गुरुवार, 20 अगस्त 2020

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] आओ हिंदी-हिंदी खेलें।

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आओ हिंदी-हिंदी खेलें।

 डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'  

विश्व में जितनी संस्थाएं हिंदी की सेवा के लिए बनी हुई हैं, उतनी संस्थाएँ किसी अन्य भाषा के लिए नहीं हैं। जितने संवैधानिक प्रावधान, अधिनियम, नियम आदि और संसदीय समिति सहित तरह-तरह की समितियां, संगठन और हिंदी के विकास व प्रसार के लिए संघ सरकार और विभिन्न राज्यों में भाषा के लिए पूरे विभाग, देश के विभिन्न राज्यों में हिंदी की अकादमियाँ, भाषा के लिए इतना बड़ा ढांचा विश्व में शायद कहीं नहीं। संघ सरकार के स्तर पर, राज्य सरकारों और उनके  विभिन्न संस्थानों आदि द्वारा जितने कार्यक्रम, प्रतियोगिताएँ, परिचर्चाएँ, संगोष्ठियाँ, सम्मेलन, बैठकें और नृत्य, गीत-संगीत के कार्यक्रम आदि हिंदी के लिए होते हैं, विश्व में कहीं नहीं।
 लेकिन दूसरी तरफ इन सबके बावजूद भी आज भी देश में थोड़ा बहुत हिंदी का इस्तेमाल भले ही होता हो लेकिन अधिकांश कार्य अंग्रेजी में ही होता है। स्वतंत्रता के समय देश की 99% से भी बहुत अधिक लोग मातृभाषा में ही पढ़ते थे। लेकिन अब छोटे-छोटे गांवों तक अंग्रेजी माध्यम पसर चुका है। हिंदी को देश-विदेश में फैलाने वाली हिंदी फिल्में और धारावाहिक आदि भी अब हिंदी के चलते-फिरते जीवित शब्दों के स्थान पर जमकर अंग्रेजी के शब्दों को स्थापित कर रहे हैं। यही नहीं अब तो अनेक समाचार पत्र, पत्रिकाएं और चैनल आदि भी देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का प्रयोग भी करने लगे हैं। स्कूलों से हिंदी के विद्यार्थी तेजी से घटते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी का केंद्र माने जाने वाले राज्य में भी हिंदी में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत बड़ी है। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की कमी के चलते हिंदी विभाग बंद हो रहे हैं या विद्यार्थी जुटाने का दायित्व भी प्राध्यापकों के सिर आ पड़ा है। विदेशों में भी अनेक विश्वविद्यालयों में अब हिंदी विभाग बंद किए जा रहे हैं।
 
हिंदी साहित्य के नाम पर अब अधिकांश विधाएँ अब लुप्त होती जा रही है हैं। अगर मोटे तौर पर देखें तो हिंदी साहित्य के नाम पर अधिकांशतः कविता। कविता के नाम पर अधिकांशतः  हास्य कविता और हास्य कविता के नाम पर अधिकांशतः सोशल मीडिया पर चलने वाले चुटकुले और हास-परिहास। हिंदी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर हैं। अंग्रेजी माध्यम के चलते हिंदी समाचार पत्रों की दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। हिंदी भाषियों के घरों से हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाएँ लुप्त होते जा रही हैं। हर तरफ चल रहा है हिंदी का खेल और हर मोर्चे पर हिंदी हो रही है फेल।
 इस संबंध में कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
·   भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा (संघ की अधिकृत भाषा) का स्थान दिए जाने के बावजूद क्या संविधान, अधिनियम,नियम आदि की दृष्टि से अंग्रेजी के पास भारत की राजभाषा यानी अधिकृत भाषा के रूप में हिंदी से कम अधिकार है या अधिक?
·   वह कौनसी भाषा है जो संघ में भी मान्य है और सभी राज्यों में भी ?
·   वे कौन-कौन से अधिकार हैं जो हिंदी के पास तो हैं लेकिन अंग्रेजी के पास नहीं?
·   उच्च शिक्षा, रोजगार और संपन्नता से जुड़े सभी संसाधनों की ढलान अंग्रेजी की तरफ है या हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की तरफ ?
·   देश के विभिन्न कानूनों के अंतर्गत में कौन-कौन से कार्य हैं जो केवल हिंदी में ही किए जा सकते हैं ?
·   भारत की वह कौन सी भाषा है जो संघ सरकार और राज्य सरकारों कंपनियों, संगठनों व अन्य संस्थाओं आदि द्वारा पूरे देश की जनता के साथ पत्राचार सहित सभी उद्देश्यों के लिए अधिकृत पत्राचार के लिए प्रयोग में लाए जाने के लिए अधिकृत है ?
·   वह कौन सी भाषा है जिसके माध्यम से न्यायपालिका के निचले स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक न्याय प्राप्त किया जा सकता है ?
·   क्या संघ की राजभाषा अथवा राज्यों में राज्यों की राजभाषा के माध्यम से न्यायपालिका के निचले स्तर से लेकर उच्च उच्चतम स्तर तक न्याय प्राप्त
  किया जा सकता है ?
·   आपके घर में प्रतिदिन जो सामान आता है उसमें ग्राहक कानूनों के अंतर्गत जो जानकारी दी जाती है, वह प्रायः किस भाषा में होती है, क्या वह हमारी भाषा में देना आवश्यक है?  क्या किसीको दिखता नहीं कि कानूनन हमें दी जानेवाली जानकारी भी हमें हमारी भाषाओं में नहीं मिलती ?  
·   आपका सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों और बीमा कंपनियों आदि में जाना होता ही होगा ? वहाँ कौन सी ऐसी भाषा है जो आपको हर जगह मिलेगी? और कौन सी वह भाषा है जो कहीं मिलेगी, कहीं नहीं मिलेगी या ढूंढने और माँगने पर मिलेगी ? कितने लोगों को आज तक अपनी पासबुक हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषाओं में मिली है?
·   हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी माध्यम के और अन्य राज्यों में मातृभाषा के कितने प्रतिशत स्कूल खुले हैं? देश में जितने भी हिंदी या भारतीय भाषा प्रेमी है वे वर्तमान परिस्थितियों को देखकर कितने लोग अपने बच्चों या नाती पोतों को हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा माध्यम में पढ़ाने की सोच पाते हैं?
राज - किसीको मिला ताज, किसीको मिला राज। 
मैंने तो केवल कुछ बिंदुओं की तरह ही ध्यान आकर्षित किया है। ऐसे अनेक बिंदु गिनवाए जा सकते हैं। लेकिन अब आप पलट कर देखिए कि हिंदी को लेकर प्रतिवर्ष होने वाली हजारों वार्ताओं,  सम्मेलनों,  संगोष्ठियों, बैठकों,  संवादों आदि से क्या उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन आ रहा है? संविधान लागू होने से अब तक जो परिवर्तन आया है या आ रहा है, वह हिंदी के पक्ष में जा रहा है या अंग्रेजी  के पक्ष में जा रहा है?
जितने कथित प्रयास अब तक किए गए हैं, इससे तो अब तक देश में हिंदी का समुद्र भर गया होता‌। कहीं कोई दूसरी भाषा दिखती ही नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे प्रयास कुछ ऐसे हैं जैसे कि हम छलनी में पानी भर रहे हों। देश में हिंदी के नाम पर जो कानूनी ढांचा है उसमें इतने छेद हैं कि आप पानी भरते जाइए, लगे रहिए और थोड़ी देर बाद छलनी जैसी थी, वैसी ही खाली की खाली।
यदि आपके घर के बाहर सड़क बनवाई गई, उसका ढलान इंजीनियर ने मिस्त्री से उधर नहीं करवाया जहाँ सब चाहते थे, समझा दिया सब ठीक हो जाएगा। तो क्या होगा?  आप कितना भी परिश्रम करें, पानी को दूसरी तरफ ले जाएं, पानी पलक झपकते ही वापस उधर की तरफ जाने लगेगा जिस तरफ ढलान है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि संसाधनों की ढलान हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं के पक्ष में नहीं बल्कि अंग्रेजी की तरफ ही बनी या बनाई गई। शायद इंजीनियर या ठेकेदार ने अनजाने में नहीं जानबूझ कर ऐसा किया। अब पानी भरते ही आप लग जाते हैं उसे निकालने में। अगले दिन फिर वही हालत, वही कवायद। आप भी थक चुके हैं। अगर उस ढलान को ठीक नहीं करेंगे तो हम कितने भी प्रयास कर लें, प्रतिदिन लाखों संगोष्ठियाँ कर लें,  लाखों लोगों को समझा लें। अंततः तो पानी ढलान की तरफ ही जाएगा। जहाँ उच्च शिक्षा, रोजगार, संपन्नता, सुविधा और न्याय आदि की सब व्यवस्थाएँ होंगी, सामाजिक प्रतिष्ठा मिलेगी। चाहे - अनचाहे सबको वही जाना पड़ेगा, सब वही जा रहे हैं। हो सकता है कुछ लोग कुछ अपवाद बता दें, लेकिन अपवादों से तो सिद्धांत नहीं बदलते। एक बार एक ऐसे ही व्याख्यान के बाद एक बुजुर्ग खड़े हुए और उन्होंने छाती ठोक कर कहा, मैंने तो अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में पढ़वाया है। मैंने पूछा और अब आप के पोते-पोती किस माध्यम में पढ़ रहे हैं ? तब अचानक उनका जोश ठंडा पड़ गया और वे मुस्कुराने लगे। गलती उनकी नहीं है, धीरे-धीरे ढलान और गहरी की गई है, अंग्रेजी की ओर।
 मैं प्रतिदिन हिंदी के विकास व प्रचार-प्रसार और प्रयोग बढ़ाने को लेकर होने वाले तमाम प्रयासों को देखता हूँ। अनेक संवादों में भाग लेता हूँ। इनमें से 90% संस्थाएँ तो केवल कहानी, कविता में ही लगी हुई हैं। हिंदी के नाम पर बनी तमाम अकादमियाँ भी कहानी-कविता में ही व्यस्त हैं। भाषा बचे न बचे, जब तक जितनी बची है अपना काम तो चल ही रहा है। और जो लोग और संस्थाएँ हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं,  उनमें से कुछ विदेशों में हिंदी को बढ़ाने में लगी हैं। और जो प्रयास हो रहे हैं उनमें भी अक्सर इस प्रकार के सुझाव और कार्य देखने में आते हैं जैसे कि कोई पत्तों पर पानी छिड़कने की कोशिश कर रहा हो। जब तक आप वृक्षों की जड़ों में लगे रोग को दूर करने के उपाय नहीं करेंगे,  अगर पानी की कमी है तो आप जड़ों को नहीं सींचेंगे तो क्या होगा ?  क्या केवल पत्तों पर कुछ बूंदे छिड़कने से वृक्षों की रक्षा हो सकेगी ? जिस प्रकार के हिंदी सेवा के कथित प्रयास होते हैं उनमें से ज्यादातर से तो यह लगता है कि हम इन प्रयासों के नाम पर हम अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं। कोई नाम कमा रहा है, कोई धन कमा रहा है,  कोई प्रतिष्ठा पा रहा है, कोई बड़ा पद पा रहा है। हिंदी के खेल में सबको बड़ा मजा आ रहा है। उसमें भी कोई कठिनाई नहीं, पर यह तो देखें कि हिंदी का जहाज कहाँ जा रहा है।
हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के वृक्षों की जड़े तो भारत की भूमि में हैं। यहीं से फलीभूत हो कर कुछ टहनियां विदेशों में भी पहुंची गई हैं। क्या यह संभव है कि भारत में भारतीय भाषाओं का वृक्ष सूखता रहे और विदेशों में उसकी टहनियाँ, पत्तियाँ और फूल खिले रहें। अनेक लोगों ने भारतीय भाषाओं के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रहे हैं। लेकिन अनेक लोग हिंदी और भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रकार के प्रयास दिखाई देते हैं, उनमें प्राय: जड़ों के उपचार का कोई ठोस कार्य या विचार  मुझे नहीं दिखता।
 अगर हमें अपने प्रयासों का मूल्यांकन करना है तो किस रूप में करें कि हमारे प्रयासों से वह कौन सा बड़ा परिवर्तन हुआ जिससे कि अब अंग्रेजी के बजाय कोई काम हिंदी में होने लगेगा। छलनी के वे छेद जिनसे परिश्रम का सारा पानी निकल जाता था क्या वे भरे गए? आप मुझे निराशावादी कर सकते हैं ? क्षमा कीजिए मुझे तो नहीं दिखता। हमारी पीढ़ी और हम से पहले वाली पीढ़ी में मातृभाषाओं और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी प्रेमियों की बहुत बड़ी संख्या होती थी। एक बड़ा जनसमुदाय अपनी भाषा के लिए खड़ा होता था, अपनी भाषा की माँग करता था। लेकिन शिक्षा और रोजगार की नीति में जिस प्रकार के परिवर्तन हुए उसके चलते अब हिंदी प्रेमियों के घरों में भी अंग्रेजी के सेनानियों की फौज खड़ी हो चुकी है। अंग्रेजी माध्यम से निकली यह अंग्रेजी की इतनी बड़ी सेना व्यवस्था के हर हिस्से में अपनी गहरी पैठ बना चुकी है। अब आगे कौन लड़ेगा, कौन खड़ा होगा अपनी भाषाओं के लिए।
आज किसी बैंक, कंपनी या कार्यालय में कोई सुविधा हिंदी या भारतीय भाषाओं में दे भी दे तो उससे क्या बदलेगा?  उसके प्रयोग में न आने से कुछ दिनों बाद फिर केवल अंग्रेजी में हो जाएगी। अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा से माँग अंग्रेजी की पैदा होगी या हिंदी की?  अगर आपने हिंदी की मांग की भी तो आप उपहास का पात्र बन कर रह जाएँगे। नक्कारखाने में आपकी आवाज तूती बन कर रह जाएगी।
याद कीजिए एक हिंदी विश्वविद्यालय बनाया गया। इसलिए बनाया गया कि वहाँ हिंदी के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा दी जाए। बिना किसी डोनेशन के अच्छे पाठ्यक्रमों में दाखिला मिलने पर भी उसे कितनी सफलता मिली हम जानते हैं। वे लाखों विद्यालय जो कल तक जो हिंदी माध्यम के या मातृभाषा माध्यम के विद्यालय थे, अब वे भी अंग्रेजी माध्यम में बदल चुके हैं। आप तमाम नौकरियाँ देंगे अंग्रेजी से, उच्च शिक्षा देंगे अंग्रेजी से और बात करेंगे मातृभाषा की? क्या यह विरोधाभास नहीं ?
आपको याद है न कश्मीर में शांति लाने के लिए क्या-क्या नहीं किया गया। शांति के लिए कैसे-कैसे प्रयास नहीं किए गए। कश्मीरी युवाओं को देश भर में घुमाया जाता था। आतंकियों को भी नौकरी और धन दे कर समझाया जाता था। मुख्यधारा में लाने के लिए तमाम नाटक-नौटंकी। सद्भाव के लिए अनेक धारावाहिक और फिल्में भी बनीं। लेकिन कुछ बदला क्या?  उस सब के बावजूद लाखों हिंदुओं, सिक्खों आदि को कत्लेआम बलात्कार आदि के माध्यम से वहां से बाहर कर दिया गया।
लेकिन जब सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए में परिवर्तन किया और इसके अतिरिक्त अन्य नीतिगत निर्णय लिए तो सब छिपी बीमारियां सामने आने लगीं, समाधान सामने आने लगे और हालात नियंत्रण में आने लगे। यहाँ भी व्यवस्था बदलने से ही कुछ बदलेगा। केवल चर्चाओं-परिचर्चाओं, संगोष्ठियों और सम्मेलनों और छिटपुट प्रयासों से नहीं। कब तक ढलान के प्रतिकूल पानी को लाएँगे। कुछ माँगे पूरी होने से हमें खुशी तो होती है लेकिन जैसे पत्तों पर पानी डालने से कुछ नहीं बदलता, थोड़ी सी धूप में पत्तों का पानी उड़ जाएगा। आखिर तो जड़ों का पानी ही काम आएगा।
मुझे ऐसा लगता है कि जब तक विधि व्यवस्था और इच्छा शक्ति के माध्यम से हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए मौजूद छिद्र बंद नहीं होंगे, सत्ता के मिस्त्री जब तक संसाधनों की ढलान ठीक नहीं करेंगे। भारतीय भाषाओं की जड़ों में लगे रोग का सही इलाज नहीं होगा, कुछ बदलेगा, मुझे तो नहीं लगता। अगर बदलेगा भी तो वह हिंदी या भारतीय भाषाओं के पक्ष में तो नहीं होगा। ऐसे में भी हिंदी का यह खेल तो चलता रहेगा। 

जिस प्रकार संविधान सभा से लेकर अब तक अंग धीरे-धीरे सावधानी से चतुराई से अंग्रेजी के लिए ढलान बनाई गई वैसी ही हमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए प्रयास करने होंगे। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत अब केवल प्राथमिक शिक्षा हिंदी में दिए जाने की नीति से कोई बड़ा परिवर्तन आएगा, ऐसा तो नहीं लगता क्योंकि बाद में तो सबको अंग्रेजीदां बनना ही होगा। लेकिन अगर इतना भी हो तो भारतीय जनमानस रूपी महावृक्ष की जड़ों में कुछ बूंदें तो मातृभाषा की होंगी, कहीं बचपन के किसी कोने में कविताओं में मातृभाषा में कहीं कोयल तो कूकेगी। इससे हम कुछ तो भारतीय रह पाएँगे। क्षेत्रीय संस्कृति और देश-प्रेम को बचाने की आशा रख सकेंगे। लेकिन अब देखना यह है कि कितने राज्य अपनी मातृभाषा के माध्यम को स्वीकारेंगे और कितने ऐच्छिक बना कर इसकी हवा निकाल देंगे। अगर यह चयन स्कूलों और अभिभावकों पर छोड़ दिया तो इसका हश्र क्या होगा, सबको पता है। देखिए क्या होता है। आइए तब तक हम सब मिलकर हिंदी-हिंदी खेलें।

     डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'

झिलमिल

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क्या नई शिक्षा नीति में भाषा संबंधी प्रावधानों से भारत में शिक्षा के माध्यम में कोई परिवर्तन होगा ?

इस विषय पर वैश्विक हिंदी सम्मेलन ई-मेल समूह पर आयोजित होने वाली  'वैश्विक ई-संगोष्ठी' के लिए 

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मंगलवार, 18 अगस्त 2020

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन... ? वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 3

 



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नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन... ?  
वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 3

जी, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि शिक्षा का निजीकरण और मातृभाषा माध्यम का संगम कैसे होगा। शिक्षा का निजीकरण पूरी तरह अंग्रेजी की बैसाखी पर खड़ा है। राशिनी में भी मातृभाषा माध्यम के गले में "जहां संभव हो" का फन्दा डाल दिया गया है। आज प्रधानमंत्री जी ने भी अपने भाषण में  "जहां संभव हो" को पक्का कर दिया है। मुझे नहीं लगता कि जन-दबाव के बिना मातृभाषाओं के लिए कुछ होगा। राशिनी के अनुसार अंग्रेजी बच्चे के पाठशाला (बल्कि आंगनबाड़ी) जाने के पहले दिन से ही शुरू हो जाएगी और छठी कक्षा से विज्ञान अंग्रेजी में भी पढ़ाना आवश्यक कर दिया गया है। मंडी और सभ्रांत वर्ग की पूरी ताकत अंग्रेज़ी के साथ है।  मेरी राय है कि यह राशिनी मातृभाषाओं के गले में पड़े अंग्रेजी फंदे को और कस देगी। मुझे "जहां संभव हो" से बहुत डर लग रहा है जी। मैं गलत साबित हो जाऊं तो मुझे प्रसन्नता होगी।सरकार तभी कुछ करेगी जब उसे लगेगा कि इससे मतों का लाभ होगा। चारों और अंग्रेज़ी का साम्राज्य रहते जन-साधारण अंग्रेज़ी की और ही भागेगा। इस लिए भारत के चप्पे-चप्पे पर जमे अंग्रेजी साम्राज्य के सरकारी आधारों को ध्वस्त किये बिना जन-साधारण को मातृभाषाओं के पक्ष में लाना बहुत बड़ी जागृति के रास्ते ही संभव है। इस  लिए सब भारतीय भाषा प्रेमी अपने प्रयत्नों को और तीव्र करें। "जहां संभव हो" कह कर हम अपना अपमान स्वयं कर रहे हैं कि अपने आप को वैश्विक शक्ति समझते हुए भी हम अपने बच्चों को कक्षा पांच तक भी अपनी भाषा में पढ़ाने में असमर्थ हैं। 
तर आँखें लिए,
सादर, 
जोगा सिंह विर्क, पटियाला 
ਜੋਗਾ ਸਿੰਘ, ਐਮ.ਏ., ਐਮ.ਫਿਲ., ਪੀ-ਐਚ.ਡੀ. (ਯੌਰਕ, ਯੂ.ਕੇ.)

सभी प्रकार की ज्ञान-विज्ञान को समझने सरल भाषा मातृभाषा ही हो सकता है। आप अंग्रेजी के बल पर लाख बाबू बना सकते हैं, लेकिन जब मौलिक कार्य करना है, तो आपको मातृभाषा की ही शरण में आना पड़ेगा। नई शिक्षा नीति मव अंग्रेजी को एक भाषा/विषय के रूप पढ़ाया जाएगा। न कि माध्यम के रूप में। इससे ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी की समझ को विकसित करने में सहायता मिलेगी। इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम भविष्य की कोख से जन्म लेंगे। 
राहुल खटे, नाशिक

आज भी नई शिक्षा नीति के आने से पहले प्रकाश जावेड़कर ने कहीं बयान दे दिया था," नई शिक्षा नीति में हिन्दी को अनिवार्य करने की बात नहीं होगी " मेरे स्कूल के अन्ग्रेजीयत मानसिकता वाले प्रिंसिपल ने तुरंत मीटिंग बुलाकर कहा," क्यों न  6 to 8 में भी हिन्दी optional कर दी जाए ।"  नई शिक्षा नीति के आने तक इन्तजार कर लीजिए ऐसा कहकर मैंने जान छुड़ाई।
प्रकाश जावेड़कर जी के ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयान पर आपत्ति जताते हुए मैंने सभी हिंदी समितियों और निदेशालय को लिखा-- कहीं से कोई भी जवाब नहीं आया ।  नई शिक्षा नीति में जो स्थिति में कुछ सुधार आया है। माननीय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को इसका श्रेय जाता है क्योंकि गृहमंत्री जी ने 14-9-19 को ही कह दिया था," राष्ट्र की एक राष्ट्र भाषा होनी चाहिये ।" 

हिंदी के संरक्षण-संवर्धन में लगे विभाग जो 1967 में हिंदी के खिलाफ संविधान संशोधन -- जावेड़कर जी के बयान पर भी खामोश थे , नई शिक्षा नीति की क्रेडिट लेने के लिये या अंग्रेजी गद्दारों के साथ मिलकर उसे डुबोने के लिएअचानक वाट्स अप समूहों पर सक्रिय हो गये ???  ---
"भारतीय भाषाओं के पक्ष में "  समूह में एक अंग्रेजी पक्षधर ने सबको इस बात पर सहमत कर लिया कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की बात जैसे विवादास्पद मुद्दों को छोड़कर केवल मातृभाषाओं की बात की जाए ( ये समझाने पर भी कि इसी गलती के कारण वाजपेई जी जैसे हिन्दी के पक्षधर ने भी मातृभाषा- भारतीय भाषा अभियान वालों को भगा दिया था फिर भी नहीं मानें।) इस तरह अन्ग्रेजीयत वाले रंगे सियार के रूप में हर जगह बैठे हैं जो हिंदी विकास के नाम पर पिछ्ले सत्तर सालों में करोड़ों रुपये डकार कर सभी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी को अनिवार्य बना दिए आज फिर राजनीति करने आ गये हैं। ऐसे आस्तीन के सांपों से सावधान हिंदी प्रेमियों ---
डॉ अशोक कुमार तिवारी
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स्वतंत्रता दिवस पर
भारतीय भाषाओें की स्वतंत्रता का अभियान। 

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ई- संगोष्ठी का लिंक यथासमय समूह पर भेज दिया जाएगा।

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

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[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिन्दी के पाणिनि : आचार्य किशोरीदास वाजपेयी - प्रो. अमरनाथ, मातृभाषा माध्यम पर 15 अगस्त को ई-संगोष्ठी, श्री कृष्ण दिखाते हैं रास्ता - गिरीश्वर मिश्र

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हिन्दी के योद्धा-जिनकी आज पुण्यतिथि है।

हिन्दी के पाणिनि : आचार्य किशोरीदास वाजपेयी

- प्रो. अमरनाथ

हिन्दी के पाणिनि कहे जाने वाले आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ( 15.12.1998- 12.8.1981) का जन्म कानपुर के बिठूर के पास रामनगर नामक गांव में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा गांव में, संस्कृत की शिक्षा वृंदावन में और आगे की शिक्षा बनारस तथा पंजाब में हुई. कुछ वर्ष तक उन्होंने हिमांचल प्रदेश में अध्यापन का कार्य किया और उसके बाद वे स्वतंत्र वृत्ति से कनखल ( हरिद्वार ) में अत्यन्त आर्थिक असुविधाओं के साथ जीवनयापन करते रहे. उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा के कोश विभाग में भी कार्य किया. वाजपेयी जी अत्यंत स्वाभिमानी और अक्खड़ स्वभाव के व्यक्ति थे. निर्भीकता, स्पष्टवादिता और स्वाभिमान उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे. अपनी निर्भीकता के कारण वे "अक्खड कबीर" और स्वाभिमान के कारण "अभिमान मेरु" कहाये जाने लगे थे.

वाजपेयी जी ने खड़ी बोली हिन्दी के व्याकरण की निर्मिति में मुख्य भूमिका निभाई है. उन्होंने हिन्दी को परिष्कृत करके उसे आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाया. इसके पूर्व आधुनिक हिन्दी का प्रचलन तो हो चुका था किन्तु उसके व्याकरण का कोई सुव्यवस्थित और मानक रूप नहीं बन सका था. वाजपेयी जी ने हिन्दी को परिष्कृत भी किया और उसका मानक व्याकरण भी बनाया.

वाजपेयी जी को अपनी स्थापनाओं पर इतना विश्वास था कि वे किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते थे. पं. सकलनारायण शर्मा का एक लेख ‘माधुरी’ में छपा था जिसमें हिन्दी व्याकरण पर टिप्पणी के साथ ही हिन्दी व्याकरण सबंधी अनेक जिज्ञासाएं भी प्रकट की गई थीं. वाजपेयी जी ने उसका जवाब देते हुए ‘माधुरी’ में एक लेख लिखा जिसका हिन्दी जगत पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा और उसके बाद व्याकरणाचार्य के रूप में वे प्रतिष्ठित हो गए. वाजपेयी जी ने भाषा विज्ञान, व्याकरण, साहित्य- समालोचना एवं पत्रकारिता आदि सभी क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है. फिर भी उनकी मुख्य देन ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ ही है.

वाजपेयी जी की हिन्दी भाषा और व्याकरण संबंधी अन्य पुस्तकों में ‘ब्रजभाषा का व्याकरण’, ‘राष्ट्रीय भाषा का प्रथम व्याकरण’, ‘हिन्दी निरुक्त’,  ‘हिन्दी शब्द –मीमांसा’,  ‘भारतीय भाषा विज्ञान’, ‘हिन्दी की वर्तनी तथा शब्द विश्लेषण’, ‘ब्रजभाषा का प्रौढ़ व्याकरण’, ‘अच्छी हिन्दी’, ‘अच्छी हिन्दी का नमूना’, सरल शब्दानुशासन, राष्ट्रभाषा का इतिहास, ‘लेखन कला’, ‘साहित्य- निर्माण की शिक्षा’, ‘साहित्य मीमांसा’ ‘संस्कृति का पांचवां अध्याय’, आदि प्रमुख हैं.

‘हिन्दी शब्दानुशासन’ उनकी सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित पुस्तक है. इसकी पूर्वपीठिका में हिन्दी की उत्पत्ति, विकास-पद्धति, प्रकृति और विकास आदि के अतिरिक्त नागरी लिपि, खड़ी बोली का परिष्कार आदि पर बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से विचार किया गया है। पूर्वार्ध के सात अध्यायों में वर्ण, शब्द, पद, विभक्ति, प्रत्यय, संज्ञा, सर्वनाम, लिंग-व्यवस्था, अव्यय, उपसर्ग, यौगिक शब्दों की प्रक्रियाएं, कृदंत और तद्धित शब्द व समास, क्रिया-विशेषण, वाक्य संरचना, वाक्य भेद, पदों की पुनरुक्ति, विशेषणों के प्रयोग, भावात्मक संज्ञाओं और विशेषण आदि पर विचार किया गया है.

उत्तरार्द्ध में कुल पाँच अध्याय हैं. इसमें क्रिया से जुड़े तत्वों, उपधातुओं के भेद, संयुक्त क्रियाएँ, नामधातु और क्रिया की द्विरुक्ति का विवेचन है. इसके परिशिष्ट में हिन्दी की बोलियाँ और उनमें एकसूत्रता आदि का विश्लेषण है. इसमें राजस्थानी, ब्रजभाषा, कन्नौजी या पाञ्चाली, अवधी, भोजपुरी (मगही) और मैथिली बोलियों के विभिन्न अवयवों पर विचार किया गया है. इसके अलावा इसमें पंजाबी भाषा एवं व्याकरण और भाषाविज्ञान पर भी विचार किया गया है.

सबसे पहले वाजपेयी जी ने ही घोषित किया कि हिन्दी एक स्वतंत्र भाषा है. वह संस्कृत से अनुप्राणित अवश्य है किन्तु अपने क्षेत्र में वह सार्वभौम सत्ता रखती है. यहां उसके अपने नियम कानून लागू होते हैं.

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार अभी तक हिन्दी के जो व्याकरण लिखे गए, वे प्रयोग निर्देश तक ही सीमित हैं. “हिन्दी शब्दानुशासन” में पहली बार व्याकरण के तत्वदर्शन का स्वरूप स्पष्ट हुआ है.

‘ब्रजभाषा व्याकरण’ नामक वाजपेयी जी की पुस्तक भी बहुत महत्वपूर्ण है. इसमें केवल व्याकरण ही नहीं, ब्रजभाषा के उद्भव, विकास और उसके स्वरूप का भी गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की स्थापनाओं में से एक महत्वपूर्ण स्थापना यह भी है कि भारतीय आर्यभाषाओं का विकास संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश के क्रमिक विकास के रूप में (वंशवृक्ष की तरह) नहीं हुआ है और न तो संस्कृत, सारी भारतीय आर्यभाषाओं की जननी ही है. वास्तव में भाषाओं का विकास नदी की धारा की तरह होता है जैसे गंगा के समुद्र में मिलने से पूर्व मार्ग में बहुत सी छोटी बड़ी नदियां मिलती जाती है, उसी तरह से छोटी- छोटी भाषाएं भी बड़ी भाषाओं में समाहित होती जाती हैं. दुनिया में भाषाएं सिर्फ मर रही हैं. समाज के ऐतिहासिक विकास-क्रम में लघु जातियों की भाषाएं महाजातियों की भाषाओं में समाहित होती जाती हैं. रामविलास शर्मा ने अपनी स्थापना की पुष्टि में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को उद्धृत किया है. वे लिखते हैं,

“1953 में प्रकाशित एक लेख में मैने संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश वाली मंजिलों का विरोध किया था. इस सिलसिले में श्री नामवर सिंह ने अपने गवेषणापूर्ण ग्रंथ ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ में लिखा है, “ किन्तु कुछ विद्वानों को भारतीय आर्यभाषा के विकास में संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश वगैरह इतनी मंजिलें गिनाना असंगत प्रतीत होता है.”  डॉ. चाटुर्ज्या से जो उद्धरण पहले दिए गए हैं, उनसे स्पष्ट है कि इन मंजिलों की असंगति स्वीकृत पद्धति के भाषा- वैज्ञानिकों को भी मालूम हुई है. श्री किशोरीदास वाजपेयी ने अपने ग्रंथ हिन्दी शब्दानुशसन में इस मंजिल को स्वीकार नहीं किया. इस दोनो विद्वानों के ग्रंथ पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा और भी दृढ़ हो गयी कि यह मंजिलों की कल्पना अवैज्ञानिक है.“ ( भाषा और समाज, पृष्ठ-203)

भाषा विज्ञान और व्याकरण के अलावा भी साहित्यशास्त्र सहित दूसरे विविध विषयों पर उनकी अनेक आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं. इनमें ‘काव्य प्रवेशिका’, ‘साहित्य की उपक्रमणिका’, ‘काव्य में रहस्यवाद’, ‘रस और अलंकार’, ‘साहित्य प्रवेशिका’, ‘अलंकार मीमांसा’, ‘आचार्य द्विवेदी और उनके संगी साथी’, ‘साहित्यिक जीवन के संस्मरण’, ‘वैष्णव धर्म और आर्य समाज’, ‘वर्ण व्यवस्था और अछूत’, ‘स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री सुभाषचंद्र बोस’, ‘राष्ट्रपिता लोकमान्य तिलक’, ‘कांग्रेस का संक्षिप्त इतिहास’, ‘मानव धर्म मीमांसा’, ‘मेरे कुछ मौलिक विचार’, ‘संस्कृत शिक्षण कला और अनुवाद विषय’ आदि प्रमुख है.

व्याकरणाचार्य के साथ- साथ किशोरीदास वाजपेयी एक सुधी समीक्षक भी थे. ‘बिहारी सतसई और उसके टीकाकार’ लेखमाला के प्रकाशित होने के बाद एक सुधी आलोचक के रूप में भी उनकी पहचान हो गई थी. उन्होंने ‘तरंगिणी’ में ओजस्वी कविताएं भी लिखीं जिसके कारण उन्हे जेल भी जाना पड़ा था.

आचार्य वाजपेयी की पुस्तक ‘भारतीय भाषाविज्ञान की भूमिका’ में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है, “आचार्य वाजपेयी हिन्दी के व्याकरण और भाषा विज्ञान पर असाधारण अधिकार रखते हैं. वे मानो इन्ही दो विधाओं के लिए पैदा हुए हैं....... मेरा बस चलता तो वाजपेयी जी को अर्थचिन्ता से मुक्त करके, उन्हें सभी हिन्दी (आर्य भाषा वाले) क्षेत्रों में शब्द-संचय और विश्लेषण के लिए छोड़ देता. उन पर कोई निर्बंध (कार्य करने की मात्रा) न रखता. जिसके हृदय में स्वत: निर्बंध है, उसे बाहर के निर्बंध की आवश्यकता नहीं.”

विष्णुदत्त राकेश ने ‘आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रंथावली’ का छह खण्डों में संपादन किया है.

12 अगस्त 1981 को कनखल ( हरिद्वार) में इस महान वैयाकरण का निधन हो गया. उनकी पुण्यतिथि पर हम हिन्दी भाषा, साहित्य और समाज क क्षेत्र में उनके महान योगदान का स्मरण करते हैं और श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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