बुधवार, 23 अगस्त 2017

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिंदी के विरुद्ध हो रहे झूठे अभियान को रोका जाना चाहिए । झिलमिल में प्रणाम पर्यटन



कर्नाटक में हिंदी के विरुद्ध  किए जा रहे  दुष्प्रचार के खिलाफ दक्षिण से आई एक सशक्त आवाज ...

हिंदी के विरुद्ध हो रहे झूठे अभियान को रोका जाना चाहिए । 
  - प्रो. देविदास प्रभु

सभी को प्रोफ.देविदास प्रभु का नमस्कार,

 बेंगलुरु में जो हिंदी का विरोध हुआ है उसका कारण अंग्रेजी पंडितो द्वारा किया जारहा झुठा प्रचार है !अंग्रेजी पंडित कहेते है “हिन्द राष्ट्र भाषा नहीं है २२ राज भाषाओं में से एक है ,संविधान ने सभी भाषाओं को बराबर का दर्जा दिया है मगर सविधान के विरुद्ध एक भाषा हिंदी को बढ़ावा दिया जारहा है”
सच्चाई यह है  कि राजभाषा, राष्ट्रभाषा से कहीं ऊपर का स्थान है । संविधान ने केवल हिंदी को राजभाषा  माना है और उसे अंग्रेजी के स्थान पर लाया गया है !यूरोपीय देशो में राजभाषा है ,अफ्रीका के देशो की भाषाएं राष्ट्रभाषाएँ कहलाती हैं(वे राज भाषाएं नहीं हैं ) !
८वीं अनुसूची की भाषाएँ राजभाषाएं नहीं हैं।   संविधान के अनुच्छेद ३५१ के अनुसार वे केवल राज भाषा हिंदी के विकास केलिए सहयोग देनेवाली भाषाएं हैं !संविधान में सभी जगह Official language शब्द का ही प्रयोग हुआ है, कहीं Official languages (plural) शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है !इसलिए पाठयक्रम में संविधान के १७वे विभाग को बिना कोई बदलाव के जनता के सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए और उसके जरिए अंग्रेजी पंडितो के झुठा प्रचार को बंद करवाना चाहिए !
संविधान सभा में सभी चाहते थे  कि सभी राज्यों में (भाषाओं) हिंदी को सम्राट (राष्ट्रभाषा)का दर्जा दिया जाय ! मगर हमारे अंग्रेजी पंडित कहेते हैं सभी राजा है कोई सम्राट नहीं ! मगर संविधान का प्रावधान क्या है ? एक ही राजा और सम्राट (पुरे देश की राजभाषा ) और अन्य भाषाओं को नोकर का दर्जा दिया है!  Parliamentary Committee on Official language में सभी ८वीं अनुसूची के भाषाओं का प्रतिनधित्व है । वे सभी राजभाषा हिंदी के विकास केलिए राष्ट्रपति को सिफारिश (Recommendations) करें गे ,हाल ही में इस कमिटी ने राष्ट्रपति को सिफारिश की है !
८वि अनुसूची में शामिल होने केलिए होड़ लगा हुवा है ,इस सूचि में शामिल होना किसी भाषा केलिए गर्व की बात नहीं है बल्कि शर्म की बात ही होगी !ये सब भाषाए राज भाषा हिंदी के विकास केलिए सहयोग देंगे !जैसे अंग्रेजी यूरोप की अलग अलग भाषावो का शब्द अपनाकर  विक्सित हुवा है वैसे ही हिंदी को भारत के अलग अलग भाषावो के शब्दों को अपनाकर राष्ट्रीय राज भाषा बनाना सविधान का मकसद रहा है !जब सविधान को लागू ही नहीं कियागया है और अंग्रेजी को ही राज भाषा के रूप में बरकरार रखा है तो ८वीं अनुसूची का क्या ओचित्य है ?
सविधान में संशोधन करके १७वे भाग में अलग सूची बनाकर सब प्रादेशिक राजभाषाओं की एक अलग सूची बनवानी चाहिए  !
हिंदी का विरोध करनेवाले संविधान का सहारा न लें ,तमिलनाडु के १९६० के हिंदी विरोध आन्दोलन में करूणानिधि ने संविधान का १७वे भाग का पन्ना जलाकर विरोध किया था ,अंग्रेजी पंडित भी ऐसा जरुर कर सकते हैं  मगर सविधान का झुठा हवाला देकर हिंदी का विरोध करना बंद करें ! हिंदी के विरोध करनेवालों को यह पता होना चाहिए कि वो संविधान का विरोध कर रहे हैं !
अंग्रेजी पंडित अंग्रेजी को भी भारत का राजभाषा कहेते हैं मगर संविधान ने अंग्रेजी को कहीं राजभाषा नहीं माना है ! Supreme Court और High court में भी राजभाषा हिंदी को लाने का अधिकार Parliamentary Committee on Official language को दिया है वे कभी भी इस बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकती है (Article 344,2,C) ! संविधान के खिलाफ हिंदी को नहीं बल्कि अंग्रेजी को देश पर थोपा जा रहा है !
मैंने बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा सविधान सभा में दिए भाषण पर एक आर्टिकल लिखा है उसका लिंक में यहाँ डाल रहा हूँ जरुर पढ़िए !
धन्यवाद
प्रो.देविदास प्रभु
झिलमिल
----------------------------

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

-- 
वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com
प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

    सोमवार, 21 अगस्त 2017

    Prayas August 2017, issue 46 released



    [वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] स्वतंत्रता दिवस पर स्वभाषा विचार..। राष्ट्रभाषा: मनन-मंथन-मंतव्य - संजय भारद्वाज


    स्वतंत्रता दिवस पर स्वभाषा विचार....।
    ​राष्ट्रभाषा: मनन-मंथन-मंतव्य
    संजय भारद्वाज 
    (अध्यक्ष-हिंदी आंदोलन परिवार  )

    भाषा का प्रश्न समग्र है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भॉंति समझा। आरंभिक आक्रमणकारियों ने संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएं लादने की कोशिश की। बाद में सभ्यता की खाल ओढ़कर अंग्रेज आया। उसने दूरगामी नीति के तहत भारतीय भाषाओं की धज्जियॉं उड़ाकर अपनी भाषा और अपना हित लाद दिया। लद्दू खच्चर की तरह हिंदुस्तानी उसकी भाषा को ढोता रहा। अंकुश विदेशियों के हाथ में होने के कारण वह असहाय था।

    यहॉं तक तो ठीक था। शासक विदेशी था, उसकी सोच और कृति में परिलक्षित स्वार्थ व धूर्तता उसकी सभ्यता के अनुरुप थीं। असली मुद्दा है स्वाधीनता के बाद का। अंग्रेजी और अंग्रेजियत को ढोते लद्दू खच्चरों की उम्मीदें जाग उठीं। जिन्हे वे अपना मानते थे, अंकुश उनके हाथ में आ चुका था। किंतु वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि अंतर केवल चमड़ी के रंग में हुआ था। फिरंगी देसी चमड़ी में अंकुश हाथ में लिए अब भी खच्चर पर लदा रहा। अलबत्ता आरंभ में पंद्रह बरस बाद बोझ उतारने का "लॉलीपॉप' जरुर दिया गया। धीरे-धीरे "लॉलीपॉप' भी बंद हो गया। खच्चर मरियल और मरियल होता गया। अब तो देसी चमड़ी के फिरंगियों की धूर्तता देखकर गोरी चमड़ी का फिरंगी भी दंग रह गया है।

    प्रश्न है कि जब राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा माना जाता है तो क्या हमारी व्यवस्था को एक डरा-सहमा लोकतंत्र अपेक्षित था जो मूक और अपाहिज हो? विगत वर्षों का घटनाक्रम देखें तो उत्तर "हॉं' में मिलेगा। 
    राष्ट्रभाषा को स्थान दिये बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की चौपटराजा प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं। इन परिणामों की तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में अनुभव की जा सकती है। इनमें से कुछ की चर्चा यहॉं की जा रही है।

    राष्ट्रभाषा शब्द के तकनीकी उलझाव और आठवीं अनुसूची से लेकर सामान्य बोलियों तक को राष्ट्रभाषा की चौखट में शामिल करने के शाब्दिक छलावे की चर्चा यहॉं अप्रासंगिक है। राष्ट्रभाषा से स्पष्ट तात्पर्य देश के सबसे बड़े भूभाग पर बोली-लिखी और समझी जाने वाली भाषा से है। भाषा जो उस भूभाग पर रहनेवाले लोगों की संस्क़ृति के तत्वों को अंतर्निहित करने की क्षमता रखती हो, जिसमें प्रादेशिक भाषाओं और बोलियों से शब्दों के आदान-प्रदान की उदारता निहित हो। हिंदी को उसका संविधान प्रदत्त पद व्यवहारिक रूप में प्रदान करने के लिए आम सहमति की बात करने वाले भूल जाते हैं कि राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाषा अनेक नहीं होते। हिंदी का विरोध करने वाले कल यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगीत पर भी विरोध जताने लगें, अपने-अपने ध्वज फहराने लगें, गीत गाने लगें तो क्या कोई अनुसूची बनाकर उसमें कई ध्वज और अनेक गीत प्रतिष्ठित कर दिये जायेंगे? क्या तब भी यह कहा जायेगा कि अपेक्षित राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज आम सहमति की प्रतीक्षा में हैं? भीरु व दिशाहीन मानसिकता दुःशासन का कारक बनती है जबकि सुशासन स्पष्ट नीति और पुरुषार्थ के कंधों पर टिका होता है।

    सांस्कृतिक अवमूल्यन का बड़ा कारण विदेशी भाषा में देसी साहित्य पढ़ाने की अधकचरी सोच है। राजधानी के एक अंग्रेजी विद्यालय ने पढ़ाया- Seeta was sweetheart of Rama! ठीक इसके विपरीत श्रीरामचरित मानस में श्रीराम को सीताजी के कानन-कुण्डल मिलने पर पहचान के लिए लक्ष्मणजी को दिखाने का प्रसंग स्मरण कीजिए। लक्ष्मणजी का कहना कि मैने सदैव भाभी मॉं के चरण निहारे, अतएव कानन-कुण्डल की पहचान मुझे कैसे होगी?- यह भाव संस्कृति की आत्मा है। कुसुमाग्रज की मराठी कविता में शादीशुदा बेटी का मायके में "चार भिंतीत नाचली' का भाव तलाशने के लिए सारा यूरोपियन भाषाशास्त्र खंगाल डालिये। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।

    शिक्षा के माध्यम को लेकर बनी शिक्षाशास्त्रियों की अधिकांश समितियों ने प्राथनिक शिक्षा मातृभाषा में देने की सिफारिश की। यह सिफारिशें आज कूड़े-दानों में पड़ी हैं। त्रिभाषा सूत्र में हिंदी, प्रादेशिक भाषा एवं संस्कृत/अन्य क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान किया जाता तो देश को ये दुर्दिन देखने को नहीं मिलते। अब तो हिंदी को पालतू पशु की तरह दोहन मात्र का साधन बना लिया गया है। सिनेमा में हिंदी में संवाद बोलकर हिंदी की रोटी खानेवाले सार्वजनिक वक्तव्य अंग्रेजी में करते हैं। जनता से हिंदी में मतों की याचना करनेवाले निर्वाचित होने के बाद अधिकार भाव से अंग्रेजी में शपथ उठाते हैं।
     
    छोटी-छोटी बात पर और प्रायः बेबात संविधान को इत्थमभूत धर्मग्रंथ-सा मानकर अशोभनीय व्यवहार करने वाले छुटभैयों से लेकर कथित राष्ट्रीय नेताओं तक ने कभी राष्ट्रभाषा को मुद्दा नहीं बनाया। जब कभी किसीने इस पर आवाज़ उठाई तो बरगलाया गया कि भाषा संवेदनशील मुद्दा है। तो क्या देश को संवेदनहीन समाज अपेक्षित है? कतिपय बुद्धिजीवी भाषा को कोरी भावुकता मानते हैं। शायद वे भूल जाते हैं कि युद्ध भी कोरी भावुकता पर ही लड़ा जाता है। युद्धक्षेत्र में "हर-हर महादेव' और "पीरबाबा सलामत रहें' जैसे भावुक (!!!) नारे ही प्रेरक शक्ति का काम करते हैं। यदि भावुकता से राष्ट्र एक सूत्र में बंधता हो, व्यवस्था शासन की दासता से मुक्त होती हो, शासकों की संकीर्णता पर प्रतिबंध लगता हो, अनुशासन कठोर होता हो तो भावुकता देश के लिए अनिवार्य होनी चाहिए।

    वर्तमान में सीनाजोरी अपने चरम पर है। काली चमड़ी के अंग्रेज पैदा करने के लिए भारत में अंग्रेजी शिक्षा लानेवाले मैकाले के प्रति नतमस्तक होता आलेख पिछले दिनों एक हिंदी अखबार में पढ़ने को मिला। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनरल डायर और जनरल नील-छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के स्थान पर देश में शौर्य के प्रतीक के रूप में पूजे जाने लगेंगे।
    सामान्यतः श्राद्धपक्ष में आयोजित होनेवाले हिंदी पखवाड़े के किसी एक दिन हिंदी के नाम का तर्पण कर देने या सरकारी सहभोज में सम्म्मिलित हो जाने भर से हिंदी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो सकती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। वह सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रभाषा को राष्ट्र भर में मुद्दा बनाएं। 
    अस्सी के  दशक में अफ्रीका का एक छोटा सा देश आज़ाद हुआ। मंत्रिमंडल की पहली बैठक में निर्णय लिया गया कि देश आज से "रोडेशिया' की बजाय "जिम्बॉब्वे' कहलायेगा। राजधानी "सेंटलुई' तुरंत प्रभाव से "हरारे' होगी। नई सदी प्रतीक्षा में है कि कब "इंडिया'की केंचुली उतारकर "भारत' बाहर आयेगा। आवश्यकता है महानायकों के जन्म की बाट जोहने की अपेक्षा भीतर के महानायक को जगाने की। अन्यथा भारतेंदु हरिशचंद्र की पंक्तियॉं - "आवहु मिलकर रोवहुं सब भारत भाई, हा! हा! भारत दुर्दसा न देखन जाई!' क्या सदैव हमारा कटु यथार्थ बनी रहेंगी?

    ( सौजन्य - हिंदी विमर्श)

    वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई


    -- 
    वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
    'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
    संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com

    प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
    murarkasampatdevii@gmail.com  
    लेखिका यात्रा विवरण
    मीडिया प्रभारी
    हैदराबाद
    मो.: 09703982136