मंगलवार, 14 नवंबर 2017

डॉ. अमरनाथ शर्मा का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र



डॉ. अमरनाथ शर्मा का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र

दिल्ली कार्पोरेशन के अंतर्गत आने वाले स्कूलों को आगामी मार्च से अंग्रेजी माध्यम में बदल देने का फैसला ।

प्रतिक्रियाएँ- 1
प्रो अमर नाथ शर्मा का माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र (दिनांक नवंबर, 2017) में दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में मार्च 2018 से अंग्रेज़ी पढ़ाने के संबंध में जो व्यथा व्यक्त की है, उससे दिल्ली के अधिकतर लोग सहमत हैं। हम सभी व्यथित हैं कि दिल्ली नगर निगमों के स्कूलों में मार्च 2018 से पहली कक्षा से अंग्रेज़ी शुरू हो जाएगी। कैसी विडंबना है इस देश कीजिसमें अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं और उनमें से सौ से अधिक बड़ी भाषाएँ बोली, पढ़ी और लिखी जाती हैं। फिर पता नहीं, हम विदेशी भाषा अंग्रेज़ी का सहारा क्यो लेते हैं, क्यों अंग्रेज़ी पर निर्भर रहते हैअनेक विद्वानों, शिक्षाविदों और महापुरुषों का यही मत रहा है कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। महात्मा गांधी ने हरिजन के जुलाई, 1938 के अंक में अपने विद्यार्थी जीवन के अनुभव बताते हुए मातृभाषा के महत्व को प्रतिपादित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है। अपने विषय को सीखने और समझने की पकड़ बच्चे के लिए अपनी मातृभाषा में अधिक आसान और स्पष्ट होती है और अध्यापक के लिए सम्झना और पढ़ाना भी सरल होता है। वास्तव में विदेशी भाषा में अपने विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते और अगर आ भी जाते है तो आधे-अधूरे। अंग्रेज़ी जैसी भाषा को तो दिमाग में घुसेड़ना भी बहुत ही कष्टकारी होता है, क्योंकि वह जैसी लिखी जाती है वैसी बोली नहीं जाती। इसकी वर्तनी (spelling) और उच्चारण को सीखने में काफी समय लग जाता है। वस्तुतशिक्षा के प्रति हमारी सरकारों का दृष्टिकोण उपेक्षित, उदासीन और संवेदनहींन रहा है। वे नहीं जानते और न ही जानने का प्रयास करते हैं कि देश के विकास में शिक्षा की अहम भूमिका रहती है और मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने पर बच्चे में देश-भक्ति, अपनी संस्कृति और जीवनादर्शों के संस्कार बचपन से ही पैदा हो जाते हैं।
थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने सन् 1835 में जिस शिक्षा व्यवस्था का निर्धारण किया था, उससे हम आगे नहीं बढ़े हैं। मैकाले को न तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान था और न ही किसी भारतीय भाषा का। इस लिए उसने अपनी उपनिवेशी शक्ति का प्रयोग करते हुए तत्कालीन भारत पर अंग्रेज़ी को थोपा वह अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी को विश्व की भाषाओं में सर्वाधिक उत्कृष्ट और समृद्ध मानता था और इसी से वह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को खत्म करना चाहता था। हम आज तक उसीकी नकल करते आ रहे हैं। लगता है कि न तो हम भारतीय संदर्भ में कुछ सोचते हैं और न ही हमारा कोई विज़न है राजनीति के तथाकथित कर्णधार और अंग्रेज़ीदाँ अधिकारी शिक्षा की प्रकृति, प्रवृति, प्रासंगिकता और महत्ता को समझे बिना अपने स्वार्थ के आधार पर अपनी मर्ज़ी से शिक्षा में बदलाव करते रहते हैं। श्री लाल शुक्ल ने अपने राग दरबारी उपन्यास में व्यंग्य करते हुए एक पात्र से सही कहलवाया है किहमारी शिक्षा पद्धति सड़क की वह कुतिया है जिसे हर कोई एक लात मार देता है। शिक्षा के ठेकेदारों और तथाकथित कर्णधारों को मालूम होना चाहिए कि नई पीढ़ी के स्वाभाविक विकास में पराई भाषा रुकावट डालती है। भारत सरकार द्वारा गठित शिक्षा आयोगों ने भी शिक्षाशस्त्रीय दृष्टि से समय-समय पर यही कहा है कि विद्यारंभ करने वाले विद्यार्थी के लिए उसकी मातृभाषा ही सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है, लेकिन इन आयोगों की सिफ़ारशों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक में मैं प्राथमिक कक्षाओं का विद्यार्थी था और उस समय अंग्रेज़ी पाँचवीं कक्षा से ही प्रारंभ होती थी। क्या हमारी शिक्षा आज की शिक्षा से अच्छी नहीं थी? वास्तव में दिल्ली नगर निगम प्राइवेट स्कूलों से मुक़ाबला करना चाहते हैं और इस मुक़ाबले में वे अंग्रेज़ी का सहारा ले कर अपनी पढ़ाई का स्तर बढ़ाना चाहते हैं। इस से शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं हो गा। क्या आप समझते हैं कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिक मेधावी और कुशल होते हैं? ऐसा कदापि नहीं है। यह केवल भ्रम है कि अङ्ग्रेज़ी पढ़ने वाले बच्चे होशियार होते हैं। अगर नगर निगमों के स्कूलों को वैज्ञानिक दृष्टि से शिक्षा के स्तर को सुधारने का प्रयास किया जाए और उन स्कूलों के अध्यापक ईमानदारी तथा मेहनत से शिक्षण-कार्य कराएँ तो कोई वजह नहीं कि ये स्कूल भी शिक्षा के उच्च स्तर पर पहुँच सकते हैं। हमारे सामने फ़िनलैंड, स्वीडन आदि अनेक देशों के उदाहरण हैं जहाँ स्कूलों में मातृभाषा में ही शिक्षण कराया जाता है। इस प्रयास में हिन्दी का योगदान उल्लेखनीय होगा और निगमों में पढ़ने वाले बच्चों का मानसिक विकास तो होगा ही, वह अपने देश के समाज, संस्कृति और जीवन-शैली से भी अवगत होगा। बचपन में पड़े संस्कार प्रायजीवन पर्यंत विद्यमान रहते हैं। वह एक नकलची और रटंतू न बन कर कुशल और मेधावी भी होगा
अतभारत सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगमों से आग्रह है कि वे इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और प्राथमिक स्कूलों में हिन्दी में ही पढ़ाई की व्यवस्था कराएँ। इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का तो विकास होगा ही, साथ में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अनुरक्षण भी होगा और बालक सच्चे भारतीय के रूप में आगे बढ़ेगा

  प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी
सदस्य, केंद्रीय हिंदी समिति, भारत सरकार
महासचिव एवं निदेशकविश्व नागरी विज्ञान संस्थान, गुरुग्राम-दिल्ली                                             
     Kkgoswami1942@gmail.com,   मो : 0-9971553740      
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आदरणीय  सर ,
सादर नमस्कार .
आपका प्रधानमंत्री मोदी जी को लिखा खुला पत्र पढ़ा . गज़ब ..अद्भुत ..। आप जैसे विद्वान् अपनी सजगता के चलते हिंदी का बाल भी बांका नहीं होने देंगे , इस बात का पूरा विश्वास है .समस्त हिंदी - जन की ओर से आपको कोटिश: धन्यवाद और अभिनन्दन सादर !
भारती गोरे 
प्रोफ़ेसर , हिंदी विभाग ,डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय,औरंगाबाद -४३१००४ महाराष्ट्र 
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 महोदय , 
     आपके द्वारा आदरणीय प्रधानमंत्री जी को लिखा गया खुला पत्र काफी सराहणीय प्रयास है और उम्मीद है कि इस प्रयास का कुछ ठोस परिणाम निकलेगा I
प्रीतेश कुमार, priteshkumar1978@gmail.com
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प्रो. जी सादर नमस्कार,
आपने जिस प्रश्न को उठाया है अत्यंत ही विचारात्मक है | मैं कैनेडा से एक हिंदी की पत्रिका पिछले २० वर्षों से हिंदी को बचाने लिए प्रकाशित कर रहा हूँ | विदेशों में काम करने वाले भारत के काउंसिलर आदि कहते तो हिंदी की बातें लेकिन किसी की सहायता नहीं करते | उनका सारा काम अंग्रेज़ी में ही होता है | और यदि हिंदी के विषय में उनसे कोइ बात कही जाय तो उसे ताल दिया जाता | मैं आप इस विचार से सहमत हूँ और अपने इस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थक हूँ  |
हिंदी चेतना सम्पादक श्याम त्रिपाठी 
shiamtripathi@gmail.com
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

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