गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] आज़ादी आंदोलन में नेताजी पराक्रम के प्रतीक थे –प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल। झिलमिल में - जन-गण-मन की भाषा…डॉ. एम.एल. गुप्ता आदित्य। इन्टरनेशनल हिंदी यानी विश्वभाषा हिंदी - पी मधुसूदन नायडू

 



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हिंदी विश्‍वविद्यालय में पराक्रम दिवस के रूप में मनायी 
 नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस की जयंती
आज़ादी आंदोलन में नेताजी पराक्रम के प्रतीक थे –प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल
वर्धा, 24 जनवरी 2021: महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल ने कहा है कि आज़ादी के आंदोलन में नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। सन् 1857 से 1947 तक आज़ादी के पराक्रम का प्रदर्शन चलता रहा। नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस उस पराक्रम के प्रती‍क थे। प्रो. शुक्‍ल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्‍य में शनिवार, 23 जनवरी  को ‘नेताजी की पत्रकारिता’ विषय पर आयोजित व्‍याख्‍यान समारोह की अध्‍यक्षता करते हुए बोल रहे थे। विश्‍वविद्यालय में नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस की जयंती पराक्रम दिवस के रूप में मनायी गई। यह कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की योजना ‘एक भारत श्रेष्‍ठ भारत’ के अंतर्गत ग़ालिब सभागार में आयोजित किया गया। ‘नेताजी की पत्रकारिता’ पर मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता एवं जनसंचार विभाग के अध्‍यक्ष  प्रो. कृपाशंकर चौबे ने व्‍याख्‍यान दिया।

अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल ने कहा कि भारत सरकार ने निश्चय किया है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती भारत में पराक्रम दिवस के रूप में मनायी जाए । पराक्रम दिवस का तात्पर्य हिंसा का समर्थन नहीं है। नेताजी के द्वारा आईएनए की स्थापना हिंसा का समर्थन नहीं है । किसी आततायी के विरुद्ध, किसी आक्रांता के विरुद्ध, किसी राष्ट्र पर कज्बा किए हुए विदेशी शासकों के प्रति उस देश की जनता के द्वारा  किया जा रहा सशस्त्र प्रतिरोध हिंसा नहीं है। यदि यह हिंसा होती तो 1948 में पाकिस्तान के द्वारा जम्मू कश्मीर पर किए गए आक्रमण पर गांधी ने भारतीय की सेना की कार्यवाही को उचित न ठहराया होता । प्रो रजनीश कुमार शुक्‍ल ने कहा कि  नेताजी ने बहुत ही स्पष्टता के साथ कुछ बातें की थी, उनको समझने की जरूरत है कि इस देश की आज़ादी में किसी  एक रास्ते मात्र का योगदान नहीं है । यह विविध दृष्टियों से भारत का जो पराक्रम प्रकट हुआ था, उस पराक्रम की स्वाभाविक परिणति है । भारत की आज़ादी न तो किसी एक दल का योगदान है, न किसी खास पद्धति का योगदान है अपितु भारत को आज़ाद होना चाहिए, हम आज़ादी से नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं करते हैं,  अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना होगा, उनको छुड़ाने के रास्ते कौनसे होंगे, इसपर  बहस को बंद करके जब देश का जन-जन इस संकल्प के साथ सभी प्रकार के साधनों का उपयोग करता हुआ दिखने लगा तो अंग्रेजों को भारत छोड़कर  जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं था । कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल ने कहा कि नेताजी ने रेडियो संदेश के माध्‍यम से पहली बार गांधी जी को राष्‍ट्रपिता संबोधित किया। दोनों नेताओं के रास्‍ते अलग-अलग थे पर लक्ष्‍य था - भारत मॉं की आज़ादी। इन्‍होंने नया भारत बनाने के लिए भरसक प्रयास किये। संपूर्ण भारत नेताजी के पराक्रम के प्रति आदरांजलि प्रदान करता है। उन्‍होंने कहा कि नेताजी ने फारवर्ड ब्‍लाक समाचार पत्र के माध्‍यम से संपूर्ण भारत के परिदृश्‍य को सामने लाया। उन्‍होंने बंगाल के युवकों के सपनों को लेकर भी अपनी पत्रकारिता में स्‍थान दिया था।

नेताजी का ‘फारवर्ड ब्‍लाक’ आज़ादी के लिए पत्रकारिता का हथियार था:- प्रो. कृपाशंकर चौबे

विश्‍वविद्यालय के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता एवं जनसंचार विभाग के अध्‍यक्ष  प्रो. कृपाशंकर चौबे ने मुख्‍य वक्‍ता के रूप में ‘नेताजी की पत्रकारिता’ विषय पर कहा कि नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस ने आज़ादी के आंदोलन के लिए पत्रकारिता को हथियार बनाया और उन्‍होंने फारवर्ड ब्‍लाक के माध्‍यम से जनजागरूकता फैलायी।  नेताजी देश-विदेश की समस्‍याओं से जुड़े विषयों पर उम्‍दा तरीके से लिखते थे। नेताजी ने 5 अगस्‍त 1939 को राजनीतिक साप्‍ताहिक समाचार पत्र फारवर्ड ब्‍लाक निकाला और 1 जून 1940 तक उसका संपादन किया। 20 पन्‍ने के अखबार में समाचार, सामयिक टिप्पणियां, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विषयों पर लेख, पुस्‍तक समीक्षा और संपादक के नाम पत्र छपते थे। प्रो. चौबे ने कहा कि नेताजी ने ‘नीड ऑफ आवर नेशन’ संपादकीय टिप्पणी के माध्यम से पूर्ण स्‍वराज की मांग की। नेताजी मुद्रित माध्‍यमों के अलावे रेडियो के माध्‍यम से भी संदेश प्रसारित किया करते थे। व्‍याख्‍यान के दौरान नेताजी द्वारा लिखे गये महत्‍वपूर्ण लेखों को स्‍लाइड के माध्‍यम से प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप दीपन व नेताजी के चित्र पर माल्‍यार्पण कर किया गया। यह कार्यक्रम ऑनलाइन तथा ऑफ़लाइन दोनो मदयमों में आयोजित किया गया। इस अवसर पर एक भारत श्रेष्‍ठ भारत के नोडल अधिकारी डॉ. सुशील कुमार त्रिपाठी ने एक भारत श्रेष्‍ठ भारत के परिप्रेक्ष्‍य में पराक्रम दिवस पर अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. धरवेश कठेरिया ने किया। कदम कदम बढ़ाए जा इस गीत से कार्यक्रम का समापन किया गया। इस अवसर पर अधिष्‍ठाता, विभागाध्‍यक्ष, अध्‍यापक और कर्मचारी प्रमुखता से उपस्थित थे।

काव्‍य संध्‍या में कवियों ने किया काव्‍य पाठ

नेताजी की जयंती के ही उपलक्ष्‍य में शनिवार की शाम 06 बजे से ग़ालिब सभागार में कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल की अध्‍यक्षता में काव्‍य संध्‍या का आयोजन ऑनलाइन तथा ऑफ़लाइन दोनों माध्यमों से किया गया। काव्य संध्या का आयोजन भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित योजना "एक भारत श्रेष्ठ भारत" के अंतर्गत किया गया। काव्‍य संध्‍या में आमंत्रित कवि योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरूण’ (रुड़की), बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून), प्रेम शंकर त्रिपाठी (कोलकाता), रास बिहारी पांडेय (मुंबई), विनोद मिश्र (मा‍रीशस), मधु शुक्‍ला (भोपाल) तथा विनोद श्रीवास्‍तव (कानपुर) ने अपनी रचनाओं का आनलाइन माध्‍यम से पाठ किया।  काव्‍य संध्‍या का संयोजन मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. कृपाशंकर चौबे ने किया। इस मौके पर विश्‍वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. अनिर्वाण घोष ने नेताजी पर लिखी बांग्‍ला कविता की आवृत्ति  की।

काव्‍य संध्‍या में वरिष्‍ठ कवि योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरूण’ ने पराक्रम दिवस को समर्पित कविता ‘गीत गाता हूं मैं आज उनके लिए जो जिए भी मरे भी वतन के लिए’ का पाठ किया। मुंबई से रासबिहारी पाण्‍डेय ने ‘सच कहते हैं जब तक यारो हर नारा बेकार है, हम है पतन की ओर या उत्‍थान कर रहे हैं’ कविता सस्‍वर प्रस्‍तुत की। भोपाल से मधु शुक्‍ला ने नारी संवेदना पर ‘तुलसी मानस के राम लिखू, मॉं शक्ति दो इतनी मैं गीत देश के नाम लिखू’ कविता प्रस्‍तुत की। प्रेम शंकर त्रिपाठी ने ‘भारत माता के वंदन में अपना सर्वस्‍व लुटाया था’ कविता के साथ साथ आकांक्षा और कामना के दोहे भी सुनाए। विश्‍व हिंदी निदेशालय मारीशस के महा‍सचिव विनोद मिश्र ने ‘ध्‍वंस के आगे चलें निर्माण की बातें करें’ और ‘हर तरफ से जला आशियां देखिए, यही है वक्‍त अंधेरों को आजमाने का’ कविताओं का पाठ किया। वरिष्‍ठ पत्रकार कवि विनोद श्रीवास्‍तव ने ‘हमने भी किया नहीं अंतत: बचाव, फिर नदी अचानक सिहर ऊठी, ये कौन छू गया सांझ ढ़ले’ इत्यादि कविता की सस्‍वर प्रस्‍तुत दी। वरिष्‍ठ कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने ‘मेरी आवाज़ है बंदगी ये नहीं अनसुनी जाएगी’, ‘कुछ भी नहीं असंभव हमसे’ और गणतंत्र पर ‘अमर रहे गणतंत्र हमारा, जन की आस सुबह का तारा’ आदि कविताएं  प्रस्‍तुत की। 

 अध्‍यक्षीय उदबोधन में विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल ने अपनी पांच कविताएं प्रस्‍तुत की। ‘आओ हम फिर एक नया इतिहास बनाते है, ‘बुद्ध सौगत को नमन है’, ‘चल पड़ा छोड़कर बंधनों को’, ‘अंधेरा नहीं जीतता’ और ‘धुआं धुआं’ इन  रचनाओं के माध्‍यम से कुलपति प्रो. शुक्‍ल ने श्रोताओं का मंत्रमुग्‍ध कर दिया। कार्यक्रम के अंत मे आभार ज्ञापन विश्वविद्यालय में "एक भारत श्रेष्ठ भारत" योजना के सह नोडल अधिकारी डॉ. ज्‍योतिष पायेंग ने व्‍यक्‍त किया।  काव्‍य संध्‍या में कुसुम शुक्‍ल, प्रतिकुलपति प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्‍ल, कुलसचिव कादर नवाज़ ख़ान, प्रो. अवधेश कुमार, प्रो. नृपेंद्र प्रसाद मोदी, प्रो. के. के. सिंह, डॉ. सुशील कुमार त्रिपाठी, डॉ. जयंत उपाध्‍याय, डॉ. सूर्य प्रकाश पाण्‍डेय सहित अध्‍यापक, अधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।
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जन-गण-मन की भाषा…करें विचार...,

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  पी मधुसूदन नायडू    
पूरी जिन्‍दगी हिन्‍दी की सेवा में बीती. अब मैं हिन्‍दी को “इन्‍टरनेशनल हिंदी” बनाने के मुहिम में जुटा हूं. मेरी उम्र 77 वर्ष है. मैं तेलुगुभाषी हूं और हिंदी को अपने देश और दुनिया के लिए सरल बनाने के कार्य में जुटा हूं. मैंने अपनी किताब में यह बताया है कि इन्‍टरनेशनल हिंदी सबके समझ में आनेवाली 130 करोड़ जनता की “संपर्क भाषा हिंदी” है. जनता अंग्रेजी का शब्‍द जैसा का वैसा तत्‍काल इस्‍तेमाल करना चाहती है क्‍योंकि उसके पास निर्मित शब्‍द सीखने का समय नहीं है. ऐसी स्थिति में उच्‍चतम शिक्षा पाने के लिए और प्रतिदिन आने वाले नए ज्ञान को पाने के लिए इन्‍टरनेशनल हिेंदी को अपनाने की जरूरत है.
  पी मधुसूदन नायडू  
  मो. 09765250189
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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हैदराबाद

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[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] Fwd: फ़िल्मो में प्रयोग होती कनपुरिया लफ़्फ़ाज़ी - अकरम क़ादरी



 

फ़िल्मो में प्रयोग होती कनपुरिया लफ़्फ़ाज़ी 
                                                               - अकरम क़ादरी

मशहूर कहावत है "ढाई कोस पास पर पानी बदले और ढाई कोस पर वाणी" यह कहावत बिल्कुल सटीक है- क्योंकि कानपुर से लखनऊ ज़्यादा दूर नहीं है लेकिन भाषा बिल्कुल अलग है। लखनऊ में उर्दू मिक्स अवधी बोली जाती है तो कानपुर में एकदम रौबदार  कनपुरिया जो आजकल बॉलीवुड को खूब पसंद आ रही है। बहुत फ़िल्में बन रही हैं और न जाने कितनी फ़िल्मो की पटकथा लिख चुकी होंगी। कनपुरिया अंदाज़ के अक्खड़ता की वजह से यह लफ़्फ़ाज़ी, बोली, लोकोक्ति, मुहावरे अपना स्थान बॉलीवुड में बना रहे है।

कानपुर शहर दो चीज़ों के लिए बहुत मशहूर है - एक है "पान-मसाला गुटखा दूसरा चमड़ा (लेदर)" आजकल कई भारतीय फिल्मों और टीवी सिरियल में कनपुरिया भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है क्योंकि इस भाषा मे एक रौब और दबंगई है जो भारतीय सिनेमा के महारथियों को खूब समझ मे आ रही है। वो उस भाषा के साथ न्याय करने की कोशिश भी करते है। 

शब्दों की अदायगी में एक अनूठापन है जो किसी भी दर्शक के दिल में उतरने की महारत रखती है। उसका सबसे बड़ा कारण है- यह भाषा जिस चरित्र द्वारा बोली जाती है वो या तो फ़िल्म का विलेन होता है  फिर उसका किरदार रौब वाला होता है।
इस भाषा मे आजकल काफी फ़िल्में, धारावाहिक, वेब सीरीज बन रही हैं जो दर्शकों पर सीधा अपना प्रभाव छोड़ रही हैं। किसी भी फ़िल्म की सफलता तभी है जब दर्शक बाहर निकले तो उसके दिमाग़ में फ़िल्म की कहानी हो और जुबां पर उस फिल्म के संवाद।
कनपुरिया लफ़्फ़ाज़ी में यह ख़ासियत है कि उसके डायलाग दिल पर उतरते है इसलिए ही फ़िल्म निर्माता खूब कानपुर बेस फ़िल्मे और वेबसीरीज बना रहे है।

जिसमे कुछ फिल्में सिल्वर स्क्रीन पर आ भी गयी है जैसे एलएलबी-2, टशन, तनु वेड्स मनु-1, तनु वेड्स मनु-2, बंटी और बबली, दबंग-2, साईं वर्सेज आई, कटियाबाज, देसी कट्टे, बाबर, हंसी तो फंसी, होटल मिलन, मरुधर एक्सप्रेस और भैया जी सुपरहिट  उसके अलावा अनेक टीवी धारावाहिक आ गए है जो छोटे पर्दे पर धूम मचा रहे है-
 कृष्णा चली लंदन, 'शास्त्री सिस्टर्स, भाबी जी घर पर हैं, लापतागंज, जीजा जी छत पर हैं, हर शाख पर उल्लू बैठा है, नीली छतरी वाले, ऑफिस-ऑफिस।
ऊपर दिए गए नाम और उनके मतलब से ही आपको इस भाषा (बोली) की दबंगई का पता चल जाएगा कि किस प्रकार यह भाषा फ़िल्म जगत में अपना स्थान बनाये हुए है। हर क्षेत्र की अपनी एक भाषा विशेष होती है जिसका इस्तेमाल करने पर पता चल जाता है कि यह किस सीमा तक दर्शक पर अपनी पैठ बना पाएगी इस बोली भाषा की शब्दावली ही निराली है कुछ शब्द और उनके अर्थ जो फिल्मों में इस्तेमाल हुए है ।

◆ आम बोलचाल के कनपुरिया जुमले

- विधिवत मारेंगे और कौनौ मुरौवत न करेंगे "ढंग से पिटेंगे बिल्कुल भी शर्म नहीं करेंगे"
- ज्यादा बकैती न करो- "कम बोलो"
- अबहिं मार मार के हनुमान बना देबे- "इतना मारेंगे की मुंह लाल कर देंगे"
- टोपा हो का - "बेवकूफ हो क्या"
 दीहिस कंटाप- "थप्पड़ जड़ दिया"
- हपक के एक कंटाप धरा तो सारी रंगबाजी धरी रहि जहिये- "ज़ोर से एक थप्पड़ पड़ेगा, सारी दबंगई बाहर आ जायेगी"
- ये मठाधीसी अपने पास ही धरो- "यह नेतागिरी अपने पास रखो"
- भाई जी, अगले का भौकाल एकदम टाइट है- "सामने वाला बन्दा मज़बूत है"
- अबहीं झपडिय़ा दीन्ह जाइहौ तब पता चली कि पंजीरी कहां बटत रहे-" एक थप्पड़ में पता चल जाएगा कि पंजीरी (मेवे का बना पौष्टिक आहार) कहाँ बंट रही है"
- अरे सरऊ काहे पचड़े में पड़त हौ अबहिं लभेड़ हुई जइहै- " भाई पंगा ना लो वरना समझ लेना"
- कुछ पल्ले पड़ रहा है कि ऐसे ही औरंगजेब बने हो- "कुछ समझ मे आ रहा है या फिर फालतू में बादशाह बने बैठे हो"
- ज्यादा बड़ी अम्मा न बनौ-"ज्ञान ना दो"
- गुरु व्यवस्था तो फुल टन्न रही- "खाने-पीने का इंतेज़ाम ज़बरदस्त था"
- हर जिगाह चिकाई न लिया करो - "हर वक़्त मज़ा ना लिया करो"
- मार कंटाप शंट कर देंगे - "एक थप्पड़ में गाल लाल कर देंगे"
- अबे सोच का रहे हो बे?- "क्या सोच रहे हो"
- भौकाल बन रहा तौ बनाए रहो गुरू- "काम हो रहा है तो करते रहो"
- कसम से, बमपिलाट लग रहे हो- "बहुत खूबसूरत लग रहे हो"
- का गदर मचाये हो बे- "झगड़ा कौन किया है"
- कन्डम माल पकरा दिए गुरू? -" बेकार माल दे दिया"
◆ निराली है वर्तनी
-पूरा होना : हुई गा                                                                                            -पूरा न होना : नाई भा
-क्यों : काहे                                                                                                      -यहां आओ : हियां आव
-पिटाई करना : हउंक दीहिस                                                                             -काम पूरा होना : गुरु काम 35 होइगा..
-सुनो जरा : सुनो बे                                                                                           -क्या हुआ : का हुआ बे
-जबरदस्त : धांसू                                                       
◆ कानपुर के शब्द और उनका अर्थ
- लल्लनटॉप- एकदम ज़बरदस्त, बढ़िया                                                                - कंटाप : थप्पड़
- भौकाल : जलवा या प्रतिष्ठा                                                                                - चौकस : बेहतरीन
- बकैत : अधिक बोलने वाला                                                                               - खलीफा : सर्वश्रेष्ठ
- बकलोली : फिजूल की बातचीत                                                                         - लभेड़ : अप्रिय परिस्थिति
- पौव्वा : जुगाड़ या पैठ                                                                                       - चिकाई : किसी से मज़ाक करना
- चिरांद : उलझन पैदा करना या करने वाला                                                         - लबर-लबर - ज़्यादा बोलने वाला
- बमपिलाट - धांसू                                                                                              - चौधराहट- राजा बनना
- बैल- मूर्ख                                                                                                         - चौड़ियाना- ओवर स्मार्ट बनना
- आयं - क्या                                                                                                       - लुल्ल- ढीला इंसान
- कंडम माल- बेकार सामान                                                                                 - घाम -धूप
- हियां आब- इधर आओ                                                                                      - पिपरी बजाना- रोना
- मोमिया- पॉलीथिन                                                                                            - अबहुँ- अभी तक
- घोंचू- गधा                                                                                                        - पेल दिहिस- थप्पड़ मारना
- नसैनी- सीढ़ी
इसी लफ़्फ़ाज़ी और साफगोई के कारण मायानगरी में कानपुर के प्रमुख कॉमेडियन  राजू श्रीवास्तव, राजीव निगम, राजन श्रीवास्तव, जीतू गुप्ता, अनिरुद्ध मद्धेशिया और अन्नू अवस्थी अब किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वह सिर्फ इसीलिए कॉमेडियन बन सके क्योंकि विशुद्ध कनपुरिया भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ और अंदाज मज़ाकियापन से लबरेज़ है।

कानपुर की धरती ने अनेक साहित्यकारों, पत्रकारों को भी जन्म दिया जिनमे सबसे प्रमुख गणेश शंकर विद्यार्थी है जिन्होंने पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित किए तथा प्रमुख साहित्यकारों में गिरिराज किशोर, प्रियंवद, कमलेश भट्ट, कमल, राजेन्द्र राव, श्रीनाथ, सुनील कौशिक, ललित मोहन अवस्थी, सुशील शुक्ल, ओरकाश बाथम, हृषिकेश, असग़र वज़ाहत और प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी का नाम प्रथम फेहरिस्त में आता है। यही वो साहित्यकार है जिन्होंने कनपुरिया लफ़्फ़ाज़ी को अपने साहित्य में प्रमुखता से जगह भी दी है। यह नैसर्गिक प्रक्रिया भी है जब कोई लेखक जहां रहता है उसपर उस वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है।            
                                                                    जय हिंद !
अकरम क़ादरी, फ्रीलांसर
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई


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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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लेखिका यात्रा विवरण

मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

मो.: 09703982136

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष: नेताजी सुभाषचंद्र बोस· डॉ. अमरनाथ

 

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हिन्दी के योद्धा : जिनका आज जन्मदिन है-19

     (पराक्रम दिवस पर विशेष)


हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष:

नेताजी सुभाषचंद्र बोस

·  डॉ. अमरनाथ

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ओड़िशा के कटक में 23 जनवरी 1897 को जन्मे, कटक और कलकत्ता में पले-बढ़े, पिता की इच्छापूर्ति के लिए मात्र 23 वर्ष की आयु में आईसीएस पास करने वाले किन्तु अंग्रेजों की चाकरी करने को तैयार न होने के कारण उससे त्यागपत्र देने वाले, आजादी के लिए लड़ते हुए ग्यारह बार जेल जाने वाले, जेल में रहते हुए चुनाव लड़कर 1930 में कलकत्ता का महापौर चुने जाने वाले, भरी जवानी में तपेदिक से बीमार होने के कारण इलाज के लिए यूरोप जाने और बीमारी की अवस्था में ही ‘द इंडियन स्ट्रगल, 1920-1942’ नामक दो खंडों की मशहूर पुस्तक लिखने वाले, वियना में ऑस्ट्रियाई युवती एमिली शेंकल से प्रेम, बाद में विवाह और एक बेटी ( अनीता बोस) को जन्म देने वाले, 1936 में भारत लौटने पर गिरफ्तार होने और एक साल बाद रिहा होने के बाद बहुमत से कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने वाले, किन्तु गाँधी जी की इच्छा का ध्यान रखते हुए 16 मार्च 1939 को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने वाले,  गाँधी जी तथा काँग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट होकर 3 मई 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से स्वतंत्र पार्टी का गठन करने वाले, घर में नजरबंदी के दौरान 26 जनवरी 1941 को पुलिस को चकमा देते हुए जियाउद्दीन के नाम से छद्मवेश में फरार होने और काबुल होते हुए मास्को और फिर बर्लिन पहुँचकर ‘आजाद हिन्द रेडियो’ स्थापित करने वाले, हिटलर से मिलने के बाद उससे सहयोग का आश्वासन न मिलने पर जर्मन और जापानी पनडुब्बियों पर सवार होते हुए मई में टोकियो पहुँच कर जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो से मिलने और जापान की संसद को संबोधित करने वाले, 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर के रूप में सेना को संबोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान करने वाले, ‘जय हिन्द’, तथा ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ जैसे अमर नारा देने वाले, आजाद हिन्द फौज और जापानी सेना के साथ मिलकर दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के खिलाफ युद्ध का उद्घोष करने वाले, 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आरिजी- हुकूमते- आजाद हिन्द ( स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) का गठन करने वाले, अपना ध्वज, अपना बैंक, अपनी मुद्रा, अपना डाक टिकट, अपनी गुप्तचर सेवा सहित शासन का पूरा तंत्र विकसित करने वाले, अपनी आजाद हिन्द सरकार के लिए जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, वर्मा, मान्चुको तथा आयरलैंड से मान्यता प्राप्त करने वाले, अंडमान तथा नीकोबार द्वीप समूह में 8 नवंबर 1943 को तिरंगा फहराने वाले, महिला फौजियों की ‘रानी झाँसी रेजीमेंट’ के साथ 85000 सैनिकों की विशाल पल्टन तैयार करने वाले, 4 अप्रैल 1944 को अंग्रेजों पर आक्रमण करके 22 जून 1944 तक इंफाल और कोहिमा में लगातार युद्ध करने वाले, 6 जुलाई 1944 को ‘आजाद हिन्द रेडियो’ पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधी जी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित करने वाले और उनसे आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगने वाले और अंतत: 18 अगस्त 1945 को एक कथित विमान दुर्घटना में सदा- सदा के लिए दुनिया को अलविदा कहने वाले नेता जी सुभाषचंद्र बोस यदि आज भी देश के करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करते हैं तो यह स्वाभाविक ही है.

       यदि उनके द्वारा किए गए कार्यों के प्रमाण न होते तो विश्वास करना कठिन होता कि कोई व्यक्ति अपनी 48 वर्ष की अल्प आयु में इतना सारा काम भी कर सकता है.

हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष नेताजी सुभाषचंद्र बोस ही थे. वैसे तो उन्होंने हिन्दी या हिन्दुस्तानी के लिए कभी कोई आन्दोलन नहीं किया किन्तु अपने अनुभवजन्य सहज ज्ञान से उन्होंने भली-भाँति समझ लिया था कि आजाद भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी ही हो सकती है. इसीलिए उन्होंने आजाद हिन्द सरकार की राष्ट्रभाषा ‘हिन्दुस्तानी’ को चुना. ‘जय हिन्द’ नारा दिया और रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ को अपना राष्ट्रगान यानी, ‘कौमी तराना’ घोषित किया किन्तु उसे नए सिरे से “शुभ सुख चैन की बरखा बरसे भारत भाग्य है जागा” के रूप में हिन्दुस्तानी में लिखवाया. उल्लेखनीय है कि गाँधी जी भी इसी हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे.

सुभाषचंद्र बोस ने हिन्दी की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी. हिन्दी क्षेत्र में काम करने का उन्हें कोई अनुभव भी नहीं था. किन्तु अपने सहज ज्ञान के बलपर उन्होंने समझ लिया था कि आजाद भारत की राष्ट्रभाषा बनने की योग्यता एकमात्र हिन्दुस्तानी में ही है. उन्होंने 1929 ई. में कहा था, "प्रान्तीय ईर्ष्या–द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती. अपनी प्रान्तीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं, पर सारे प्रान्तों की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिन्दुस्तानी को ही मिला है." इसीलिए कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के समय उन्होंने आग्रह किया था कि, “यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है. बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊँ तो किस भाषा में बोलूँ ? इसलिए काँग्रेस का सभापति बनकर मैं हिन्दी खूब अच्छी तरह न जानूँ तो काम नहीं चलेगा. मुझे एक व्यक्ति दीजिए, जो मेरे साथ रहे और मेरा हिन्दी का सारा काम कर दे. इसके साथ ही जब मैं चाहूँ और समय मिले तब मैं उससे हिन्दी सीखता रहूँ.”

इसके बाद श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी को, जो निष्ठावान कांग्रेसी थे और हिन्दी के अच्छे जानकार थे, सुभाषचंद्र बोस के साथ रखा गया था. हरिपुरा कांग्रेस में तथा सभापति के दौरे के समय वह बराबर नेताजी के साथ रहते थे. नेताजी ने बड़ी लगन से हिन्दी सीखी और बहुत अच्छी हिन्दी लिखने पढ़ने और बोलने लगे. आजाद हिन्द फौज का काम और सुभाष बाबू के वक्तव्य अमूमन हिन्दी में ही होते थे. वे भली भाँति जानते थे कि जिस देश के पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से जब ब्रिटिश सेना पर आक्रमण किया तो अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए उन्होंने " दिल्ली चलो" का नारा दिया था. उन्होंने अंग्रेजों से अंडमान और नीकोबार द्वीप जीत लिये और उन्होंने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया था.

      नेताजी सुभाषचंद्र बोस के इस हिन्दी प्रेम का व्यापक असर देश की भाषा- नीति पर पड़ा और हिन्दी को निर्विवाद रूप से आजाद भारत की राजभाषा बनने में सफलता हासिल हुई. महात्मा गाँधी की तरह नेताजी भी हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे. और जैसा कि ऊपर कहा गया है उन्होंने अपने आजाद हिन्द सरकार की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी को घोषित किया था. यदि गाँधी और सुभाष की भाषा नीति का अनुपालन करते हुए आजादी के बाद हमारे नेताओं ने हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाया होता तो भारत की भाषा समस्या का बहुत कुछ समाधान हो गया होता. यद्यपि 15 अगस्त 1947 को पं. नेहरू ने भी लाल किले से अपने पहले भाषण का समापन “जय हिन्द” से करते हुए अपना मनोभाव व्यक्त कर दिया था. किन्तु खेद का विषय है कि संविधान निर्माण के समय भारत की राष्ट्रभाषा पर जब बहस हो रही थी तब न तो गाँधी जी जीवित थे और न नेता जी. देश का धर्म- आधारित बँटवारा भी हो चुका था. ऐसी दशा में हिन्दुस्तानी की जगह हिन्दी को राजभाषा बनाने वालों का पलड़ा भारी हो गया और हिन्दी भारत की राजभाषा घोषित हो गई और वह भी केवल कागजों पर. व्यवहार में अंग्रेजी यथावत चलती रही.

खेद है, आजादी के लगभग पचहत्तर साल बीत जाने के बाद आज भारत की भ्रामक भाषा नीति या नीति विहीन भाषा नीति के चलते देश को एक सूत्र में जोड़ने वाली गाँधी-सुभाष की वह हिन्दुस्तानी इतिहास में कहीं खो गई, लोक की सहज हिन्दी कृत्रिम राजभाषा की चक्की में पिस गई, कुछ शुद्धतावादियों के पाण्डित्य के बोझ तले सिमट गई और बची- खुची आंग्ल भाषा की आहार बन रही है. कभी ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दूस्तान’ का नारा लगाने वाली तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार इसे सिर्फ अशिक्षितों की भाषा बना देने पर आमादा है.

बहरहाल, नेताजी के प्रताप का ही असर है कि आजाद हिन्द फौज द्वारा अपनाया गया रामसिंह ठाकुर का निम्नलिखित गीत आज भी भारतीय सेना के प्रयाण गीत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

क़दम-क़दम बढ़ाए जा

खुशी के गीत गाए जा

यह जिंदगी है कौम की

तू कौम पे लुटाए जा।

तू शेरे हिन्‍द आगे बढ़

मरने से फिर भी तू न डर

उड़ा के दुश्‍मनों का सरजोशे-वतन बढ़ाए जा।

क़दम-क़दम...
     तेरी हिम्‍मत बढ़ती रहे

खुदा तेरी सुनता रहे

जो सामने तेरे अड़े

तो खाक में मिलाए जा।

क़दम-क़दम...
      चलो देहली पुकार के

क़ौमी निशाँ सँभाल के

लाल किले पे गाड़ के

लहराए जा, लहराए जा।

क़दम-क़दम...

हम नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती के अवसर पर हिन्दी/हिन्दुस्तानी के लिए किए गए उनके महान योगदान का स्मरण करते हैं और इस असाधारण महानायक के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)


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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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