूली या कॉलेज शिक्षा का अर्थ नौकरी पाने से अधिक कुछ नहीं रहा है। स्कूली शिक्षा में बच्चों को मातृभाषा से इतर किसी अन्य भाषा में पढ़ाना उनके साथ अन्याय करने से कम नहीं है। यह मानसिक प्रताड़ना के अतिरिक्त और क्या है ? शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है, दूसरा, उसे उत्तम नागरिक़ तथा तीसरा, परिवार को पालन पोषण करने योग्य और अंतिम सुख की प्राप्ति कराना है। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं।

क्या जो शिक्षा हमारे देश के करोड़ों बच्चों को मिलती रही है उससे उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हो हुई? नहीं। इधर तो व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रहा । जब इस तरह की सोच के साथ हम शिक्षा का प्रसार-प्रचार करेंगे तो मातृभाषा की अनदेखी स्वाभाविक ही है। बहरहाल, अब लगता है कि हालात बदलेंगे।

आर.के. सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)
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( इसी विषय पर संगोष्ठी अगले भागों में भी जारी रहेगी। )

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मंगलवार, 28 जुलाई 2020

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] अरथु अमित अति आखर थोरे - गिरीश्वर मिश्र

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अरथु अमित अति आखर थोरे
गिरीश्वर मिश्र
 पिछली पांच सदियों से  भारतीय लोक जीवन में मूल्यगत चेतना के निर्माण में गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ का सतत योगदान अविस्मरणीय है. लोक भाषा की इस सशक्त रचना द्वारा  सांस्कृतिक जागरण का  जैसा  कार्य संभव हुआ वैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता  है. ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई सुरसरि सम सब कर हित होई’  की प्रतिज्ञा के साथ कविता को जन-कल्याणकारिणी घोषित करते हुए गोस्वामी जी ने काव्य के प्रयोजन को पहले की शास्त्रीय परम्परा से अलग हट कर एक नया आधार दिया. एक विशाल मानवीय चेतना की परिधि में भक्ति के विचार को  जन-जन के हृदय तक पहुंचाते हुए गोस्वामी जी हमारे सामने एक लोकदर्शी दृष्टि वाले कवि के रूप में उपस्थित होते हैं. वे जनसाधारण की ‘भाखा’ अवधी और भोजपुरी का उपयोग करते हुए जीवंत भंगिमा और ग्राम्य परिवेश के बीच जीवन के सत्य की एक असाधारण और अलौकिक, पर हृदयग्राही छवि उकेर सके थे. उनके शब्द-चयन में एक ऐसी दुर्निवार किस्म की संगीतात्मकता  और ऐसी लय  है  कि पढिए तो ( बिना अर्थ समझे भी !) उसे गाने और झूमने का मन करने लगता है. पारिवारिक जीवन, मित्रता, सत्संगति, सामाजिक जीवन और राजनय जैसे विषयों को समेटते हुए  लोक में रमते हुए तुलसीदास जी ने लोकोत्तर का जो संधान किया उसमें एक ओर यदि  दर्शन की ऊंचाई दिखती  है तो दूसरी ओर रस की गहरी और स्निग्ध तरलता भी प्रवाहित होती मिलती है. विष्णु के अवतार श्रीराम के लीला-काव्य में सशक्त भाषा और शब्द-प्रयोग का यह अद्भुत जादू ही है कि उनके दोहे और चौपाइयां शिक्षित और गंवार सभी तरह के लोगों की जुबान पर आज भी छाए हुए हैं और प्रमाण और व्याख्या के रूप में उद्धृत होते रहते हैं और उनकी कथा के नाना संस्करण प्रचलित हैं. उनकी रचनाओं का विश्लेषण अनेक दृष्टियों से किया गया है. विशेष रूप से धर्म (हिंदू !) के उन्नायक!, लोक मंगल के प्रतिष्ठाता, राजनैतिक माडल के प्रस्तोता (राम राज्य!) और काव्य-शास्त्र की उपलब्धि आदि  के कोणों से अध्येताओं ने विचार किया है और दोष-गुण का काफी पर्यालोचन किया  है. पर एक पाठक को उनकी सीधे-सीधे सम्बोधित करती है. मानस को पढ कर या उसकी कथा को सुन कर चित्त उद्वेलित बिना नहीं रह सकता और रचना चेतना  का संस्कार  करती चलती है.
यह गोस्वामी जी की रचनात्मक प्रतिभा  ही थी कि अनेक वृत्तों में अनेक वक्ताओं द्वारा कही गई जन्म जन्मांतरों को समेटती हुई राम-कथा ऐसे मनोरम ढंग से प्रस्तुत हुई कि वह जन मन के रंजन के साथ ही  भक्ति कि धारा में स्नान कराने वाली पावन सरिता  भी बन गई . मानस  में पहले से चली आ रही राम-कथा में कई प्रयोग भी किए गए हैं और ब्योरे में जाएं तो उसकी प्रस्तुति पर देश-काल की अमिट छाप भी पग-पग पर मिलती है . कई-कई तह के संवादों के बीच गुजरती हुई राम-कथा काव्य शास्त्रियों के लिए इस अर्थ में चुनौती भी देती है कि वह प्रबंधकाव्य के स्वीकृत रचना विधान का अतिक्रमण करती है. राम मय होने के लिए तुलसीदास जी ने राम लीला का आरम्भ किया और तदनुरूप जरूरी  दृश्य विधान को अपनाते हुए ‘ रामचरितमानस’ की प्रेषणीयता को सहज साध्य बना दिया है. वस्तुत: दृश्य और पाठ्य अंशों का विनियोग तुलसीदास जी ने जिस खूबी से किया है वह इसे पाठक के लिए अनुभव-निकट बनाने और रसास्वादन  में बड़ी सहायक हुई है. पूरी रचना में कवि सूत्रधार की तरह आता रहता है और पाठक को सम्बोधित भी करता रहता है और यह सब विना किसी व्यवधान के स्वाभाविक प्रवाह में  होता है . ऐसा इसलिए भी हो पाता है क्योंकि तुलसीदास जी  सिर्फ पुराण की कथा को पुन: प्रस्तुत ही नहीं करते  बल्कि  उसमें कुछ और भी शामिल कर नई रचना के रूप में उसे अधिक संवेदनीय बना कर पहुंचाते हैं.
यह भी गौर तलब है कि भक्त कवि तुलसीदास का मन  लोक में भी अवस्थित है. वह अपने समय की चिंता से भी आकुल हैं और समकालीन समाज में व्याप्त हो रहे अंधकार से लड़ने का साहस जुटाने का यत्न भी किया  है . वे  यह  मान कर चलते हैं कि उद्धार सम्भव है क्योंकि मनुष्य के रूप में जन्म लेना पुण्य का प्रताप होता है और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. पर यह मानव जन्म साधन धाम है जिसका सदुपयोग करना चाहिए : 
बड़े भाग मानुष तन पावा सुरदुर्लभ सद्ग्रन्थहि गावा , साधनधाम मोच्छ कर द्वारा पाइ न जेहि परलोक संवारा . 
मनुष्य का शरीर अतुलनीय है जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता  इसलिए  कल्याण के पथ पर अग्रसर होना चाहिए : नर तन सम नहिं कवनौ देही , जीव चराचर जांचत तेही. नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी , ग्यान विराग भगति सुख देनी.  एक मनुष्य के रूप में आचरण के लिए सबसे  बड़ा धर्म दूसरों का कल्याण करना है: परहित सरिस धर्म नहीं भाई , पर पीड़ा सम नहिं अधमाई . गोस्वामी जी  का दृढ विश्वास है कि अग्यान और भ्रम के कारण सांसारिक सुख प्रीतिकर हो जाता है और यह भूल जाता है कि मनुष्य ईश्वर का अंश, सदा रहने वाला, चेतन ज्ञान-स्वरूप है और सुख-राशि है : ईश्वर अंस जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी . परमात्मा से विमुखता ही मनुष्य जीवन की मूल समस्या है , उनकी ओर दृष्टि होने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं: सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं, जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं.
अत: लोक में अवस्थित रह्ते हुए  राम-कथा की प्रस्तुति का उपक्रम ईश्वर और मनुष्य के बीच की खाई को पाटने,  उन्हें एक दूसरे के करीब लाने और अनुभव का हिस्सा बनाने के लिए किया गया. उनके श्रीराम जीवन भर संघर्षों के बीच और हर तरह की मानवीय जीवन की व्यथा को सहते हुए निखरते हैं. राम सबके हैं और सब जगह उपस्थित हैं- सिया राम मय सब जग जानी . सर्वव्यापी राम सर्वजनसुलभ भी हैं. यह जरूर है कि राममय होने के लिए एक खास तरह के विवेक की जरूरत पड़ती है जो मानस में अपने को डुबोने से या कहें राममय होने से  ही आ सकती है. रामचरितमानस के विशाल कलेवर में मनुष्य जीवन के विस्तृत परिसर में पारस्परिक सम्बंधों के उतार-चढाव और अंतर्द्वंद का जैसा सजीव चित्रण हुआ है वह अन्यत्र दुर्लभ है. श्रीराम इन सबके केंद्र में हैं. वे गांव, नगर, वन,पर्वत जहां कहीं जाते हैं, वहां उपस्थित सबसे उनका रिश्ता बन जाता है . वह सभी रिश्तों को निभाते हैं.  वे निर्मल सहजता के प्रतीक हैं और और सबसे आत्मीयता रखना ही उनके जीवन का मूल सूत्र है.
सम्प्रदायों और मतों के दायरे से ऊपर उठते हुए तुलसी आम मनुष्य की पीड़ा से उद्वेलित हैं और उनकी भक्ति उसी के समाधान का उपाय प्रस्तुत करती है. उनका राम-राज्य राजनैतिक कम आध्यात्मिक स्तर पर जीवन्तता की सृष्टि करता है. व्यष्टि और समष्टि दोनों परस्पर सम्बन्धित हैं और एक दूसरे पर अवलम्बित हैं. राम का स्नेह ऐसा होता है कि स्नेहपात्र  इतना परिव्यापनशील हो उठता  है कि राम को ही बांध लेता है .  तभी तो ऐसे राम जिनको सकल जगत जपता है वे स्वयं भरत का जप करते दिखते हैं: भरत सरिस को राम सनेही , जगु जप राम रामु जपु जेही . राम चरित मानस के अयोध्या कांड मे भरत वचन की आशंसा कते हुए कहा गया है : 
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे , अरथु अमित अति आखर थोरे , ज्यों मुखु मुकुर मुकुर निज पानी , गति न जाइ अस अद्भुत बानी .
भरत की बात मृदु मंजु अर्थात कोमल और प्रसाद गुण युक्त भी है और कठोर है . यह पूरे मानस का अभिप्राय भी है. भरत में ही राम के स्नेह की पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है. भरत सिर्फ आज्ञाकारी नहीं हैं वे निर्वासित राम का पूरा दुख स्वयं अपने लिए वरण कर लेते हैं. राम की श्रेष्ठता या बड़प्पन इस तथ्य में है कि वे सबके हैं. उनके लिए कोई दूसरा नहीं है. भक्त से अधिक भगवान को भक्त की ओर उन्मुख कराया गया है. भक्त की सत्ता में ही भगवान की सत्ता है. श्रीराम ने वाल्मीकि से पूछा कि मैं कहां रहूं तो वाल्मीकि जी ने किंचित परिहासपूर्वक कहा कि ऐसी कोई जगह बताएं जहां आप हो नहीं. फिर भी आप हम से ही कहलाना चाहते हैं तो सुनें : 
  जिनके श्रवण समुद्र समाना कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना भरहिं निरंतर होंहि न पूरे  तिनके हिय तुम्हार गृह रूरे. 
जिनके कान के समुद्र में तुम्हारी कथा की अनेक सरिताएं(नदियां) आएं और भरती रहें पर समुद्र पूरा न हो. राम की कथा की निरन्तर चाह बनी रहे, तड़प बनी हो, तृप्ति न हो वहीं आपका घर है. राम  चरित मानस की यही सर्थकता है. राम भाव का रस सतत प्रवाहित होता रहे . आज भी तुलसी एक ऐसे सशक्त कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं और उनकी कविता , मनुष्यता और नैतिकता के शिखर को स्पर्श करती है. यह जरूर है कि मानस के अर्थ ग्रहण करने के लिए एक मानस-भावित दृष्टि और संवेदना चाहिए :  ‘अस मानस मानस चख चाहीं ‘ 
 मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: 
Mind is the cause of human suffering and liberation.
गिरीश्वर मिश्र 
Girishwar Misra, Ph.D. FNA Psy,
Special Issue Editor Psychological Studies (Springer), Former National Fellow (ICSSR), 
Ex Vice Chancellor,Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya,Wardha (Mahaaraashtra)
Ex Head & Professor,  Dept of Psychology, University of Delhi
Residence : Tower -1 , Flat No 307, Parshvanath Majestic Floors,18A, Vaibhav Khand, Indirapuram, Ghaziabad-201014 (U.P.)
Mobile- +91 9922399666,   https://mindandlife.home.blog 
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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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मंगलवार, 30 जून 2020

विश्व वात्सल्य मंच ने किया भोजन, परिधान, आवश्यक सामग्री एवं मॉस्क का वितरण








 




विश्व वात्सल्य मंच ने किया भोजन, परिधान, आवश्यक सामग्री एवं मॉस्क का वितरण
विश्व वात्सल्य मंच, हैदराबाद, के तत्वावधान में सन्नहिता सेंटर फॉर वूमेन एंड गर्ल चिल्ड्रन सोसायटी, कल्याणी निलियम, गन बाजार, रसूलपुरा के बच्चों को निक्की की स्मृति में भोजन, परिधान, आवश्यक वस्तु, केले एवं लॉकडाउन के कारण मॉस्क का भी वितरण किया गया। इसी क्रम में कमलम्मा सेवा समिति, चिल्ड्रन होम, तुकाराम गेट, नॉर्थ लाल्लागुडा,  सिकंदराबाद मैं भी मॉस्क एवं केले वितरित किए।
        संस्था की संस्थापक अध्यक्ष संपत देवी मुरारका एवं प्रधान सचिव राजेश मुरारका ने प्रेस को जारी विज्ञप्ति में बताया कि सन्निहिता सेंटर में निकी के स्मृति में भोजन, साबुन, तेल, टूथपेस्ट, शैंपू, एसिड एवं केले मंच की सदस्यों दीपिका एवं गीता सत्यनारायण का विशेष सहयोग रहा। लॉकडाउन के कारण मॉस्क भी वितरित किए गए। इस अवसर पर संपत देवी मुरारका, परामर्शदाता मदन देवी पोकरणा, राजेश मुरारका एवं एल्लया उपस्थित थे। मदनदेवी पोकरणा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

प्रस्तुति : संपत देवी मुरारका (विश्व वात्सल्य मंच)
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रविवार, 14 जून 2020

विश्व वात्सल्य मंच ने किया मॉस्क का वितरण




विश्व वात्सल्य मंच ने किया मॉस्क का वितरण
विश्व वात्सल्य मंच, हैदराबाद के तत्वावधान में लॉकडाउन के कारण सुल्तान बाजार पुलिस थाना में 700 मॉस्क का वितरण किया गया।
    संस्था की संस्थापक अध्यक्ष संपत देवी मुरारका एवं प्रधान सचिव राजेश मुरारका ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि विभिन्न पुलिस थाना में मॉस्क का वितरण किया जा रहा है। सुल्तान बाजार के पुलिस थाना के इंस्पेक्टर के.सुब्बाराम रेड्डी एवं चंद्रमोहन ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर संपत देवी मुरारका, राजेश मुरारका, परामर्शदाता मदनदेवी पोकरणा, कार्यकारी गीता अग्रवाल, अनसूया एवं अन्य कई पुलिस उपस्थित थे। मदनदेवी पोकरणा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
 संपत देवी मुरारका,
 लेखिका यात्रा विवरण,
 मीडिया प्रभारी,
 हैदराबाद.
मो.नं.09703982136.

मंगलवार, 9 जून 2020

साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति की बैठक संपन्न - समाचार कतरन - हिन्दी मिलाप एवं स्वतंत्र वार्ता


विलम्ब हेतु क्षमाप्रार्थी. 





प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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मीडिया प्रभारी
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मो.: 09703982136

रविवार, 7 जून 2020

ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक 'संपादकीयम' लोकार्पित

विलम्ब हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ.

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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