गुरुवार, 6 अगस्त 2020

वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य' के लेख 'आओ हिंदी-हिंदी खेलें।' कुछ प्रतिक्रियाएँ...।

  
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डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'  के लेख

 'आओ हिंदी-हिंदी खेलें।'
 कुछ प्रतिक्रियाएँ...


आदरणीय डॉ. आदित्य जी,
आपका आलेख  हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर सूक्ष्मता से प्रकाश डालते हुए अत्यन्त सशक्त और सार्थक है। मेरे भी कई लेख इस सन्दर्भ में आपने अपने पत्र में प्रकाशित किये थे ।  मेरी आपसे पूर्णरूपेण सहमति है। हमें गोष्ठियों के अतिरिक्त भी हिन्दी सीखने- सिखाने के व्पवहारिक पक्ष के लिये सचेत होकर अत्यधिक परिश्रम करने की आवश्यकता है, जिस से नई पीढ़ी का हिन्दी-ज्ञान और उसके प्रति उनकी निष्ठा सुदृढ़ हो सके।
शकुन्तला बहादुर
 कैलिफ़ोर्निया

जब चपरासी तक की नौकरियों में भी अंग्रेजी अनिवार्य रहेगी तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. यह ऐसा मुल्क बन चुका है जहां का नागरिक चाहे देश की सभी भाषाओं में निष्णात हो किन्तु एक विदेशी भाषा अंग्रेजी न जानता हो तो उसे इस देश में कोई नौकरी नहीं मिल सकती और चाहे वह इस देश की कोई भी भाषा न जानता हो और सिर्फ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी जानता हो तो उसे इस देश की छोटी से लेकर बड़ी तक सभी नौकरियाँ मिल जाएंगी. छोटे से छोटे पदों से लेकर यू.पी.एस.सी. तक की सभी भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का दबदबा है. उच्चतम न्यायालय से लेकर 24 में से 20 उच्च न्यायालयों में सारी बहसें और फैसले सिर्फ अंग्रेजी में होने का प्रावधान है. यहां किसी भी भारतीय भाषा के लिए जगह नहीं है. यह ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है जहां के नागरिक को अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी वकील को पैसे देने पड़ते हैं. मुकदमों के दौरान मुवक्किल को पता ही नही होता कि वकील और जज उसके बारे में क्या सवाल-जबाब कर रहे हैं. ऐसे माहौल में कोई अपने बच्चे को अंग्रेजी न पढ़ाने की मूर्खता कैसे कर सकता है ?


जिस अमेरिका और इंग्लैंड की अंग्रेजी हमारे बच्चों पर लादी गई है उस अमेरिका और इंग्लैण्ड में पढ़ाई के लिए जाने वाले हर सख्स को आइइएलटीएस ( इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम ) अथवा टॉफेल ( टेस्ट आफ इंग्लिश एज फॉरेन लैंग्वेज) जैसी परीक्षाएं पास करनी अनिवार्य हैं. दूसरी ओर, हमारे देश के अधिकाँश अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में बच्चों को अपने देश की राजभाषा हिन्दी या मातृभाषा बोलने पर दंडित किया जाता है और सरकारें कुछ नहीं बोलतीं. यह गुलामी नहीं तो क्या है? बेशक गोरों की नहीं, काले अंग्रेजों की गुलामी. गुलाम व्यक्ति ही सोचता है कि मालिक भाषा बोलेंगे तो फायदे में रहेंगे. हमारे देश में आज भी 'काले अंग्रेजों' का ही शासन है. देशी विदेशी पूंजीपतियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर उन्ही के इशारों पर कानून बनते हैं. व्यूरोक्रेसी, इसी व्यवस्था रूपी मशीन के कलपुर्जे हैं जिनका काम उसे सुचारु रूप से संचालित करना है. 

बदलाव तभी आएगा जब अंग्रेजी की अनिवार्यता सरकारी नौकरियों से, न्यायपालिका और कार्यपालिका से हटेगी. क्या सत्ता पर बैठे लोग इसे होने देंगे? इसी अंग्रेजी के बल पर उनके बच्चे ऊंची कुर्सियों पर पहुँचते हैं. अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने की मूर्खता वे क्यों करेंगे? इसके लिए व्यापक जनान्दोलन की जरूरत है. 

आपका लेख देखकर खुशी भी हुई और आश्चर्य भी. यह लेख नहीं, आपके भीतर से फूटने वाली पूरी तरह ईमानदारी से व्यक्त अंतरात्मा की आवाज है. ऐसा लेख अमूमन आप नही लिखते. यह लेख उम्मीद पैदा करता है. मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ग्रहण कीजिए।

प्रो. अमरनाथ शर्मा।

   

आपने बहुत वाजिब सवाल  उठाया है। 

शशिकला त्रिपाठी, वाराणसी 

आदरणीय आदित्य जी के विचारों से मैं भी सहमत हूँ मुझे  अपने बचपन में पब्लिक स्कूल में जाने का अवसर नहीं मिला इसलिए अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढाया ।लेकिन वास्तव में हम अपने बच्चों को उनके वास्तविक परिवेश से काट देते हैं ।वे जीवन के धरातल को  अपने अवचेतन में गहराई से अनुभव कर नहीं पाते हैं और मेरा तात्पर्य मध्यमवर्गीय परिवार  की दैनिक चुनौतियों से  है जो दिखती नहीं हैं फिर भी सालों तक असर डालते हुए  व्यक्ति को अपने ही परिवार में वानप्रस्थ आश्रम का अनुभव कराने  का सामर्थ्य रखती हैं।
सुष्मा शर्मा

भारत के नीतिकारों ने कहा- सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं। हिन्दी रूपान्तर की आवश्यकता नहीं। सभी परिचित हैं। देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पास तीन बन्दरों की मूर्तियाँ थीं। एक ने कान बन्द कर लिए, दूसरे ने मुँह बन्द कर लिया और तीसरे ने आँखें मूँद लीं। न बुरा सुनो, न बुरा बोलो, न बुरा देखो। वाह! यह देश तो बड़ा महान है! बुराई की ओर से आँख फेर लो तो क्या वह अस्तित्वहीन हो जाएगी? इस देश का बुद्धिजीवी इसी को बहुत बड़ी समझदारी मानता आया है। मेरे तईं यह हद दर्ज़े की अवसरवादिता है। अपना उल्लू सीधा करो और निकलो। मस्त राम मस्ती में, आग लगे बस्ती में। डॉ. गुप्ता का सन्दर्भाधीन आलेख इस मध्यवर्गीय, बुर्जुआ सोच की धज्जियाँ उड़ाता है। हिन्दी को लेकर देश की कथनी और करनी में कितना भेद है! इतना बड़ा छलावा! ऐसा कपट! इस विडंबना को तार-तार करके, समस्या की रेशा-रेशा मीमांसा की माँग करता है यह आलेख,

वास्तव में कितना बड़ा अमला हिन्दी की सेवा के लिए नियुक्त है? किन्तु वस्तुतः उसका अधिकांश पंचतंत्र में वर्णित मूर्ख मित्र है, जो अपने ही अवलंब का अहित करता आया है। इस अमले में कितने लोगों का दिल हिन्दी के लिए धड़कता है? केवल आत्म-चिन्तन करें। किसी को उत्तर देने की आवश्यकता नहीं। अपने अन्तर्मन के प्रति जवाबदेह बनें, बशर्ते वह इतने छद्मों का विष सहने के बाद भी कहीं जीवित बच रहा हो।

सच्ची मंशा होती तो आज देश में विपुल मात्रा में मौलिक ज्ञान-साहित्य हिन्दी में उपलब्ध होता। किन्तु वह तो कहीं दिखता नहीं। अव्वल तो समाज में पठनशीलता ही तिरोहित हो चली, और फिर हिन्दी! एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा। हिन्दी समाज अपनी भाषा के प्रति कितना कृतघ्न है, यह किसी से छिपा नहीं। एक-एक कर हमारी सभी स्तरीय पत्रिकाएं बन्द हो चलीं। हमारे दैनिक भी अंग्रेजी के उच्छिष्ट पर जीवित हैं। और उनकी भाषा? वह भी अंग्रेजी के प्रेत से ग्रसित है।

न्यायपालिका ने तो कसम खा ली है कि वह हिन्दी तो क्या, सरल बोधगम्य अंग्रेजी में भी काम नहीं करेगी। अगर लोकतंत्र लोक के द्वारा, लोक के लिए, लोक का होता है, तो लोक-भाषा को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंगीकार करने में क्या बाधा है? संविधान में प्रावधान करने मात्र से क्या होता है? कानून बना देने मात्र से क्या होता है? बकौल किरण रिजेजू उत्तर भारत के लोगों को कानून तोड़ने में विशेष आनन्द आता है। कानून का प्रवर्तन न कर सकें तो वह कागज का एक टुकड़ा मात्र बनकर रह जाता है। और लोकतंत्र? उसके बारे में सुदामा प्रसाद पाण्डेय धूमिल की एक बड़ी ही भदेस टिप्पणी है, जो यहाँ उद्धृत करना उचित नहीं। सुपठ लोग समझ गये होंगे।

कुल मिलाकर यही लगता है कि तमाम अमले, तमाम कविता-किस्से, सेमिनार, विश्व-सम्मेलन, ढोल-नगाड़े, बारात, शहनाई, ताम-झाम के बावजूद हिन्दी की दशा बड़ी ही दयनीय है। उसके साथ कितना बड़ा छल हुआ है, यह केवल वही लोग समझ सकते हैं, जिनका दिल हिन्दी के लिए धड़कता है। और यकीन मानिए, उस दिल ने धड़कने के साथ-साथ अब रोना भी शुरू कर दिया है। हा! हिन्दी! क्या इसीलिए तुझे राजभाषा बनाया गया था? क्या इसीलिए तुझे देश के महान नेताओं ने भारत की प्रतिनिधि भाषा निरूपित किया था! डॉ. गुप्ता के प्रस्तुत आलेख से सहमति के अलावा कोई त्राण नहीं। साधुवाद, मित्रवर।

डॉ. आर.वी. सिंह,

उप महाप्रबंधक. सिडबी, लखनऊ

सादर प्रणाम,गुरूवर।
आपके विचार अति महत्वपूर्ण, विचारणीय एवं समीचीन हैं। यदि वर्तमान स्थिति में कुछ सकारात्मक कदम उठाए जाएं तो निश्चित रूप से भविष्य में हिंदी को गति और प्रगति दोनों मिल सकती है।
तेजवीर सिंह, नागपुर

क्या अपने बच्चों को अधूरा व्यक्तित्व प्रदान करने हम अपनी भूमिका से अनभिज्ञ हैं। क्या स्वयम् हम अपने माता-पिता के प्रति उतने कृतज्ञ हैं जितने वे अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ रहे हैं। और अपने बच्चों से क्या आशा रखें ।हम अपने अंदर से इतने कमजोर क्यों हैंऔर इतना क्यों डरते हैं । निर्णय लेने के लिए  स्वाभिमान की जरूरत होती है संसाधनों की नहीं ।

हिन्दी हमारा संस्कार है ।यह हमारे मनऔर मस्तिष्क की भाषा है ।इसके बिना हम सिर्फ एक धनोपार्जन की मशीन हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं वास्तव में ही कुछ भी नहीं हैं। जीवन खेल नहीं है और ना ही प्रयोगशाला। अगर हम अपने परिवार के पूर्वजों के चरित्र के प्रति समर्पित हैं तो व्यर्थ के आडम्बर छोड़कर संयमित शैलीऔर बोधगम्य  शब्दावली के प्रति समर्पित रहना ही होगा ।
सुष्मा शर्मा

"ढलान" बदलने के लिये, इस युग में पहला कदम हो सकता है:।  एक अंग्रजी-हिन्दी अनुवादक का जन-सहयोग से निर्माण जो गूगल के अंग्रजी-हिन्दी अनुवादक से पर्याप्त अच्छा हो.
विनीत चैतन्य

अधिकतर सरकारी विभागों में अंगरेजी जानने वाले बैठकर देश के महत्वपूर्ण कार्यों में अनावश्यक विलम्ब और भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं ---- अंग्रेजीयत और ईसाईयत में घनिष्ठ संबंध है --- ये दोनों देश में अमीर गरीब की खाई को बढ़ाते जा रहे हैं -- यदि हमें न्यायसम्मत व्यवस्था बनानी है तो स्थानीय भाषाओं को महत्व देने के साथ ही साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जबरदस्त लड़ाई लड़नी पड़ेगी क्योंकि हिंदी ही अंग्रेजी का विकल्प बन सकती है -- ये देश को लूटने वाले गिरोह जानते हैं -- 

वे हिंदी के विरोध में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं -- प्रतिरोध के लिए हिंदी प्रेमियों को भी दो गुनी तैयारियां करनी होंगी ---🙏
हिन्दी का मुकाबला केवल अंग्रेजी से है अन्य भारतीय भाषाएँ तो हिन्दी की सगी बहनें हैं और बहनों में आपस में बहुत प्यार होता है---
डॉ. अशोक कुमार तिवारी

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 आओ हिंदी-हिंदी खेलें।...
को निम्नलिखित लिंक पर पढ़ सकते हैं।
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ई-संगोष्ठी सूचना
वर्तमान में शोध लगातार  अन्तरानुशासनिकता  की ओर आगे बढ़ रहे हैं.  ऐसे में यह जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा कि साहित्य और 
अन्य विभिन्न अनुशासनों/ विषयों की अवधारणाएँ, सिद्धांत और प्रविधियाँ एक दूसरे के लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं.

आइए, साहित्य ( Literature) के साथ दर्शन ( Philosophy), राजनीति विज्ञान ( Political Science), समाजशास्त्र ( Sociology), प्रबंधन अध्ययन ( Managemnet studies), मनोविज्ञान (Psychology) और इतिहास (History) में  अंतरानुशासिक शोध ( Interdisciplinary research) और इसकी संभावनाओं पर विचार-विमर्श 

'प्रज्ञानम् इंडिका' द्वारा आयोजित निम्नलिखित ई-संगोष्ठी में.
#साहित्य और अन्तरानुशासनिकता: शोध की भावी दिशाएँ"
08 - 09 अगस्त (शनिवार-रविवार), 11.00 से 1 बजे.

फ़ेसबुक लाइव पर : fb.com/prajnanam.indica  ट्विटर : https://twitter.com/PrajnanamIndica

#पंजीकरण लिंकhttps://rb.gy/gqh91n
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

murarkasampatdevii@gmail.com  

लेखिका यात्रा विवरण

मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

मो.: 09703982136

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