सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

(वैश्विक ई-संगोष्ठी)


 
(वैश्विक ई-संगोष्ठी)
 'चिंदी-चिंदी' होती हिंदी' विषय पर डॉ. अमरनाथ के लेख पर भारतीय-भाषा प्रेमियों के विचार । 
1.  विजय कुमार मल्होत्रा
डॉ. अमरनाथ का यह शोधपूर्ण लेख न केवल विचारणीय और मननीय हैबल्कि आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते योजनाबद्ध रूप में इस पर अमल किया जाए ताकि चिंदी-चिंदी होती हिंदी को बचाया जा सके.
विजय
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2.  डॉ. ओंम विकास
कुछ विदेशी ताकतें भाषा के आधार पर देश को बाँटने का प्रयास कर रही हैं । अवधीमैथलीभोजपुरीराजस्थानी आदि बोलियों से हिन्दी भाषा समृद्ध हुई,अब उन्हें अलग भाषा के रूप में मान्यता की आवाजें उठ रही हैं । इसके लिए हिन्दी के मठ भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं । परिणाम होगा कि अगली जनगणना में हिन्दी भाषियों की जनसंख्या घट जाएगी । द्वितीय भाषा के रूप में अंग्रेजी सर्वाधिक प्रिय भाषा होगी अंग्रेजी का वर्चस्व प्रबल होगा ;भारत की संस्कृति लोप होने के कगार पर होगी ।
      मराठी, गुजरातीबंगाली आदि शब्दों के समावेश को सरकारी (अति) मानकीकरण से ठेस पहुँची है । किसी विज्ञान पुस्तक पर पुरस्कार एवं प्रकाशन सहयोग पाने के लिए अपेक्षा  है कि  वैतश (वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली) आयोग की मानक शब्दावली का प्रयोग हो, अटपटे शब्दों का भी बेवश प्रयोग हो ।
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3.  डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’ 
दक्षिण अफ्रीका में आयोजित नवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सर्वप्रथम डॉ अमरनाथ द्वारा यह मामला उठाया गया था कि यदि भारत की बोलियों को भी अष्टम अनुसूची के अंतर्गत भाषा का दर्जा दे दिया जाने लगा तो उसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे। यही नहीं उस साजिश का भी खुलासा हुआ जो अंग्रेजी - समर्थकों द्वारा हिंदी के खिलाफ बड़े ही छिपे हुए ढंग से रची जा रही थी । जब यह मामला सामने आया तो मैं ही नहीं, मुझ जैसे सैकड़ों भारतीय भाषा प्रेमीराजभाषा प्रेमी सन्न रह गए। यह बात बिल्कुल सही है कि हिंदी-भाषी क्षेत्र जिसे राजभाषा नियमों में 'क्षेत्र कहा गया है, उस क्षेत्र में बोली जाने वाली सभी बोलियों आदि को यदि अष्टम अनुसूची के अंतर्गत भाषा का दर्जा दे दिया गया एक-एक कर सभी बोलियां और उप बोलियां इस होड़ में शामिल होने के लिए जोर लगाने लगेगी। राजनीतिक महत्वकांक्षा और वोट बैंक की राजनीति के चलते यह सिलसिला अंतहीन होता जाएगा। 
      जब हर क्षेत्र में हर बोली भाषा का दर्जा प्राप्त कर लेगी तो प्रश्न यह उठता है कि भारत में हिंदी भाषी कौन होगा निश्चित तौर पर भारत में हिंदी भाषा न केवल दुनिया के स्तर पर बल्कि भारत के स्तर पर भी सबसे कम लोगों की भाषा होंगी ।  कुछ  लोग जो स्वयं को हिंदी का साहित्यकार कहते हैं या शहरों में बस वे लोग जो गाँवों -कस्बों से या अपने क्षेत्र से कट चुके हैं  और पूरी तरह अंग्रेज नहीं बने हैं वे ही मातृभाषा के रुप में अपनी भाषा हिंदी लिखवाएँगे।
      इस प्रकार हिंदी न केवल भारत की बल्कि किसी राज्य की राजभाषा होने लायक भी नहीं रह जाएगी। और मामला यहीं समाप्त नहीं होगा मामला और आगे बढ़ेगा फिर भारत की अन्य भाषाओं में भी यह प्रक्रिया शुरु होगी मुंबई की मराठी सोलापुर की मराठी पुणे की मराठी कोल्हापुर की मराठी भाषा का हर रूप अष्टम अनुसूची में शामिल होने के लिए मचलने लगेगा ।
इससे उस कथित बोली आदि क कथित  साहित्यकारों की दुकानें चल निकलेगी और नेताओं को नए नए वोट बैंक मिलने लगेंगे। अंततः: होगा यही कि धीरे-धीरे कर भारत की भाषा-बोलियां आपस में लड़कर सब खत्म होती जाएँगी। अंग्रेजों की नीति थी बांटो और राज करो । अब इसी नीति के चलते अंग्रेजी समर्थक और पुराने राजाओं की तरह से स्वार्थी लोग अपनी भाषाओं की चिंदी - चिंदी उड़ाकर अंग्रेजी के साम्राज्य को सशक्त मजबूत करने में पूरा योगदान देने लगे हैं ।
इसलिए डॉ अमर नाथ द्वारा उठाया गया यह मुद्दा भारतीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । इसलिए मैं भी इस मुद्दे को  लगातार हर मंच पर उठाता हूँ। और इस पर लिखता रहता हूं । वे सब लोग जिन्हें भारत की भाषाओं से प्रेम है, उन सभी को चाहिए कि वे इस खतरे के प्रति न केवल सचेत रहें बल्कि ऐसे किसी भी कदम का पूरी शक्ति सेपूरी भक्ति से विरोध भी करें।  नहीं तो आने वाले समय में अपने आपको विश्व भाषा कहने वाली हिंदी भारत के किसी राज्य की भाषा भी नहीं होगी । आज जो अपने आपको हिंदी भाषी कहते हैं कल वे स्वयं को अवधीब्रज,हरियाणवीराजस्थानीछत्तीसगढ़ीमालवी, भोजपुरी आदि लिखवाने लगेंगे। आइए इस पर विचार करें और ऐसे षड्यंत्रों के प्रति सचेत होकर भारतीय भाषाओं की चिंदी चिंदी उड़ाने वाले बोलियों के ठेकेदारों और नेताओं का भंडाफोड़ करते हुए सचेत रहें।
 जय हिंद की भाषा ।
डॉ. एम. एल. गुप्ता ‘आदित्य’
वैश्विक हिंदी सम्मेलन
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 4.  ललिता रवीन्द्रनाथ, कोयम्बटूर
मै ललिताकोयम्बत्तूर में स्थित एक महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफसर तथा भाषा विभाग की अध्यक्षा  हूँ। सर्वप्रथम मैं डॉ. अमरनाथ जी को शुक्र गुजा़रूँजिन्होने परिस्थिति के अनुकूल लेख प्रस्तुत किये है। पूरा आलेख पढ़ने के बादवास्तव में हिन्दी के प्रति चिंता बढ़ गई है। हिन्दी के अस्तित्व को बचाने तथा विश्व की दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी को कायम रखने के लिए जो कदम हमें उठाना चाहिएअतिवेग से उठाना चाहिए। हमें बकरा नहीं बल्कि सिंह बनकर दहाड़ना चाहिए। इस मोर्चे पर दक्षिण के हिन्दी प्रेमी हम सब साथ है ।। धन्यवाद ।।
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    5.  नरेंद्र परिहार
सही लिखे......हिंदी का दर्द यही है।
डॉ. अमरनाथजी को बधाई.....हम आपकी आवाज हैं। पंजाबी भाषी हूँ, पर हिंदी प्रिय है।
मुझे......धड़कन हैं।
नरेंद्र सहारकर
अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत !  
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   6.  देविदास प्रभु, 

डॉ. अमरनाथजी,प्रणाम 
विकिपीडिया में हिंदी से जुडी जानकारी देनेवाले भारत के अंग्रेजी पंडित है और कोई नहीं! विकिपेडिया से लोग ओन करके कोई भी जानकारी दे सकता है और उसे बदल भी सकता है !हिंदी को बदनाम करनेवाले अपने ही लोग है कोई विदेशी नहीं ! वो भी हिंदी भाषा बोलने वाले ही है! हिंदी को यही लोग अलग अलग प्रान्तों के हिसाब से तोड़ते है !मेरे राज्य कर्णाटक में ७-८ तरह का कन्नड़ बोला जाता है बड़े प्रदेश में बोले जानेवाली हिंदी में प्रदेश के अनुसार भिन्नता होना स्वाभाविक है ! विकिपीडिया में ये भी बताया जा रहा है के हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं है !केवल ८वि अनुच्छेद के २२ भाषावो में एक है! सत्य ये है के ८वीं अनुसूची की भाषाओं को सविधान ने राजभाषा नहीं कहा है ! संविधान के १७ वें विभाग में केवल हिंदी को भारत की राजभाषा कहा है (ओफ्फिशियल लंग्वेज) विदेशी लोग हिंदी को पसंद करते है  लेकिन केवल भरत में हमारे ही अंग्रेजी पंडित हिंदी के दुश्मन बनके बैठे हैं ! उनको हर हाल में अंग्रेजी को बढ़ावा देना है उनका पहेला दुश्मन है हिंदी !वे लोग भारत को बहुसंख्यक लोग अंग्रेजी बोलनेवाले नाइजीरिया, यूगांडा, केन्या, तन्जानिया जैसा गरीब देश बनाना चाहते हैं।  
हिंदी केलिए लड़ रहे आप जैसे लोग कम से कम इतना तो कोशिश कर सकते है के हिंदी प्रदेश के पूरी जनसंक्या को हिंदी बोलनेवाली केहेकर हिंदी को दूसरी सबसे बड़ी भाषा बताने की कोशिश कर सकते है !सरकारी दस्तावेजो में और पाट्य क्रम में ये जानकारी शामिल करवा सकते है !हिंदी मातृभाषा होनेवाले भारत में लगबग ५० करोड़ है  और हिंदी समज्नेवाले लगबग १०० करोड़ से ज्यादा है लेकिन दुनिया के बड़े भाषाओं की सूची में हिंदी को बंगाली से भी नीचे रखा गया है और हिंदी बोलनेवाले केवल १८ करोड़ बताया गया है ! हिंदी को प्रदेश के अनुसार बाँटकर एक दिन हिंदी बोलनेवाले जीरो भी बना देंगे ये लोग 
देविदास प्रभु
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 7.  संजीव वर्मा सलिल

हिंदी को किसी से मान्यता की भीख नहीं चाहिए। हिंदी को तकनीकी और वैज्ञानिक लेखन में सक्षम बनाना जरूरी है। बोलियों में यह सामर्थ्य नहीं है. भारत की सियासत या विकिपीडिया की सूची हमारा लक्ष्य क्यों होअन्य भाषाओँ से साहित्य हिंदी में अनुदित किया जाएबोलियों में यह संभव नहीं है। हिंदी से पुस्तकें अन्य भाषाओँ में अनुदित हों. हिंदी शब्द कोष में बोलिओं के शब्द जोड़ दिए जाएँ तो उन्हें हिंदी में अपनापन लगेगा। मैं अभियांत्रिकी की पुस्तकें हिंदी में लिखने हेतु प्राध्यापकों को प्रेरित कर रहा हूँ। हिंदी में अलंकार कोष और छंद कोष भी तैयार का कर रहा हूँ। जरूरत प्रकाशक की है।
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   8.  शकुन्तला बहादुर 
ठोस प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित ,भाषावैज्ञानिक डॉ. अमरनाथ जी का ये आलेख  हिन्दी की व्यापकता  पर सद्य: प्रस्तुत आक्रमण का सन्देश  देते हुए हिन्दी भाषियों और प्रेमियों को सावधान करने के लिये अत्यन्त प्रभावी है । इस दिशा में शीघ्र ही प्रयत्न करणीय हैं । क्या निकट भविष्य में किसी  सर्व भारतीय भाषाओं / उपभाषाओं के सम्मेलन में  हिन्दी की इस सुनिश्चित अपमानजनक स्थिति पर विचार किया जाना उचित या संभव नहीं होगा ? 
   ये हम सभी के लिये चिन्ता का विषय है । इस ओर ध्यान आकृष्ट करने केलिये  डॉ.अमरनाथ जी का साधुवाद !! 
   सभी  भारतीयों / हिन्दी प्रेमियों का सहयोग इस  सारस्वत यज्ञ में समिधा बनेगातभी सफलता प्राप्त हो सकेगी। हमें विरोध को दूर करके सभी की सहमति बनानी होगी ।
        शकुन्तला बहादुर, कैलिफ़ोर्निया  
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
वेबसाइट- वैश्विकहिंदी.भारत /  www.vhindi.in
प्रस्तुत कर्ता: 
संपतदेवी मुरारका
अध्यक्षा विश्व वात्सल्य मंच
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

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