मंगलवार, 7 जून 2016

शिलांग (मेघालय) में त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मेलन का भव्य आयोजन





शिलांग (मेघालय) में त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मेलन का भव्य आयोजन
पूर्वोत्तर भारत में नागरी लिपि एवं राष्ट्रीय भाषाओं के
विकास में जुटी है पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी
उत्तर पूर्वी परिषद, शिलांग के सहयोग से पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के द्वारा दिनांक 27 मई 2016 से 29 मई 2016 तक श्री राजस्थान विश्राम भवन, लुकियर रोड, गाड़ीखाना, शिलांग में पूर्वोत्तर भारत में राष्ट्रीय भाषाओं एवं नागरी लिपि के प्रोन्नयन विषय पर त्रि- दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। इस तरह का आयोजन अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष मई-जून महीने में सन् 2008 से किया जा रहा है। इसके पूर्व 2002 में भी अखिल भारतीय लेखक शिविर का आयोजन इस अकादमी द्वारा किया गया था।
उद्घाटन सत्र
दिनांक 27 मई को दोपहर 3.00 बजे इस सम्मेलन का उद्घाटन मुख्य अतिथि श्री शंकरलाल जी गोयनका, समाजसेवी तथा जीवनराम मुंगी देवी पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस सत्र में मुख्य अतिथि के अतिरिक्त अति विशिष्ट अतिथि के रूप में जे. एन. बावरी ट्रस्ट के निदेशक श्री पवन बावरी, नेशनल इन्स्योरेन्स कम्पनी लिमिटेड, गुवाहाटी के प्रबंधक (राजभाषा) श्री जे. पी. शर्मा, वैश्य परिवार के संपादक श्री श्रीहरिवाणी, स्थानीय समाजसेवी एवं अकादमी के संरक्षक श्री पुरुषोत्तम दास जी चोखानी, मौलाना आजाद नेशनल उर्दु यूनिवर्सिटि हैदराबाद, तैलंगाना के सहायक प्रोफेसर डा. पठान रहीम खान, पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के अध्यक्ष श्री बिमल बजाज मंच पर उपस्थित थे। इस सत्र को दौरान अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका पूर्वोत्तर वार्ता एवं कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला छावनी द्वारा प्रकाशित शुभ तारिका के डा. महाराज कृष्ण जैन विशेषांक सहित वैश्य परिवार पत्रिका, साहित्य समीर दस्तक मासिक भोपाल, नव-निकष मासिक कानपुर, गीत गुजन मासिक, अनन्तिम मासिक, श्री रण काफले की कहानी-संग्रह नानी की कहानियाँ, डा. पठान रहीम खान की दो पुस्तकें भीष्म साहनी का कहानी-साहित्य- युग संदर्भ और भीष्म साहनी का कहानी साहित्य-कथ्य एवं शिल्प, विशाल के. सी. की पुस्तक शहीद, श्रीमती अरुणा अग्रवाल की पुस्तक तकाजा है वक्त का और श्री कन्हैया लाल गुप्त सलिल की दो पुस्तकें चिन्तन की चिनगारियाँ और गौशाला का लोकार्पण मंचस्थ अतिथियों ने किया।  इस सत्र का सफल संचालन किया डॉ. अरुणा कुमारी उपाध्याय ने। इस समारोह का शुभारंभ श्रीमती जयमति नार्जरी और श्री अभिषेक सिंह राठौर द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना और भजन के साथ हुआ। श्री बिमल बजाज ने सभी अतिथियों, लेखकों, प्रतिभागियों का स्वागत किया। इस सत्र के दौरान राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन, आकोला, चित्तौड़गढ़ की ओर से श्री बिमल बजाज को पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के विकास के लिए सराहनीय कार्य हेतु अम्बालाल हींगड़ स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। इस सत्र में सभी मंचस्थ अतिथियों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का समापन अकादमी के सचिव डा. अकेलाभाइ के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
काव्य संध्या
शाम 6-30 बजे से काव्य संध्या का आयोजन पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के संस्थापक सचिव डा. अकेलाभाइ की अध्यक्षता में किया गया। जिसमें विभिन्न भाषाओं के कवियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया। इस सत्र का संचालन श्रीमती श्रुति सिन्हा (आगरा), श्री सुरेन्द्र गुप्त सीकर (कानपुर), श्रीमती कीर्ति श्रीवास्तव (भोपाल), श्रीमती जान मोहम्मद (मेघालय), श्री राजकुमार जैन राजन (आकोला) और डा. अकेलाभाइ ने किया। देश के 15 राज्यों के कुल 49 कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। इस काव्य संध्या में कुल 5 सत्र थे तथा समस्त कवियों को मंच प्रदान किया गया और उन्हें गामोछा (खदा) पहना कर सम्मानित भी किया गया।  आभार एवं धन्यवाद ज्ञापन संयोजक डा. अकेलाभाइ ने किया। सुश्री बबीता जैन और मंजु लामा ने सभी कवियों का स्वागत गमोछा (खदा) पहना कर किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी
दिनांक 28 मई 2016 को पूर्वाह्न 10.30 बजे से डा. लक्ष्मी कान्त पाण्डेय, वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिंदी सेवी, संपादक नव निकष हिंदी मासिक, कानपुर, उत्तर प्रदेश की अध्यक्षता में पूर्वोत्तर भारत में राष्ट्रीय भाषाओं और नागरी लिपि का प्रोन्नयन विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आये 17 विशेषज्ञों ने अपने-अपने आलेख पढ़े। इस सत्र का सफल संचालन डा. संगीता सक्सेना, जयपुर, राजस्थान ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में नेशनल इंस्योरेन्स कम्पनी लिमिटेड, गुवाहाटी के प्रबंधक (राजभाषा) श्री जे. पी. शर्मा, अति विशिष्ट अतिथि के रूप में  डा. अमी आधार निडर (आगरा), भयवाद के जनक श्री देश सुब्बा और अतिथि के रूप में श्री हरिवाणी (कानपुर), श्री पुरुषोत्तम दास चोखानी (शिलांग) मंच पर उपस्थित थे। डा. सारिका कालरा, डा. चेतना उपाध्याय, श्रीमती श्रुति सिन्हा, डा. पठान रहीम खान, डा. कौशल किशोर कौशलेन्द्र, डा. प्रभा गुप्ता, श्रीमती सुमिता धर बसु ठाकुर, डा. अशोक वसंतराव मर्डे, श्री रण काफले, श्री देश सुब्बा, श्रीमती कीर्ति श्रीवास्तव, श्री राजकुमार जैन राजन, श्री संजय शर्मा, डा. प्रमिला अवस्थी, श्री श्रीहरि वाणी और पूर्वोत्तर सेवा, आकाशवाणी, शिलांग (मेघालय) के कार्यक्रम अधिकारी श्री प्रतुल जोशी ने अपने-अपने आलेख प्रस्तुत किये। डा. लक्ष्मी कान्त पाण्डेय ने अपने अध्यक्षीय भाषण में सभी विद्वानों के आलेखों की प्रशंसा करते हुए उनकी समीक्षा प्रस्तुत की। अकादमी के इस प्रयास की सहारना करते हुए बताया कि इस तरह के सम्मेलनों के आयोजन से पूर्वोत्तर भारत ही नहीं बल्कि पूरे देश में हिंदी का विकास होगा। हिंदी के विकास के लिए सभी हिंदी सेवियों को एक मंच पर लाना होगा तथा हमें इस कार्य के लिए भरपूर प्रोत्साहन देने का भी आवश्यकता है।  इस संत्र के लिए डा. अकेलाभाइ ने आभार व्यक्त किया।
अखिल भारतीय लेखक सम्मान समारोह
दोपहर 3-00 बजे से अखिल भारतीय लेखक सम्मान समारोह के विशिष्ट अतिथि रूप के रूप में श्री मानस रंजन महापात्रा, निदेशक (आईपीआर), उत्तर-पूर्वी परिषद्, शिलांग, श्री अभय चौधरी, कार्यपालक निदेशक, पावर ग्रिड कॉरेपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रो. हेमराज मीणा दिवाकर, क्षेत्रीय निदेशक, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, गुवाहाटी, प्रो. विद्याशंकर शुक्ल, क्षेत्रीय निदेशक, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, शिलांग, वरिष्ठ साहित्यकार डा. अनिता पण्डा, नेशनल इंस्योरेन्स कम्पनी लिमिटेड, गुवाहाटी के प्रबंधक (राजभाषा) श्री जे. पी. शर्मा, अकादमी के अध्यक्ष श्री बिमल बजाज मंच पर उपस्थित थे। इस सत्र का सफल संचालन डॉ. अरुणा उपाध्याय ने किया। इस सत्र में श्री केशव चन्द्र सकलानी सुमनदेहरादूनउत्तराखण्ड, डा. लक्ष्मी कान्त पाण्डेय,कानपुरउत्तर प्रदेश, डा. प्रमिला अवस्थीकानपुरउत्तर प्रदेश, आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा निशिहररायबरेलीउत्तर प्रदेश, ई. आशा शर्माबीकानेर,राजस्थान, डा. सारिका कालरानई दिल्ली, डा. अखिलेश पालरियासरवाड़अजमेरराजस्थान, श्रीमती कीर्ति शर्माहनुमानगढ़राजस्थान, डा. संगीता सक्सेनाजयपुरराजस्थान, श्री राधेश्याम भारतीयजयपुरराजस्थान, श्रीमती सुधा चौहानइन्दौरम. प्र., श्री हेमचन्द्र सकलानीदेहरादूनउत्तराखण्ड, श्रीमती साधना उपाध्यायजबलपुरम. प्र., श्रीमती रत्ना ओझा रत्नजबलपुरम. प्र., डा. अरुणा अग्रवाल,  मण्डलाम. प्र., डा. चेतना उपाध्याय,अजमेरराजस्थान, श्रीमती श्रुति सिन्हाआगराउत्तर प्रदेश, डा. कौशल किशोर मिश्र कौशलेन्द्रबस्तरछतीसगढ़, श्रीमती शारदा गुप्ताइन्दौरम. प्र., डा. पठान रहीम खानहैदराबादतेलंगाना, श्रीमती रेनु सिरोया कुमुदिनीउदयपुर राजस्थान, डा. किंग गुनु घर्तीआईजॉलमिजोरम, श्री कन्हैया लाल गुप्त सलिलकानपुरउ. प्र., श्री अभिषेक सिंह राठौरकानपुरउ. प्र., डा. सुषमा सिंहआगराउ. प्र., डा. प्रभा गुप्ताआगराउ. प्र., श्रीमती रमा वर्मा श्यामआगरा उ. प्र., श्रीमती सुमिता धर बसु ठाकुरअभय नगरत्रिपुरा, श्री उमेश शर्माहरिद्वारउत्तराखण्ड, श्री मदन मोहन शंखधरइलाहाबादउ. प्र., डा. विजय प्रताप श्रीवास्तवदेवरियाउ. प्र., डा. अशोक वसंतराव मर्डेसोलापूरमहाराष्ट्र, श्रीमती शुभांगी सागरसोलापूरमहाराष्ट्र, डा. पोल कार्तिक वज्रपालतुलजापुरमहाराष्ट्र, श्रीमती शिंदे सुनितातुलजापुरमहाराष्ट्र, श्री रामलाल खटीकचितौरगढ़राजस्थान, श्री संजय शर्मानीमचम. प्र., श्रीमती शारदा शर्मानीमचम. प्र., श्री सुरेश चन्द्र शर्मा,  प्रतापगढ़राजस्थान, श्रीमती शकुन्तला शर्माप्रतापगढ़राजस्थान, श्रीमती सुमन शेखरहिम्मत नगरगुजरात,  हेम रायशोणितपुरअसम, श्री सुरेश गुप्ता राजहंसकानपुरउ. प्र., श्रीमती शीतल बाजपेईकानपुरउ. प्र., श्री अजित सिंह राठौर,कानपुरउ. प्र., श्री सागर सापकोटाशोणितपुरअसम, प्रा. विनोदकुमार विलासराव वायचल वेदार्यमहा., श्री देश सुब्बाहाँगकाँग, श्रीमती सुमेश्वरी सुधी बरदोलोईमोरिगाँवआसाम, श्री रण काफलेकर्बीएंगलांगआसाम, श्रीमती जयमती नार्जरीकर्बीएंगलांगआसाम, डा अमी आधार निडर,आगराउ. प्र., श्री मानस रंजन महापात्र. शिलांगमेघालय, श्री रजनीकांत शुक्ला, दिल्ली, श्री मनीष जैन, दिल्ली, प्रा. डा. येल्लूरे एम. ए.उस्मानाबाद,महाराष्ट्र, श्रीमती रोजी देवी भुइँयाअसम, श्रीमती गीता लिम्बूशिलांगमेघालय, डा. हेमराज मीणागुवाहाटीअसम, श्रीमती संगीता शर्मापुलिस बाजारशिलांग, श्रीमती सुस्मिता दासशिलांग और श्री प्रमोद रामावत प्रमोदनीमच सीटीम. प्र. को उनके समस्त लेखन एवं साहित्यधर्मिता के लिए डा. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। इस वर्ष का केशरदेव गिनिया देवी बजाज स्मृति सम्मान श्री सुरेन्द्र गुप्त सीकरकानपुरउ. प्र. डा. अम्बूजा एन. मलखेडकरगुलबर्गाकर्नाटक, श्री राजकुमार जैन राजन’, अकोलाराजस्थान, श्रीमती कीर्ति श्रीवास्तवभोपालम. प्र., श्री विशाल के. सी.विश्वनाथ चारिआलीअसम, श्री सुरेन्द्र कुमार जायसवाल, कानपुर, श्री जे. पी. शर्मा, गुवाहाटी, असम को हिंदी भाषा, साहित्य एवं नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया। जीवनराम मुंगी देवी गोयनका स्मृति सम्मान भारतीय संस्कृति एवं सामाजिक विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों हेतु श्री संजय अग्रवालरङ्पोसिक्किम और श्री शरद चन्द्र बाजपेईकानपुरउ. प्र. को प्रदान किया गया। जे. एन. बावरी स्मृति सम्मान 2016, श्री रमेश मिश्र आनंदकानपुरउ. प्र., श्री रामस्वरूप सिंह चन्देलकानपुरउ. प्र, श्री सौमित्रमगुवाहाटी को जन कल्याण एवं समामजिक विकास के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए प्रदान किया गया।
सांस्कृतिक संध्या
सायं 6-30 बजे से सांस्कृतिक संध्या का सफल संचालन श्री संजय अग्रवाल ने किया। इस सत्र के मुख्य अतिथि थे श्री देश सुब्बा। इस नृत्य एवं संगीत समागम में, असम प्रदेश का लोकप्रिय बिहु लोक नृत्य, बागरुम्बा लोक नृत्य, आधुनिक गीतों पर आधारित नृत्य, असमीया लोकगीत, भजन, आधुनिक गीत आदि विभिन्न कलाकारों ने प्रस्तुत किया। इस संगीत और नृत्य के रंगारंग कार्यक्रम में श्रीमती जयमती नार्जारी, श्री मिनोती सेनापति, श्री सुरेन्द्र गुप्ता, श्री कन्हैया लाल सलिल, श्रीमती शारदा गुप्ता, श्रीमती सुरेश गुप्त राजहंस, श्रीमती सुमेश्वरी सुद्धी बरदोलाई, साधना उपाध्याय, सुमिता धर बसु ठाकुर, कुमारी अपूर्वा चौमाल रमा वर्मा श्याम, रोजी देवी भुईँयाँ, श्री अभिषेक सिंह राठौर आदि कलाकारों का सराहनीय योगदान रहा। इन सभी कलाकारों को अकादमी की ओर से मुख्य अतिथि ने मेडल एवं स्मृति चिह्न प्रदान किया।
पर्यटन एवं वनभोज
रविवार 29 मई 2016 को कुल प्रतिभागी लेखकों ने बस द्वारा मतिलांग पार्क, मौसमाई गुफा, थांगखरांग पार्क आदि स्थानों  का भ्रमण किया। बस का सफर काफी मनोरंजक था। प्रतिभागियों ने रास्ते भर गीत और संगीत से इस यात्रा को सुखद और मनोरंजन-पूर्ण बना दिया। जिन लोगों ने पहली बार इस सम्मेलन में आये उनके लिए यह पर्यटन कौतूहल भरा था और सभी अपने-अपने कैमरे में क़ैद करने की कोशिश कर रहे थे। दोपहर के भोजन का आनंद सभी लेखकों ने थांगख्राँग पार्क में लिया।  इस तरह चेरापूँजी की बांगला देश की सीमा देखने का आनन्द भी लेखको ने खूब उठाया।
आभार
इस सम्मेलन के आयोजन में उत्तर-पूर्वी परिषद्, केशरदेव गिनिया देवी बजाज चैरिटेबुल ट्रस्ट, जीवनराम मुंगी देवी गोयनका पब्लिक चैरिटेबुल ट्रस्ट, जे. एन. बावरी चैरिटेबल ट्रस्ट, महाबीर जनकल्याण निधि, नेशनल इन्स्योरेन्स (कम्पनी) इण्डिया लिमिटेड, मेसर्स केशरीचंद जयसुखलाल, मेसर्स सीताराम ओमप्रकाश, राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड, वैश्य परिवार पत्रिका, स्टार सिमेन्ट, अजमेरा मार्बल्स, कहानी लेखन महाविद्यालय, असम राइफल्स महानिदेशालय, सीमा सुरक्षा बल, श्री मारवाड़ी पंचायत आदि संस्थाओं के सहयोग और समर्थन के लिए आयोजन समिति ने आभार प्रकट करते हुए अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
डॉ. अकेला भाई 
सचिव (मानद )
पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी 
Po. Rynjah, Shillong 793006 (Meghalaya), INDIA



 पर्यावरण की रक्षा स्वयं की रक्षा।
वैश्विक हिंदी सम्मेलन


अंतिम समय

अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ

एक वृक्ष जाएगा

अपनी गौरेयों-गिलहरियों से बिछुड़कर

साथ जाएगा एक वृक्ष

अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले   
                
'कितनी लकड़ी लगेगी'

श्मशान की टाल वाला पूछेगा

ग़रीब से ग़रीब भी सात मन तो लेता ही है।

लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में

कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार

ताकि मेरे बाद

एक बेटे और बेटी के साथ

एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।

          - नरेश सक्सेना
 डॉ. एम. एल. गुप्ता  ' आदित्य'
वेबसाइट- वैश्विकहिंदी.भारत /  www.vhindi.in

प्रस्तुत कर्ता: संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

सोमवार, 6 जून 2016

विश्व वात्सल्य मंच की वार्षिक गोष्ठी क्राबी में संपन्न



 

 




 

 



 

 

विश्व वात्सल्य मंच की वार्षिक गोष्ठी क्राबी में संपन्न
विश्व वात्सल्य मंच हैदराबाद, के तत्वावधान में रविवार दि. 29 मई 2016 की शाम 4 बजे थाईलैंड में क्राबी स्थित ‘सेंटारा ग्रैन्ड बीच रिसॉर्ट एण्ड विल्लाज-आइलेंड’ के परिसर में मंच की वार्षिक गोष्ठी का आयोजन मदन देवी पोकरणा की अध्यक्षता में आयोजित की गई |

मंच की अध्यक्षा संपत देवी मुरारका एवं प्रधान सचिव राजेश मुरारका ने आज यहाँ जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस अवसर पर मदन देवी पोकरणा अध्यक्ष, मुख्य अतिथि के रूप में विनोद अग्रवाल (एजीक्युटीव डायरेक्टर, मेधा सर्वो ड्राइव्स प्रा.लि., हैदराबाद), विशिष्ठ अतिथि के रूप में भीकमचंद पोकरणा (महावीर हॉस्पिटल के सहमंत्री, हैदराबाद) एवं संपत देवी मुरारका (अध्यक्षा, विश्व वात्सल्य मंच, हैदराबाद) मंचासीन हुए | संपत द्रवी मुरारका ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की | श्रीमती मुरारका ने भीकमचंद पोकरणा, विनोद अग्रवाल का संक्षिप्त परिचय उपस्थित सभा को दिया | अपने संबोधन में सभी ने मंच के उज्जवल भविष्य हेतु अपने-अपने व्यक्तव्य प्रस्तुत किये |

‘ब्लॉगर परिकल्पना’ द्वारा जनवरी माह में संपत देवी मुरारका को “सर्वोच्च शार्क शिखर पुरस्कार” से सम्मानित किये जाने के उपलक्ष्य में मदन देवी पोकरणा ने शॉल एवं मोती माला से उनका अभिनंदन किया | अवसर पर कार्यक्रम संयोजिका गीता अग्रवाल, कोषाध्यक्ष सीता अग्रवाल, सिमरन अग्रवाल, आनिया अग्रवाल, एवं रिसॉर्ट के स्थानीय लोग उपस्थित थे | राजेश मुरारका ने कार्यक्रम का संचालन किया | गीता अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी संपन्न हुई |
संपत देवी मुरारका
अध्यक्षा, विश्व वात्सल्य मंच
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

हिंदी में अँग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि की स्वीकार्यता आखिर किस हद तक ?



वैश्विक ई संगोष्ठी- 2
हिंदी में अँग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि की स्वीकार्यता आखिर किस हद तक ?

पिछले दिनों माखनलाल चतुर्वेदी  पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियालाजी द्वारा  भारत सरकार की माननीय विदेशमंत्री  श्रीमती सुष्मा स्वराज तथा अनेक वरिष्ठ पत्रकारों व विद्वानों की उपस्थिति में देश के कई प्रमुख समाचारपत्रों में अंग्रेजी से आयातित शब्दों के अध्ययन के आधार पर  यह जानने की कोशिश की गई कि किस प्रकार  मीडिया में के शब्द किस-किस प्रकार आवश्यक, अनावश्यक या जबरन हिंदी में प्रवेश कर रहे हैं या करवाए जा रहे हैं।इस पहल को आगे बढ़ाते हुए 'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' द्वारा  इस विषय पर वैश्विक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। प्रस्तुत हैं कुछ संक्षिप्त विचार ।

डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य', वैश्विक हिंदी सम्मेलन ।
हिंदी या भारतीय भाषाओं से आए सभी शब्दों व प्रयोगों निषेध ही करना है ऐसा नहीं है। आवश्यकतानुसार विवेकसंगत रूप से कुछ चीजें लेना हमारी भाषाओं के हित में होगा । लेकिन समस्या यह है कि अंग्रेजी अपने चौतरफा हमलों से भारतीय भाषाओं को लीलती जा रही है और भाषाओं के सेनापति व सिपाही भाषा-विलास और हास - परिहास से बाहर आने को तैयार ही नहीं हैं। अंग्रेजी के आक्रमण और साम्राज्यवादिता के चलते भाषाओं को लीलने की समस्या अकेले हिंदी की नहीं है बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं की भी कमोबेश यही स्थिति है। यहाँ एक कटु सत्य की ओर भी ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि  भारत में भारतीय भाषाओं के लिए स्थापित सरकारी संस्थाओं  व गैर सरकारी  हजारों संस्थाएँ हैं। केवल हिंदी की संस्थाओं का आंकड़ा ही हजारों में होगा जो साल भर भाषा और साहित्य की कथित सेवा, विकास आदि के नाम पर शॉल- श्री फल. सम्मान, पुरस्कार, अभिनंदन का आयोजन करते रहते हैं । इनमें लाखों पात्र- अपात्र उपकृत होते हैं ।

साहित्यकारों कवियों, हिंदी सेवियों और  हिंदी प्रमियों की संख्या तो और बड़ी है। दुनिया में इतनी बड़ी संख्या किसी अन्य भाषा के चिंतकों और सेवियों की नही होगी । इन कथित हिंदी सेवियों, हिंदी संस्था-चालकों, पुरस्कार-वितरकों और सम्मान व पुरस्कार बटोरुओं में से कितनों ने भाषा की इस दुर्गति को रोकने के लिए कलम या जुबान चलाई । ले दे कर मुश्किल से उंगलियों पर गिने जाने वाले कुछ नामों को छोड़ कर इस बारे में सन्नाटा पसरा है। अखबार मालिक, प्रबंधन व संपादक आदि सरेआम प्रतिदिन मिलकर अपनी ही  भाषा का चीरहरण करते आ रहे हैं और लाखों चौकीदार लाभ-लोभ या उदासीनता -विवशता की भांग खा कर सो रहे हैं।
जिस देश में भाषा साहित्यकार- लेखक और भाषा-सेवी तक अपनी भाषा की दुर्गति के प्रति उदासीन हों वहाँ सुघार की गुंजायश बचती ही कहाँ है।  ऐसे में माखनलाल चतुर्वेदी  पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा वैज्ञानिक रूप से अध्ययन के माध्यम से  उच्च स्तर पर आयोजित संगोष्ठी सराहनीय तो है लेकिन भाषा का चीरहरण करनेवालों को रोकने में कितनी या किस हद तक कारगर होगी, यह एक बड़ा प्रश्न है। 
मेरा मानना है कि यदि हमारी भाषा अकादमियाँ , भाषा व साहित्य की लाखों संस्थाएँ, लाखों भाषा-सेवी, साहित्यकार अपनी भाषा की दुर्दशा सुधारने के लिए मात्र खड़े हो जाएँ तो करोड़ों भाषा-प्रेमी  भी स्वत: साथ आ जाएँगे । तब दशा व दिशा बदलना कठिन न होगा। पर लाभ-लोभ, विवशता या उदासीनता की बेडियों  में कैद  हिंदी-प्रमियों में कहीं कोई जागरूकता का उफान आएगा लगता नहीं । राहुलदेव जी , डॉ वेदप्रताप वैदिक जी जैसे भाषा -प्रेमी वरिष्ठ साहित्यकारों से कुछ उम्मीद अवश्य है। हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर गठित भारतीय -भाषा मंच भी इस दिशा में सार्थक प्रयास करता दिख रहा है। नागरी लिपि परिषद जैसी कुछ संस्थाएँ, कई संस्थान, बालेंदू शर्मा दाधीच, डॉ. औम विकास जैसे भाषा-प्रौद्योगिकीविद्  और कुछ हिंदी सेवी आदि भी हैं।
इसमें विदेशी पूंजी की भूमिका की बात और अन्य आर्थिक दबावों की भी बात उठती रही है । संविधान के अनुच्छेद - 351 में संविधान ने भी संघ को इसके लिए जो दायित्व सौंपे हैं उनके अंतर्गत इस दिशा में विधिक प्रावधान किए जा सकते हैं।
डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य', वैश्विक हिंदी सम्मेलन ।
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आशा मोर ,टिृनिडाड और टोबेगो
आदरणीय आदित्य जी , 
सादर नमस्कार , 
आपका प्रयास अतुलनीय है। 
आदरणीय स्नेह ठाकुर जी का विचार अत्यंत ही सुलझा हुआ और अच्छे सुझावों से युक्त है । में उनके इस पत्र से पूरी तरह सहमत हूँ । मैं तो बस एक छोटी सी , साधारण सी इकाई हूँ , लेकिन किसी भी विचार की पुष्टि के लिये बहुमत अनिवार्य होता है और प्रत्येक पानी की बूँद का अपना महत्व होता है । इसलिये मैं तो बस उनके विचार की सम्मति में अपना वोट डालने का कार्य कर रही हूँ।
मैं अपनी हिन्दी भाषा पर सदैव गर्व करती हूँ और सभी हिन्दी प्रेमियों से स्नेह रखती हूँ । 
सादर, 
आशा मोर ,टिृनिडाड और टोबेगो 
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मंजु रानी सिंह
हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की स्वीकार्यता कहीं-कहीं यदि जरुरी लगे तो देवनागरी लिपि में लिखा जा सकता है,बल्कि इसका तो प्रचलन भी है,पर देवनागरी लिपि को समाप्त करने के बिल्कुल खिलाफ हूँ मैं। ऐसा इसलिए कि हिंदी के अनेक शब्द मर जायेंगे।भाषा के सन्दर्भ में सबसे महतेपूर्ण बात यह है कि कर्म मरता है तो शब्द मरता है,इसलिए जो कर्म जीवित हैं और उसके लिए शब्द भी जीवित हैं उन्हें अंग्रेजी के फैशन में मरने देना सांस्कृतिक अपराध होगा।
अभी-अभी मैं 'कोष्ठ' शब्द भूल जा रही थी और ब्रैकेट शब्द का प्रयोग करने जा रही थी जबकि मैंने बारहवीं कक्षा तक हिंदी में तथा देवनागरी लिपि में विज्ञान(साइंस) की पढ़ाई की है,तब बिहार ,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश आदि हिंदी भाषा -भाषी प्रदेशों में विज्ञान की किताबें हिंदी और देवनागरी में प्रचलित थीं।अब उसके खरीदार ही नहीं रहे तो मिले ही क्यों?पर इससे यह तो प्रमाणित होता ही है कि हिंदी में विज्ञान की पढाई संभव है, और भी बहुत तर्क हो सकते हैं,पर हमारी अगली पीढ़ी को कैसे  इस भाषिक संस्कृति की प्रतिबद्धता से कैसे जोड़ा जाये?
आप ऐसी चिंताएं कर रहे हैं यही एक सकारात्मक तथ्य है,शायद।
मंजु रानी सिंह

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योगेंद्र जोशी
यह सब इसलिए है क्योंकि भारतीयों में स्वाभिमान का अभाव है चाहे जो भी क्षेत्र आप ले लें। चाहे भाषाई स्वाभिमान हो या सांस्कृतिक स्वाभिमान या पारंपरिक जीवन-शैली की बात वे उन्हें त्यागते जा रहे हैं और जो कुछ पाश्चात्य है उसको अपनाते जा रहे हों। संभव है कि अधिसंख्य भारतीय अभी भी कुछ स्वाभिमान रखते हों, किंतु जिनके हाथ में देश की व्यवस्था है - चाहे अर्थ-व्यवस्था हो, समाचार-माध्यम हो, राजनीति और शासकीय व्यवस्था हो, शिक्षा हो, वे सब अंगरेजी के वर्चस्व को स्वीकार करके ही मैदान में उतरे हैं। उनमें न तो हिंदी के प्रति सम्मान है और न ही इतनी काबिलियत कि बिना अंगरेजी के शब्दों के वे हिन्दी में बात कर सकें। कारण स्पष्ट है कि किसी भी क्षेत्र में आपका प्रवेश अंगरेजी में संपन्न चुनाव-विधि पर आधारित रहता है। हिन्दी समाचार पत्र अंगरेजी अनुवाद पर आधारित हैं उनके अनुवादक संतोषप्रद हिंदी-ज्ञान रखते ही नहीं। उनका आगे बढ़ने की सीड़ी तो अंगरेजी ही रहती है। इसलिए हिन्दी को लेकर रोना कोई माने नहीं रखता। हिन्दी को बिगाड़ने वाले हिन्दी-भाषी ही हैं। जब आप उसी टहनी को काट रहे हों जिस पर बैठे हों तो परिणाम क्या होगा? 

जिस समाज के लोग अपने देश को "भारत" कहने के बजाय "इंडिया" कहना पसंद करते हों, हर क्षेत्र में अंगरेज और अग्रेजियत पर उतर आये हों, मां-बाप को डैड-मॉम कहना बेहतर समझते हों, पारंपरिक संबोधनों को छोड़ अंगरेजी सम्बोधनों यथा हज़्बैंड, वाइफ़, ब्रदर-इन-लॉ, सिस्टर-इन-लॉ आदि कहना शुरू कर चुके हों, अंगरेजी शैली में जन्मदिन-केक काटते हों और मोमबत्तियां बुझाते हों, अभिवादन में गुडमॉर्निंग-गुडईवनिंग कहते हों, अंगरेजी-अमेरिकी त्योहार मनाने का उत्साह पालते हों, उस समाज में आप हिंदी-अंगरेजी की खिचड़ी न परोसें यह कैसे उम्मीद करते हैं? सबसे बड़ी बात यह है कि हमारा देश वाकई स्वतंत्र है जहां लोगों को अपनी मर्जी का कुछ भी करने  की पूरी छूट है; वे क्या खायें, क्या पहनें, कैसे बोलें, आदि पर कोई रोक-टोक तो यहां एक प्रकार का अपराध है। लोगों को अपनी सुविधानुसार भाषाओं को विकृत करने और उनकी लिपियों को बदलने की पूरी छूट है। है संविधान में इसके विरुद्ध कोई आदेश? नहीं न? तो शांत होकर देखते रहिए: आगे होता है क्या।
योगेंद्र जोशी
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नरेंद्र सहारकर

जहाँ तक मुझे याद है कि माननीया विदेश मत्री व विदूषी महोदया ने उस समय कहा था कि "भाषा का कोमार्य भंग हो चुका है" |  किंतु मैंने तो अनेकों बार लिखा है कि हिंदी और हमारी प्रादेशिक भाषाओं पर हर समय जानबूझकर बलात्कार हो रहा है, करने वाले , देखने वाले तथा न्यायाधीश भी हम ही हैं किंतु बलात्कारी खुले आम घुमक्कड बन फ़िर रहा है …………।फ़िर  …। बलात्कार करने की तैयारी कर रहा है ………………।

नरेंद्र सहारकर

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दिव्या
Waah, Sneh ji, aisa saargarbhit lekh maine pehli baar padha hai, atma tript ho gayi, bahut vahut badhai. Asha karti hoon ki apke us lekh ko sammelan mein padh kar sunaya jayega taaki aapke sundar aur sateek vichaar adhik se adhik janta tak pahunchein....
Sasneh, Divya
( आशा है दिव्याजी जल्द ही देवनागरी में मोबाइल/कंप्यूटर पर टाइपिंग सीख लेंगी।)


 वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
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प्रस्तुति : संपत देवी मुरारका (विश्व वात्सल्य मंच)
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लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी

हैदराबाद