बुधवार, 30 मार्च 2016

बैंक ऑफ़ बड़ौदा में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रशिक्षण की अनूठी पहल, -डॉ जवाहर कर्णावट

बैंक ऑफ़ बड़ौदा में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रशिक्षण की अनूठी पहल

बैंक ऑफ बड़ौदा ने उत्कृष्ट ग्राहक सेवा तथा ग्राहकों से सहज संवाद एवं तालमेल बढ़ाने की दिशा में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस(21 फरवरी 2016 ) के अवसर पर अपने स्टाफ सदस्यों के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के प्रशिक्षण की शुरुआत कर एक अनूठी पहल की है.अब  बैंक अखिल भारतीय स्थानांतरण नीति के परिप्रेक्ष्य मे  हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों में अपने ऐसे  स्टाफ सदस्यों को हिन्दी भाषा के साथ-साथ उन प्रान्तों की क्षेत्रीय भाषाओं का प्रशिक्षण भी दे रहा है , जिन्हें वहां की स्थानीय भाषा का ज्ञान नहीं हैं. बैंकिंग क्षेत्र में कर्मचारियों के लिए भाषा प्रशिक्षण की ऐसी अनूठी पहल करने वाला बैंक ऑफ़ बड़ौदा देश का पहला सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक है.

इस प्रशिक्षण को दो चरणों में प्रारंभ किया गया है. पहले चरण में नए भर्ती किए गए अधिकारियों को बैंक के प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रारम्भिक प्रशिक्षण के साथ ही स्थानीय भाषा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है तथा दूसरे चरण में हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों में पदस्थ मौजूदा स्टाफ सदस्यों को अपने प्रशासनिक कार्यालयों में स्थानीय भाषा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इस प्रशिक्षण हेतु प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा पढ़ने एवं बोलने हेतु 20 घंटे का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है. पाठ्यक्रम पूर्ण करने पर एक परीक्षा भी ली जाएगी, जिसे उत्तीर्ण करने पर स्टाफ सदस्य को एक हजार रूपये की राशि पुरस्कार स्वरूप दी जाएगी. सप्ताह में एक दिन 2 घंटे प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु भाषा शिक्षक मानदेय के आधार पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. शुरुआती दौर में यह प्रशिक्षण मुंबई एवं पुणे (मराठी), चेन्नै (तमिल), हैदराबाद एवं विशाखापट्टनम (तेलुगु), बेंगलुरू (कन्नड़), बड़ौदा एवं सूरत (गुजराती),कोलकाता (बांग्ला), चण्डीगढ़ (पंजाबी)  में प्रारंभ किया गया है . कुछ अन्य केन्द्रों पर भी यह प्रशिक्षण 1 अप्रैल 2016 से प्रारंभ किया जाएगा.  

-डॉ जवाहर कर्णावट
सहायक महाप्रबंधक,बैंक ऑफ बड़ौदा 
कारपोरेट कार्यालय ,मुंबई ।
022--66985152 
+91 75063 78525  
प्रस्तुत कर्ता: संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
     

विषय: मध्य रेलवे द्वारा राजभाषा एवं राजभाषा संबंधित नियमों /निर्देशों आदि की उपेक्षा के सम्बन्ध में लोक शिकायत


सेवा में,
मुख्य महाप्रबंधक,
राजभाषा निदेशक,
एवं 
मुख्य राजभाषा अधिकारी,
मध्य रेलवे,
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, मुंबई

विषय: मध्य रेलवे द्वारा राजभाषा एवं राजभाषा संबंधित नियमों /निर्देशों आदि की उपेक्षा के सम्बन्ध में लोक शिकायत  

महोदय/महोदया,

पिछले कई वर्षों से मैं मध्य रेलवे द्वारा राजभाषा हिन्दी और राजभाषा संबंधित नियमों /निर्देशों आदि की उपेक्षा देख रहा हूँ आज यह पत्र लिख रहा हूँ जिसके मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

1.     स्टेशनों के नामों की वर्तनी और अन्य सभी निर्देशपटों पर अनेक त्रुटियाँ पाई जाती हैं, उनमें सुधार करवाएँ। त्रुटियों के कुछ उदाहरण - स्वचालीत सीढीयां,कोपरखेरने, घंसोली, थाने, उपर, पुर्व, कल्यान, चुना भटटी, पश्चीम, महीला, मुत्रालय, बाहेर, खांडवा, लो.ति.ट. पर मराठी शब्द आत (प्रवेश) को आंत लिखा गया है आदि
2.     स्टेशनों/उपनगरीय स्टेशनों पर नयी किराया सूची और समय सारणी केवल अंग्रेजी में चिपकाई जाती हैं, हिंदी संस्करण महीनों बाद लगाये जाते हैं.
3.     हार्बर लाइन के उपनगरीय स्टेशनों पर 50% स्थानों पर निर्देशपटों पर सिर्फ मराठी अंग्रेजी का प्रयोग किया गया है जबकि राजभाषा हिन्दी का नहीं.
4.     सुरक्षा जानकारी के लिए आरपीएफ़ 182 की सूचना सभी स्टेशनों/उपनगरीय स्टेशनों पर सिर्फ अंग्रेजी में लगाई गई है.   
5.     मध्य रेलवे की वेबसाइट का मुखपृष्ठ 100 % द्विभाषी बनवाएँ ताकि हिन्दी को प्राथमिकता मिले, हिन्दी वेबसाइट कई सालों से अपडेट नहीं हुई है, हिन्दी वेबसाइट पर कई पृष्ठ खाली पड़े हैं उनमें हिन्दी में नवीनतम जानकारी डालें या पूरी वेबसाइट द्विभाषी कर दें ताकि अंग्रेजी में अपडेट के साथ तुरंत हिन्दी सामग्री भी अपडेट हो सकेगी। 'संपर्क करें' टैब में कोई संपर्क नहीं डाला गया है खाली पड़ा है। 
6.     फेसबुक-ट्विटर पर जानकारी अनिवार्य रूप से स्थानीय भाषा और हिन्दी में डाली जानी चाहिए, डीपी में परिचय एवं डीपी नाम हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में लिखें, फिलहाल सामाजिक संचार माध्यमों पर जानकारी, ट्रेन देरी से चलने, रद्द होने की सूचना सिर्फ अंग्रेजी में डाली जातीहै। स्थानीय भाषा/हिन्दी में जानकारी डालने से  आम जनता को सुविधा होगी।  इसकी कई लोग शिकायत कर चुके हैं.
7.     स्टेशनों पर लगे टीवी पैनलों/टिकट खिड़कियों पर लगी टीवी स्क्रीनों पर सूचनाओं/टिकट की जानकारी में नियमानुसार भाषा क्रम स्थानीय भाषा, हिन्दी और बाद में अंग्रेजी होना चाहिए; वर्तमान समय में इनमें सूचना/जानकारी/टिकट विवरण में भाषा-क्रम "पहले अंग्रेजी, फिर स्थानीय भाषा और अंत में हिन्दी" अपनाया गया है । आज यूनिकोड के अनेक सुन्दर फॉण्ट उपलब्ध हैं टीवी पैनलों/टिकट खिड़कियों पर लगी टीवी स्क्रीनों में उनका इस्तेमाल किया जाए,अब मंगल फॉण्ट के इस्तेमाल की मजबूरी नहीं है। 
8.     कागज रहित (पेपरलेस) टिकट भी त्रिभाषा में होना चाहिए, जो कि वर्तमान में सिर्फ अंग्रेजी में है। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते वे इस सुविधा का इस्तेमाल ही नहीं कर पा रहे हैं यह आम यात्रियों के साथ भाषाई भेदभाव है जिसे तुरंत रोकना चाहिए। कागज रहित टिकट के मोबाइल  एप में तुरंत हिन्दी एवं मराठी का विकल्प जोड़ा जाए। 
9.     प्लेटफार्म टिकट पर स्टेशन का नाम हिन्दी में होना चाहिए और "वैलिड फॉर टू आवर्स" valid for 2 hours के पहले "दो घंटे के लिए वैध" छपना चाहिए। मासिक रेलवे पास पूरी तरह द्विभाषी छपना चाहिए। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते वे न तो पढ़ पाते हैं न इस वाक्य को समझ पाते हैं इसलिए कई बार उन्हें चल टिकट निरीक्षकों (च.टि.नि.) से जूझना पड़ता है। यह आम यात्रियों के साथ भाषाई भेदभाव है जिसे तुरंत रोकना चाहिए। 
10. भारतीय रेल की हिन्दी/ स्थानीय भाषा की घोषणा में भी अंग्रेजी घुस रही है, इसे तुरंत प्रभाव से बंद करें। हिन्दी/स्थानीय भाषा की घोषणाओं में गाड़ी संख्या पहले की तरह हिन्दी/ स्थानीय भाषा में ही बोली जानी चाहिए न कि अंग्रेजी में।  उदाहरण: यात्रीगण कृपया ध्यान दें [हिन्दी में] गाड़ी संख्या वन वन जीरो सेविन टू आज प्लेटफार्म नंबर वन पर आ रही है। मतलब अब आपको गाड़ी संख्या और प्लेटफार्म क्रमांक भी अंग्रेजी गिनती में ही सुनाई देगा। अभी यह व्यवस्था शायद महानगरों तक की गई है हो सकता रेलवे अधिकारी इस बात को समझ चुके हैं कि हिन्दी में गाड़ी संख्या यात्री समझ नहीं सकते हैं इसलिए गाड़ी संख्या अंग्रेजी में ही बोली जानी चाहिए। पर फिर हिन्दी घोषणा भी बंद कर के केवल अंग्रेजी घोषणा ही रहनी चाहिए, जो लोग हिन्दी में बोली गाड़ी संख्या नहीं समझ पा रहे हैं तो वे हिन्दी में की गई घोषणा भला कैसे समझेंगे? यह पिछले दो तीन सालों से चल रहा है निर्णय किसने लिया समझ से परे है। शायद रेलवे के अधिकारी रेलवे की त्रिभाषा नीति से नाखुश हैं इसलिए मिलावट करने लगे हैं रेलवे की हिन्दी, स्थानीय भाषा में की जा  रही घोषणा में गाड़ी संख्या भी हिन्दी, स्थानीय भाषा में की जानी चाहिए।यह आम यात्रियों के साथ भाषाई भेदभाव है जिसे तुरंत रोकना चाहिए। 
11. उपनगरीय ट्रेन टिकट पर स्टेशनों के नाम के अलावा सबकुछ अंग्रेजी में छपता है, उसे भी स्थानीय भाषा और हिन्दी में छापना चाहिए क्योंकि अंग्रेजी जानने वाले कम हैं उनकी सुविधा का तो रेलवे ने ध्यान रखा है परन्तु जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं उनकी सुविधा का ध्यान क्यों नहीं रखा जा रहा है? उदाहरण: please commence your journey within one hour के बदले "अपनी यात्रा एक घंटे के भीतर शुरू करें" मुद्रित होना चाहिए। 
12. स्वचालित टिकट विक्रय मशीनों (एटीवीएम) में स्थानीय भाषा को डिफ़ॉल्ट सेट करवाएँ, मशीन पर छपे निर्देश अथवा स्टीकर रूप में लगे निर्देश केवल अंग्रेजी में नहीं होने चाहिए, उसमें त्रिभाषा सूत्र का पालन करवाएँ तथा नियमानुसार भाषा क्रम स्थानीय भाषा, हिन्दी और बाद में अंग्रेजी होना चाहिए; न कि पहले अंग्रेजी, स्थानीय भाषा और अंत में हिन्दी।
13. स्टेशनों पर लाइसेंस प्राप्त हर दूकान का नामपट (बोर्ड), भोजन-सूची (मेनू), मूल्य-सूची (रेटलिस्ट) आदि में नियमानुसार तीनों भाषाओं के इस्तेमाल का निर्देश जारी करें, ज्यादातर दुकानदार केवल अंग्रेजी का इस्तेमाल कर रहे हैं या कुछेक दूकानदार हिंदी को सबसे छोटे अक्षर में अंग्रेजी से नीचे इस्तेमाल करते हैं।इनमें भी भाषा क्रम स्थानीय भाषा, हिन्दी और बाद में अंग्रेजी होना चाहिए।  इससे आम और खास सभी यात्रियों को सुविधा रहेगी और सिर्फ अंग्रेजी रेटलिस्ट, मेनू के माध्यम से दुकानदार आम ग्राहकों को लूट नहीं सकेंगे।
14. भारतीय रेल ने हमेशा राजभाषा हिन्दी प्राथमिकता दी है पर जबसे नए डिब्बे पटरियों पर दौड़ रहे हैं, उनमें हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है।  पहले आये नए डिब्बों और चेन्नई से हाल में आये नए डिब्बों पर रोमन लिपि में SR बहुत बड़े अक्षरों में लिखा गया है पर कहीं किसी भी डिब्बे पर भी कहीं भी "म.रे." अक्षरों को प्रयोग नहीं किया गया है और चेन्नई से हाल में आये नए डिब्बों पर Central Railway तो लिखा गया है पर "मध्य रेलवे" नहीं।  नए डिब्बों पर प्राथमिक आधार पर अंग्रेजी के समान ही  " म.रे "अक्षरों और  "मध्य रेलवे" को अंकित करवाने की कृपा करें। 
15. राजधानी /शताब्दी गाड़ियों में भोज सूची (मेनू) छापने में हिन्दी की उपेक्षा की जाती है, मेनू पूर्णतः द्विभाषी (हिन्दी -अंग्रेजी) में छपना चाहिए और भाषा क्रम में हिंदी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इन गाड़ियों पर यात्रियों के लिए सिर्फ अंग्रेजी के अखबार ही रखे जाते हैं, हिन्दी-मराठी अथवा गुजराती के अखबार नहीं मिलते हैं, या तो अंग्रेजी के अखबार रखना बंद करें अथवा हिंदी-स्थानीय भाषा के अखबार भी रखवाने की चेष्टा करें। 

आशा है आप सभी बिन्दुओं पर व्यापक यात्रीहित में सकारात्मक सुधार करेंगे, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।  

भवदीय
प्रवीण जैन 
103 ए, आदीश्वर सोसाइटी,
सेक्टर 9 ए, वाशी, नवी मुम्बई 400703
प्रस्तुत कर्ता: संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

मंगलवार, 29 मार्च 2016

यात्रा क्रम तृतीय भाग - पर्यटन से बढ़ाये अनुराग, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' *

यात्रा क्रम तृतीय भाग  - पर्यटन से बढ़ाये अनुराग
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
पुस्तक सलिला-
*
[पुस्तक विवरण- यात्रा क्रम तृतीय भाग, संपत देवी मुरारका, प्रथम

संस्करण नवंबर २०१४, पृष्ठ १८०+३०,  मूल्य ३००/-, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, प्रकाशन तारा बुक एजेंसी, सिद्ध गिरि बाग़, वाराणसी, लेखिका संपर्क- ४-२-१०७ / ११० प्रथम तल, श्रीकृष्ण मुरारका पैलेस, बड़ी चोवडी, सुल्तान बाजार, हैदराबाद, ९४४१५११२३८।]
*
हिंदी साहित्य में यात्रा वृत्तांत अथवा पर्यटन साहित्य को स्वतंत्र विधा के रूप में मान्य किये जाने के बाद भी उतना महत्व नहीं मिला जितना मिलना चाहिए। इसके कारण हैं- १. रचनाकारों का गद्य-पद्य की अन्य विधाओं की तुलना में इस विधा को कम अपनाना, २. इस विधा में रचनाकर्म के लिये सामग्री जुटाना कठिन, व्यय साध्य तथा समय साध्य होना, ३. यात्रा वृत्त लिखने के लिये भाषा पर अधिकार, अभिव्यक्ति क्षमता तथा समृद्ध शब्द भंडार होना, ४. यात्रा के समय पर्यटन स्थल की विशेषता, उसके इतिहास, महत्त्व, समीपस्थ सभ्यता-संस्कृति आदि के प्रति, रूचि, समझ, सहिष्णुता होना, ५. विषय वस्तु को विस्तार और संक्षेप में कह सकने की क्षमता और समझ, ६. वर्ण्य विषय का वर्णन करते समय सरसता और रूचि बनाए रखने की सामर्थ्य जिसे कहन कह सकते हैं, ७. प्राय: लम्बे वर्णों के कारण अधिक पृष्ठ संख्या और अधिक प्रकाशन व्यय को वहन कर सकने की क्षमता, ८. स्थान-स्थान पर जाने का चाव, ९. पर्यटन साहित्य सम्बन्धी मानकों का अभाव, १०. पर्यटन साहित्य पर परिचर्चा, कार्यशाला, संगोष्ठी, स्वतंत्र पर्यटन पत्रिका, पर्यटन साहित्य रच रहे रचनाकारों का कोई मंच/ संस्था  आदि का न होना तथा ११. पर्यटन साहित्य को पुरस्कृत किये जाने, पर्यटन साहित्य पर शोध कार्य आदि का न होना।   

विवेच्य कृति यात्रा क्रम तृतीय भाग की लेखिका श्रीमती संपत देवी मुरारका साधुवाद की पात्र हैं कि उक्त वर्णित कारणों के बावजूद वे न केवल पर्यटन करते रहीं अपितु सजगता के साथ पर्यटित स्थानों का विवरण, जानकारी, चित्र आदि संकलित कर अपनी सुधियों को कलमबद्ध कर प्रकाशन भी करा सकीं। किसी संभ्रांत महिला के लिये पर्यटन हेतु बार-बार समय निकाल सकना,  स्वजनों-परिजनों से सहमति प्राप्त कर सकना, आर्थिक संसाधन जुटाना, लक्ष्य स्थान की यात्रा, आवागमन-यातायात-आरक्षण-प्रवास की समस्याओं से जूझना, समान रूचि के साथी जुटाना, पर्यटन करते समय लेखन हेतु आवश्यक जानकारी जुटना, सार-सार लिखते चलना, लौटकर विधिवत पुस्तक रूप देना और प्रकाशन कराना हर चरण अपने आपमें श्रम, लगन, समय, प्रतिभा, रूचि और अर्थ की माँग करता है। संपत जी इस दुरूह सारस्वत अनुष्ठान को असाधारण जीवट,  सम्पूर्ण समर्पण, एकाग्र चित्त तथा लगन से एक नहीं तीन-तीन बार संपन्न कर चुकी हैं। क्रिकेट खेलने वाले लाखों खिलाडियों में से कुछ सहस्त्र ही प्रशंसनीय गेंदबाजी कर पाते हैं, उनमें से कुछ सौ अपने उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिये याद रखे जाते हैं और अंत में तीन गेंदों पर तीन विकेट लेकर मैच जितने वाले अँगुलियों पर गिने जाने योग्य होते हैं। संपत जी की पर्यटन-ग्रंथ त्रयी ने उन्हें इस दुर्लभ श्रेणी का पर्यटन साहित्यविद बन दिया है। उनकी उपलब्धि अपने मानक आप बनाती है।
दुर्योगवश मुझे यात्रा क्रम के प्रथम दो भाग पढ़ सकने का सुअवसर नहीं मिला सका, भाग तीन पढ़कर आनंदाभिभूत हूँ। ग्रंथारम्भ में लेखिका ने अपने पूज्य ससुर जी तथा सासू जी को ग्रंथार्पित कर भारतीय साहित्य परंपरा में अग्रपूजन के विधान के साथ पारिवारिक परंपरा व व्यक्तिगत श्रद्धा भाव को मूर्त किया है। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ की कुल सचिव सुनीता चंद्रा जी, रंगकर्मी रामगोपाल सर्राफ वाराणसी, श्रेष्ठ-ज्येष्ठ रचनाकारों ऋषभ देव शर्मा जी, डॉ. श्याम सिंह 'शशि' जी, बी. आर. धापसे जी औरंगाबाद, प्रो. शुभदा वांजपे जी हैदराबाद, शिशुपाल सिंह 'नारसरा' जी फतेहपुर सीकर, नथमल केडिया जी कोलकाता, सरिता डोकवाल जी, एन. एल. खण्डेलवाल जी, चंद्र मौलेश्वर प्रसाद जी सिकंदराबाद, शशिनारायण 'स्वाधीन', डॉ. अहिल्या मिश्र हैदराबाद, बिशनलाल संघी हैदराबाद, पुष्प वर्मा 'पुष्प' हैदराबाद, आदि की शुभाशंंषाएँ व सम्मतियाँ इस ग्रन्थ की शोभवृद्धि करने के साथ-साथ पूर्व २ भागों का परिचय भी दे रही हैं। 

पर्यटन ग्रन्थ माला की यह तीसरी कड़ी है। आंकिक उपमान की दृष्टि से अंक तीन त्रिदेव (ब्रम्हा-विष्णु-महेश), त्रिनेत्र (२ दैहिक, १ मानसिक), त्रिधारा (गंगा-यमुना-सरस्वती), त्रिलोक (स्वर्ग-भूलोक-पाताल), त्रिकाल (भूत-वर्तमान-भविष्य), त्रिगुण (सत्व, रज, तम), त्रिअग्नि (भूख, अपमान, अंत्येष्टि), त्रिकोण,  त्रिशूल (निर्धनता, विरह, बदनामी), त्रिराम (श्रीराम, परशुराम, बलराम), त्रिशक्ति (अभिधा, व्यंजना, लक्षणा), त्रि अवस्था (बचपन, यौवन, बुढ़ापा), त्रि तल (ऊपर मध्य, नीचे), त्रिदोष (एक, पित्त, वात), त्रि मणि (पारस, वैदूर्य, स्यमंतक) का प्रतीक है। 

विवेच्य कृति की अंतर्वस्तु ९ अध्यायों में विभक्त है। भारतीय वांग्मय में ९ एक गणितीय अंक मात्र नहीं है। ९ पूर्णता का प्रतीक है। नौ गृह, नौगिरहि बहुमूल्य नौगही (हार), नौधा (नवधा) भक्ति, नौमासा गर्भकाल, नौरतन (हीरा, मोती, माणिक्य, मूँगा, पुखराज, नीलम, लहसुनिया,) नौनगा, नौलखा, नौचंदी, नौनिहाल, नौ नन्द, नौ निधि, कोई भी उपमा दें, ये ९ अध्याय नासिक महाकुंभ की यात्रा, ओशो धारा में अवगाहन, कोलकाता की यात्रा, पूर्वोत्तर की यात्रा, यात्रा दिल्ली की, राजस्थान यात्रा भाग १-२ तथा स्वपरिचय  पाठक को घर बैठे-बैठे ही मानस-यात्राऐं संपन्न कराते हैं।  

३ और ९ (३ का ३ गुना) का अंकशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र तथा वस्तु शास्त्र  के अनुसार विलक्षण संबंध है।  पृष्ठ संख्या १८० = ९ + ३० = ३ योग २१० = ३ इस सम्बन्ध को अधिक प्रभावी बनाता है।  ग्रंथ में शुभ सम्मतियों की संख्या १५ = ६  (३ का दोगुना) है। संपत जी ने नासिक, शिर्डी, दौलतबाडी, कोलकाता,  दार्जिलिंग, गंगटोक, जलपाई गुड़ी, गुवाहाटी, कांजीरंगा, अग्निगढ़, तेजपुर, शिलॉन्ग, चेरापूंजी, दिल्ली, जयपुर, लक्ष्मणगढ़, सीकर, रामगढ, मंडावा, झुंझनू, चुरू, रतनगढ़, बीकानेर, जूनागढ़, रामदेवरा, लक्ष्मणगढ़, रणथंभोर, पुष्कर, मेड़ता, नागौर, मण्डोर, मेहरानगढ़, जैसलमेर, तनोट, पोखरण, बीकानेर आदि ३६ मुख्य स्थानों की यात्रा का जीवन वर्णन किया है। ३६ का योग ९ ही है। संपत जी की जन्म तिथि ३० = ३ है, माह ६ = तीन का दोगुना है। इस यात्रा में लगे दिवस, देव-दर्शन स्थल, प्रवास स्थल आदि में भी यह संयोग हो तो आश्चर्य नहीं।

ओशो धारा में अवगाहन इस कृति का सर्वाधिक सरस और रोचक अध्याय है। यह पर्यटन के स्थान पर ओशो प्रणीत ध्यान विधि में सहभागिता की अनुभूतियों से जुड़ा है। शेष अध्यायों में विविध स्थानों की प्राकृतिक सुषमा,  पौराणिक आख्यान, ऐतिहासिक स्थल, घटित घटनाओं की जानकारी, स्थान के महत्व, जन-जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक झलक आदि का संक्षिप्त वर्णन मन-रंजन के साथ ज्ञान वर्धन भी करता है। इन यात्राओं का उद्देश्य दिग्विजय पाना, नव स्थल का नवेशन करना, किसी पर्वत शिखर को जय करना, राहुल जी की तरह साहित्य संचयन, विद्यालंकार जी की तरह शवलिक के जंगलों की शिकार गाथाओं की खोज, अथवा नर्मदा परकम्मावासियों की तरह  नदी के उद्गम से समुद्र-मिलन तक परिक्रमा करना नहीं है। सम्पत जी ने सामान्य जन की तरह धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक महत्त्व क स्थलों तक जाकर उनके कल और आज को खँगालने के साथ-साथ कल की सम्भावना को यत्र-तत्र निरखा-परखा है।

राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से हर देशवासी को देश के विविध स्थानें की सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, आहार-विहार, कला-कौशल आदि से परिचित होना ही चाहिए। यह कृति अपने पाठक को देश के बड़े भूभाग से परिचित कराती है। अधिकांश स्थानों पर लेखिका ने उस स्थान से जुडी पौराणिक-ऐतिहासिक जनश्रुतियों, कथाओं आदि का रोचक वर्णन किया है। इस प्रयत्न वृत्तांत श्रंखला के माध्यम से लेखिका ने अपन अनाम राहुल सांकृत्यायन, सेठ गोविंददास, देवेन्द्र सत्यार्थी, मोहन राकेश, अज्ञेय, रांगेय राघव, रामकृष्ण बेनीपुरी, निर्मल वर्मा, डॉ. नगेंद्र, सतीश कुमार आदि की पंक्ति में सम्मिलित करा लिया है।

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- समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ९४२५१ ८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com 
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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com 
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद