बुधवार, 26 सितंबर 2018

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी की बात- डॉ. वेद प्रताप वैदिक, डॉ विजय कुमार भार्गव , देवसिंह रावत, डा.देविदास प्रभु


हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी की बात

1. हिंदी महारानी है या नौकरानी ?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

आज हिंदी दिवस है। यह कौनसा दिवस है, हिंदी के महारानी बनने का या नौकरानी बनने का ? मैं तो समझता हूं कि आजादी के बाद हिंदी की हालत नौकरानी से भी बदतर हो गई है। आप हिंदी के सहारे सरकार में एक बाबू की नौकरी भी नहीं पा सकते और हिंदी जाने बिना आप देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं। इस पर ही मैं पूछता हूं कि हिंदी राजभाषा कैसे हो गई ? आपका राज-काज किस भाषा में चलता है ? अंग्रेजी में ! तो इसका अर्थ क्या हुआ ? हमारी सरकारें हिंदुस्तान की जनता के साथ धोखा कर रही हैं। उसकी आंख में धूल झोंक रही हैं। भारत का प्रामाणिक संविधान अंग्रेजी में हैं। भारत की सभी ऊंची अदालतों की भाषा अंग्रेजी है। सरकार की सारी नीतियां अंग्रेजी में बनती हैं। उन्हें अफसर बनाते हैं और नेता लोग मिट्टी के माधव की तरह उन पर अपने दस्तखत चिपका देते हैं। सारे सांसदों की संसद तक पहुंचने की सीढ़ियां उनकी अपनी भाषाएं होती हैं लेकिन सारे कानून अंग्रेजी में बनते हैं, जिन्हें वे खुद अच्छी तरह से नहीं समझ पाते। बेचारी जनता की परवाह किसको है ?

सरकार का सारा महत्वपूर्ण काम-काज अंग्रेजी में होता है। सरकारी नौकरियों की भर्ती में अंग्रेजी अनिवार्य है। उच्च सरकारी नौकरियां पानेवालों में अंग्रेजी माध्यमवालों की भरमार है। उच्च शिक्षा का तो बेड़ा ही गर्क है। चिकित्सा, विज्ञान और गणित की बात जाने दीजिए, समाजशास्त्रीय विषयों में भी उच्च शिक्षा और शोध का माध्यम आज तक अंग्रेजी ही है। आज से 53 साल पहले मैंने अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह करके इस गुलामी की जंजीर को तोड़ दिया था लेकिन देश के सारे विश्वविद्यालय अभी भी उस जंजीर में जकड़े हुए हैं। अंग्रेजी भाषा को नहीं उसके वर्चस्व को चुनौती देना आज देश का सबसे पहला काम होना चाहिए लेकिन हिंदी दिवस के नाम पर हमारी सरकारें एक पाखंड, एक रस्म-अदायगी, एक खानापूरी हर साल कर डालती हैं। हमारे महान राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री को चार साल बाद फुर्सत मिली कि अब उन्होंने केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक बुलाई। उसकी वेबसाइट अभी तक सिर्फ अंग्रेजी में ही है। यदि देश में कोई सच्चा नेता हो और उसकी सच्ची राष्ट्रवादी सरकार हो तो वह संविधान की धारा 343 को निकाल बाहर करे और हिंदी को राष्ट्रभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं को राज-काज भाषाएं बनाए। ऐसा किए बिना यह देश न तो संपन्न बन सकता है, न समतामूलक, न महाशक्ति !
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यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम स्वभाषा का सम्मान नहीं करते।  हिंदी दिवस केवल नाम के लिए मनाया जाता है। हाँ हिंदी बोलने वाली तो भाषा बनती जा रही है पर ज्ञान-विज्ञानं की भाषा बनाने के प्रति कोई प्रयास नहीं है। मैंने इस दिशा में वहुत प्रयास करे पर सफलता नहीं मिली। मैंने अपनी पीएच का शोध हिंदी में भी लिख कर दर्शाया कि  हिंदी में भी वैज्ञानिक शोध लिखा जा सकता है।  हाँ अंगरेजी में भी इसलिए लिखा कि अभी मानसिकता नहीं बदली है हाँ साक्षात्कार हिंदी में ही दिया और परमाणु ऊर्जा विभाग के उस समय जो अध्यक्ष दक्षिण भारतीय डॉ चितम्बरण थे उन्होंने मुझे सम्मानित किया और कहा कि मैंने अंगरेजी में शोध ग्रन्थ अंगरेजी में क्यों लिखा। डॉ चितम्बरण जी पिता वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षक थे इसलिए उन्होंने दसवीं तद फ्शिक्षा हिंदी माध्यम से की थी।   मेरे द्वारा परमाणु ऊर्जा पर हिंदी बनाये सचित्र 50 चार्टों को भी सराहया।  इसलिए मेरा मानना है कि केवल हिंदी दिवस मनाने से नहीं पर उसे क्रियान्वित करने से ही हिंदी का भला हो सकता है।

डॉ विजय कुमार भार्गव 
सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी 
भाभा परमाणु अनुसन्धान केंद्र एवं परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद् , मुम्बई 400703 
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 भारतीय भाषा आंदोलन

अंग्रेजी में राज चलाकर, हिंदी दिवस मनाने का पाखण्ड बंद करो

भारतीय भाषा आंदोलन ने हिंदी दिवस पर  संसद मार्ग पर धरना देकर प्रधानमंत्री मोदी को दिया ‘देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने व भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए ’रोषयुक्त ज्ञापन 

नई दिल्ली।  14 सितम्बर 2018 को हिंदी दिवस के अवसर पर  भारतीय भाषा आंदोलन ने संसद की चौखट, राष्ट्रीय धरना स्थल संसद मार्ग पर धरना दे कर इसे राष्ट्र विरोधी षडयंत्र बताते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी को ‘देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने व भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए ’रौष युक्त ज्ञापन  दिया। 
65 माह से संसद की चैखट पर देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए आंदोलन छेडने वाले भारतीय भाषा आंदोलन ने प्रधानमंत्री को दिये ज्ञापन में दो टूक शब्दों में लिखा कि 14 सितंबर, को भारत सरकार सहित भारत सरकार के तमाम विभाग हिंदी दिवस के रूप में मना रहे है। इसे राजभाषा के रूप में भी गौरवान्वित किये जाने का बखान कर रहे है। परन्तु हकीकत यह है कि  अंग्रेजों के जाने के 72 साल बाद भी बेशर्मी से अंग्रेजों की ही भाषा अंग्रेजी की गुलामी इस देश में बनी हुई है और हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाये गुलामी के पिंजरे में जकड़ी हुई है। देश का दुर्भाग्य है कि देश में शिक्षा,रोजगार, न्याय, सम्मान व शासन सहित पूरी व्यवस्था विदेशी भाषा अंग्रेजी में ही चल रही है और  साल में एक दिन 14 सितम्बर को हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मना कर देश की जनता की आंखों में धूल झोंकने का धृर्णित मजाक देश के साथ किया जा रहा है।  यह देश की लोकशाही, आजादी व सम्मान के साथ मानवाधिकारों का गला घोंटने वाला राष्ट्रद्रोही कृत्य है। भारतीय भाषायें देश संचालित करने के लिए है न की साल में एक दिन का श्राद्ध करने के लिए।   यह जग जाहिर है कि 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था.। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। परन्तु संसार के सारे देश जहां अपनी अपनी देश की भाषा में अपने देश में शिक्षा, रोजगार, न्याय व शासन संचालित कर विश्व में अपना परचम लहरा रहे है। वहीं भारत उन्हीं अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी का गुलाम बन अपने देश के नाम, संस्कृति, सम्मान, लोकशाही, मानवाधिकार, प्रतिभाओं का निर्ममता से गला खुद बेशर्मी से घोंट रहा है। भारतीय भाषा आंदोलन का मानना है किसी भी स्वतंत्र देश की भाषाओं को रौंदकर विदेशी भाषा में बलात शिक्षा, रोजगार, न्याय व शासन देना किसी देशद्रोह से कम नहीं है।  
   
14 सितम्बर को हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है कि क्योंकि इसी तारीख को 1949 में  हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था।  संविधान में विभिन्य नियम कानून के अलावा नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का मुद्दा अहम था। काफी विचार-विमर्श के बाद हिन्दी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा चुना गया। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। 14 सितम्बर को हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है कि क्योंकि इसी तारीख को 1949 में  हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था।बाद में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने 14 सितम्बर 1953 को पहला हिंदी दिवस मनाते हुए हर साल इसी दिन हिंदी दिवस मनाने का निर्णय लिया।

संसद की चैखट पर देश को अंग्रेजों के बाद अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त कराकर भारतीय भाषाओं को लागू करने का संकल्प लेते हुए  भारतीय भाषा आंदोलन के जांबाज ने ( भारत को अंग्रेजी का गुलाम बना कर /हिंदी दिवस का पाखण्ड बंद करो, बंद करो/अंग्रेजी की गुलामी थोप कर,देश की आजादी व संस्कृति रौंदने वाले हुक्मरानों, शर्म करो शर्म करो /ैअंग्रेज गये अंग्रेजी जाये, भारतीय भाषा राज चलाये/वही अंग्रेजी भाषा, इंडिया नाम, आज भी भारत है गुलाम/अंग्रेजी के दलालों भारत छोड़ा, भारतीय भाषा लागू करो/ अंग्रेजी में काम न हो, फिर से देश गुलाम न हो व देश के हुक्मरानों शर्म करो, अंग्रेजी की गुलामी बंद करो  व हिंदी दिवस का पाखण्ड बंद करो के गगनभेदी नारे लगाये। 

 14 सितम्बर को भारतीय भाषा आंदोलन में  आंदोलन के अध्यक्ष देवसिंह रावत,  धरना प्रभारी रामजी शुक्ला,  पुरषोत्तम कपूर, हरिराम तिवारी ,बलराम सिंह,  अनिल पंत, मोहन जोशी  कमल किशोर नौटियाल,  कुंवर बहादुर , स्वामी संतुष्टानंद जी महाराज, मनमोहन शाह, संतोष विश्वकरमा,वेदानंद, खुशहाल सिंह बिष्ट ,आशा शुक्ला   आदि ने भाग लिया।   
                          (अध्यक्ष)  भारतीय भाषा आंदोलन, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली  .दूरभाष- ;  9910145367
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 नाच न आये आंगन टेढ़ा
    -डा.देविदास प्रभु
    जिन लोगो को हिंदी से नफ़रत है वही लोग देवनागरी हटाकर रोमन लिपि को अपनाने की बात कर रहे है! किसी भी भाषा में और उसकी लिपि में कोई कमजोरी नहीं होती है अगर कमजोरी होती है तो वो केवल उस भाषा बोलनेवालो में और उस भाषा में लिखनेवालों में होती है ! यहूदी यूरोप से जब इस्रायल आये तब उन्होंने अपनी मृत भाषा हिब्रू को फिर से जीवित किया और उसी भाषा की लिपि को भी अपनाया ! अब सभी ज्ञान हिब्रू भाषा में मौजूद है ! क्या चीनी, जापानी, कोरियाई या थाई भाषा बोलनेवालो ने अपनी लिपि कमजोर कहकर रोमन लिपि को अपनाया है ? कमी किसी भाषा में नहीं बल्कि भाषा बोलनेवालों में होती है ! अपनी कमजोरी को वे भाषा पर और लिपि पर डाल देते हैं ! दुनिया के छोटी छोटी भाषाओं में जो ज्ञान मौजूद है वो ज्ञान भारत के बड़े बड़े भाषाओं में नहीं है !
भारत की राजधानी के बड़े स्कूलो में भारत सरकार की राजभाषा बोलने पर बच्चो को शिक्षा (दंड) दी जाती है, इस से बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है? अमेरिका की राजधानी वाशिंग्टन में सरकारी दफ्तर के करीब ही जर्मन माध्यम का स्कूल है वहाँ जर्मन एम्बसी में काम करनेवालों के बच्चे पढ़ते है, देखिये हममें और उनमे क्या अंतर है !
अंग्रेजी पंडितों की पेहली दुश्मन है हिंदी, उसे कमजोर बनाने के लिए हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट करके हिंदी को बर्बाद करने की मुहीम जारी है ! हिंदी अखबारों में भरपूर अंग्रेजी शब्द ,किसी अन्य भारतीय भाषा के अखबारों में अंग्रेजी शब्दों का मिलावट नहीं करते है !
कन्नड़ ,मलयालम, तेलुगु आदि भाषाओं में कोई भी संस्कृत शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। उसे उसी भाषा का शब्द माना जाएगा, मगर हिंदी की हालत यह है कि कोई भी अंग्रेजी शब्द को देवनागरी में लिख दिया, तो हो गया उसे हिंदी शब्द ही माना जाएगा! अब देवनागरी को भी हटा दिया तो बचेगा क्या? हिंदी अपनी आप अंग्रेजी हो जायेगी ! वाह रे वाह,  क्या तरकीब ढूंढ़ लिया है हमारे अंग्रेजी पंडितों ने हिंदी का अंत करने के लिए !
हिंदी के विकास केलिए संविधान के अनुच्छेद (article) 351 का पालन कही भी नहीं हुआ है, किसी संकृत या (1950 के बाद ) ८वि अनुसूची के अन्य भाषाओं का कोई भी शब्द हिंदी में शामिल नहीं किया गया है ! इसकेलिए कौन जिम्मेदार है ? हिंदी भाषा बोलनेवाले ही जिम्मेदार हैं।
अंग्रेजो के जमाने में ग्रामीण लोग कोई भी अंग्रेजी शब्द का प्रयोग नहीं करते थे, कार को वे हवा गाडी कहेते थे मगर आज बदलाव देखिये पति - पत्नी को भी हसबंड - वैफ कहेते है ! क्या हमें अंग्रेजो ने आकर शादी करना सिखाया है ? क्या हमें अंग्रेजो ने आकर अन्न खाना सिखाया है के हम उसे राईस कहें ?
अंग्रेजी एक यूरोपीय भाषा है, उसमे अन्य यूरोपीय भाषाओं के शब्द शामिल होना स्वाभाविक है, हिंदी भारतीय भाषा है उसमे भारतीय भाषाओं के शब्द ही शामिल करें।
हिंदी दिवस के मोके पर सभी शपथ करें ,कोई भी अंग्रेजी शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे !
-डा.देविदास प्रभु 

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

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