रविवार, 7 अक्तूबर 2018

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] Fwd: खतरे में है भारत की सांस्कृतिक अखंडता और विरासत : डॉ अर्पण जैन 'अविचल', झिलमिल में ईसीआईएल की पत्रिका2


खतरे में है भारत की सांस्कृतिक अखंडता और विरासत
.डॉ अर्पण जैन 'अविचल'

भारत देश एक बहु-सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ बना एक ऐसा राष्ट्र है जो दो महान नदी प्रणालियोंसिंधु तथा गंगाकी घाटियों मेंविकसित हुई सभ्यता हैयद्यपि हमारी संस्कृति हिमालय की वजह से अति विशिष्ट भौगोलीय क्षेत्र में अवस्थितजटिल तथा बहुआयामीहैलेकिन किसी भी दृष्टि से अलग-थलग सभ्यता नहीं रही।  भारतीय सभ्यता हमेशा से ही स्थिर  होकर विकासोन्मुख एवं गत्यात्मकरही है। भारत में स्थल और समुंद्र के रास्ते व्यापारी और उपनिवेशी आए।  अधिकांश प्राचीन समय से ही भारत कभी भी विश्व से अलग-थलग नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूपभारत में विविध संस्कृति वाली सभ्यता विकसित होगी जो प्राचीन भारत से आधुनिक भारत तककी अमूर्त कला और सांस्कृतिक परंपराओं से सहज ही परिलक्षित होता हैचाहे वह गंधर्व कला विद्यालय का बौद्ध नृत्यजो यूनानियों केद्वारा प्रभावित हुआ थाहो या उत्तरी एवं दक्षिणी भारत के मंदिरों में विद्यमान अमूर्त सांस्कृतिक विरासत हो।
भारत का इतिहास पांच हजार से अधिक वर्षों को अपने सांस्कृतिक खंड में समेटे हुए अनेक सभ्यताओं के पोषक के रूप में विश्व केअध्ययन के लिए उपस्थित है। यहां के निवासी और उनकी जीवन शैलियांउनके नृत्य और संगीत शैलियांकला और हस्तकला जैसे अन्यअनेक तत्व भारतीय संस्कृति और विरासत के विभिन्न वर्ण हैंजो देश की राष्ट्रीयता का सच्चा चित्र प्रस्तुत करते हैं।
डॉ एल बाशम ने अपने लेख ''भारत का सांस्कृतिक इतिहास'' में यह उल्लेख किया है कि ''जबकि सभ्यता के चार मुख्य उद्गम केंद्र पूर्वसे पश्चिम की ओर बढ़ने परचीनभारतफर्टाइल क्रीसेंट तथा भूमध् सागरीय प्रदेशविशेषकर यूनान और रोम हैंभारत को इसकासर्वाधिक श्रेय जाता है क्योंकि इसने एशिया महादेश के अधिकांश प्रदेशों के सांस्कृतिक जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डाला है। इसनेप्रत्यक्ष ओर अप्रत्यक्ष रूप से विश्व के अन्य भागों पर भी अपनी संस्कृति की गहरी छाप छोड़ी है।"
संस्कृति से अर्थ होता है कि किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप जैसे जो उस समाज के सोचनेविचारनेकार्य करने,खाने-पीनेबोलनेनृत्यगायनसाहित्यकलावास्तु आदि में परिलक्षित होती है। 
संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा की धातु ‘कृ’ (करनासे बना है। इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ (मूल स्थिति), ‘संस्कृति’ (परिष्कृतस्थितिऔर ‘विकृति’ (अवनति स्थिति) जब ‘प्रकृत’ या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यहबिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है। अंग्रेजी में संस्कृति के लिये 'कल्चरशब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट याकल्टस’ से लिया गया हैजिसका अर्थ है जोतनाविकसित करना या परिष्कृत करना और पूजा करना। संक्षेप मेंकिसी वस्तु को यहाँ तकसंस्कारित और परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। यह ठीक उसी तरह है जैसे संस्कृतभाषा का शब्द ‘संस्कृति
संस्कृति का शब्दार्थ है - उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर कीप्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धतिरीति-रिवाज रहन-सहन आचार-विचारनवीन अनुसन्धान और आविष्कारजिससे मनुष्य पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठता है तथा सभ्य बनता हैसभ्यता औरसंस्कृति का अंग है। सभ्यता (Civilization) से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति (Culture) से मानसिकक्षेत्र की प्रगति सूचित होती है।
भारतीय संस्कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैंअलग अलगतरह के कपड़े पहनते हैंभिन्न- भिन्न धर्मों का पालन करते हैंअलग अलग भोजन करते हैं किन्तु उनका स्वभाव एक जैसा होता है। तोचाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षणलोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैंएक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एकत्यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ोसी एक अवसर पर खुशियां मनाने मेंशामिल होता हैइसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन हैजिसमें  केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगमहोता है। चाहे उनकी संस्कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्वपूर्णभूमिका निभाते हैं।
वर्तमान समय में भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्ट्र की है। सच ही हैभारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं कोहाल के वर्षों में पार किया हैजैसे कि वाणिज्यप्रौद्योगिकी और विकास आदिऔर इसके साथ ही उसने अपनी अन्य रचनात्मकबौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है।  हमारे राष्ट्र ने विश्व को विज्ञान दिया हैजिसका निरंतर अभ्यास भारत में अनंतकाल से कियाजाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारीका इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमीसंकल्पना जब अपने चरम पर पहुंच गई हैऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।
भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलतालेने और देने की भावना तथा उन संस्कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलनाएक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल हैजबकि उनका अपना अस्तित् बना हुआ है और वे भारत रूपीउद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।
इन सब  गुणों के बावजूद भी वर्तमान दौर में भारत में अपनी ही संस्कृति को विखंडित और  विलोपित करने की कवायदें आरम्भ हो चुकी है,जिसके दुष्परिणाम स्वरुप भारत केवल एक ऐसा भूमि का टुकड़ा बच जाएगा जिसके सतही तल पर तो अधिकार हमारा होगा किन्तुमानसिक स्तर पर उस पर आधिपत्य पाश्चात्य के राष्ट्रों का होगा। इस विकराल समस्या को हम भारत की सांस्कृतिक अखंडता पर मंडरारहे खतरे के तौर पर स्वीकार करना चाहिए और उसके उपचार हेतु शीघ्रातिशीघ्र प्रयास करना प्रारम्भ करना होगा।
सांस्कृतिक अखंडता को बनाये रखने के लिए प्राथमिक तौर पर हर भारतवंशी में राष्ट्रप्रेम की जागृति लाना होगी। 'पहले राष्ट्रकीमूलभावना को रगों में दौड़ने के लिए भारतीय भाषाओँ को संरक्षित करना परम आवश्यक है।  जब भारत आजाद होने वाला था उसके पहले१८ जुलाई १९४७ को इंग्लैंड की संसद में 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७पास हुआयदि उसे पड़ा जाये और उसके बाद लार्ड मैकालेऔर एटमी के संवादों की तरफ दृष्टि डाली जाए तो हमें यह ज्ञात होगा कि भारत को आजादी शर्तों और अनुबंध के आधार पर दी गई हैऔरएटमी के अनुसार तो भारत को अंग्रेजो से आज़ाद करके अंग्रेजियत का गुलाम बनाया गया हैं। हमें इसको तोड़ कर भारतीय भाषाओँ कोबढ़ावा देना होगाबाजार पर जिस अंग्रेजियत का कब्ज़ा है उसे हटा कर भारतीयता का साम्राज्य स्थापित करना होगा।  बच्चों के बस्ते सेगायब हुई नैतिक शिक्षा की किताब भी भारत की सांस्कृतिक अखंडता को बचने में अग्रणी थीउसे वापस अनिवार्य शिक्षा की धारा में लानाहोगा।
इसी के साथ हमें सांप्रदायिक सौहाद्र की स्थापना करनी होगीक्योंकि भारत में धर्म और जाति के नाम पर झगड़े तो उन हथियारों केव्यापारियों की कारस्तानी और मंशा है जिनका व्यापार ही हथियार बेचना हैजिनमे अमरीका अग्रणी राष्ट्र है।
हमें हमारे त्यौहारों पर भी चाइनीज भागीदारी को समाप्त करना होगाआज हमारे त्योंहारों की समझ हमसे ज्यादा चाइना की है क्योंकिवह एक व्यापारी देश है जो अपना माल विश्व के दूसरे बड़े बाजार के तौर पर स्थापित भारत में खपाना चाहता है। महात्मा गाँधी ने आज़ादीके पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन इसलिए ही चलाया था क्योंकि हम ही हमारी गाढ़ी कमाई से हमारी सांस्कृतिक हत्या केलिए साधन जुटाने हेतु उन्हें पोषित करते है।
इन्ही सब महत्वपूर्ण उपायों से भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाया जा सकता हैवर्ना हमारे पर शेष हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ बचेगा जब राष्ट्र ही नहीं बचेगा।

डॉअर्पण जैन 'अविचल
पत्रकार एवं स्तंभकार, संपर्क०७०६७४५५४५५
अणुडाकarpan455@gmail.comअंतरताना:w ww.arpanjain.com
[अर्पण जैन 'अविचलमातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं]
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 ईसीआईएल लि., हैदराबाद 
की गृहपत्रिका 'ईसीआईएल गौरव' अंक- 10 





वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई



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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

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