मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

"भारतीय भाषाओं में महिला लेखन पर संगोष्ठी संपन्न" "महामहिम उप राज्यपाल डॉ. इकबाल सिंह ने किया साहित्यकारों का सम्मान"







"भारतीय भाषाओं में महिला लेखन पर संगोष्ठी संपन्न"
"महामहिम उप राज्यपाल डॉ. इकबाल सिंह ने किया साहित्यकारों का सम्मान"

दि. 2-3 दिसंबर, 2011 को हिन्दी विभाग पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के सौजन्य से तमिलनाडु हिन्दी साहित्य अकादमी, चेन्नै तथा तमिलनाडु बहु-भाषी हिन्दी लेखिका संघ द्वारा हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं में महिला लेखन विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय, पुदुच्चेरी में सुसंपन्न हुआ |

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में पांडिच्चेरी के उप राज्यपाल महामहिम डॉ. इकबाल सिंह, विशिष्ट अतिथि पूर्व सांसद (राज्य सभा) डॉ. रत्नाकर पांडेय,पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के निदेशक (शिक्षण, शैक्षिक नवोतान ग्रामीण पुन:निर्माण) प्रति उपकुलपति प्रो. रामदास (पूर्व सांसद), विशेष अतिथि सुख्यात साहित्यकार डॉ. गंगाप्रसाद विमल, डॉ. वे. वै. वी. ललिताम्बा, डॉ. सूर्यबाला, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के उप निदेशक डॉ. प्रदीप शर्मा, संसदीय राजभाषा समिति के पूर्व सचिव कृष्ण कुमार ग्रोवर, तमिलनाडु हिन्दी साहित्य अकादमी की महासचिव डॉ. मधुधवन कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में मंचासीन हुए | उपाध्यक्ष रमेश गुप्त 'नीरद', हिन्दी विभाग के आचार्यगण प्रो. विजयलक्ष्मी, डॉ.पद्मप्रिया, प्रमोद मीणा, डॉ. सी. जयशंकर बाबु उपस्थित थे |

संगोष्ठी का उद्घाटन पांडिच्चेरी के उप राज्यपाल महामहिम डॉ. इकबाल सिंह जी ने दीप प्रज्वलित कर किया | महामहिम उप राज्यपाल ने अपने उद्घाटन भाषण में नारी लेखन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए साहित्य लेखन से जुड़े तमाम महिला लेखन को बधाई दी | उन्होंने कहा कि पांडिच्चेरी जैसी आध्यात्मिक भूमि में ऐसे राष्ट्रीय महत्त्व के कार्यक्रम एक ऐतिहासिक उपलब्धि है | पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय, देश की श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में एक है जहाँ महिला अध्यापकों का अनुपात देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में सर्वाधिक है, ऐसे विश्वविद्यालय में महिला लेखन पर ऎसी संगोष्ठी का आयोजन बड़ा प्रासंगिक है | उप राज्यपाल ने देश के विभिन्न प्रदेशों से पधारे साहित्यकारों, साहित्य सेवियों का सम्मान किया और कई कृतियों का विमोचन किया जिसमें प्रमुख कृतियाँ हैं - आधुनिक नारी लेखन और समकालीन समाज (सं. डॉ. मधुधवन), कर्म और कलम के उपासक गुलाबचंद कोटडिया,साइबर माँ (राजस्थानी अनुवाद), औरत की बोली (गीता श्री), वल्लुवर वेमना कबीर और ओप्पय्यु आदि | 

विश्वविद्यालय के प्रति उपकुलपति प्रो. रामदास ने अपने स्वगत वचनों में देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों का इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में पधारना विश्वविद्यालय के लिए विशिष्ट गौरव की बात है | महिला लेखन के महत्त्व के संबंध में अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि महिला लेखन की आज बड़ी प्रासंगिता है, मगर महिलाओं को स्त्री-समस्याओं तक अपनी लेखनी को सिमित न करके तमाम सामाजिक समस्याओं की ओर ध्यान देने से सामाजिक सुधार और विकास में उनकी भूमिका अपने आप सुनिश्चित हो जायेगी |

विशिष्ट अतिथि पूर्व सांसद (राज्य सभा) डॉ. रत्नाकर पांडेय ने कहा कि नारी और पुरुष में भेद नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ये समाज रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं | इन्हें अलग-अलग देखना शोषण ही है | इन दोनों के बीच के संबंधों में समरसता की जरुरत है | ऎसी समरसता के पोषण में नारी लेखन अपनी भूमिका निभाएं | नारी माँ, बहन, बेटी आदि कई रूपों में समाज में कई भूमिकाएँ निभाते हुए अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ पालन करती है, वैसे नारी लेखन में नारी एवं पुरुष का भेदभाव न करते हुए समूचे समाज के हित को ध्यान में रखने पर नारी लेखन बड़ा प्रासंगिक हो पाएगा | 

उद्घाटन सत्र में अतिथियों का स्वागत करते हुए तमिलनाडु हिन्दी साहित्य अकादमी की महासचिव डॉ. मधुधवन ने कहा सुदूर दक्षिण में हिन्दी के कई मौन साधक हैं, ऎसी राष्ट्रीय संगोष्ठी के माध्यम से उत्तर और दक्षिण के साहित्यकार, साहित्यप्रेमी, हिन्दी सेवी एक मंच पर आकर एक दूसरे की सेवाओं से परिचित हो सकते हैं | उन्होंने कहा कि आज साहित्य में नारी लेखन का, काफी प्रगति है, नारी लेखन से साहित्य को विशिष्ट दिशा मिल रही है | ऎसी संगोष्ठियों के माध्यम से नारी लेखन के विभिन्न आयाम जैसे भाषा, विषयवस्तु और अन्य मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो सकती है | कई पीढ़ियों से हमारे यहाँ वांग्मय का सृजन होता रहा है, श्रेष्ठ विचारों के संवहन में नारी लेखन का विशिष्ट महत्त्व है |

इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न भाषाओं के एक सौ बीस साहित्यकार उपस्थित हुए | इन सबका पुदुच्चेरी के उप राज्यपाल के करकमलों से सम्मान का आयोजन किया गया | संगोष्ठी के प्रथम एवं द्वितीय सत्र में विषय वस्तु के संदर्भ में नारी लेखन, भाषा शैली के संदर्भ में नारी लेखन पर समस्त उपस्थित विद्वतजनों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये | जिसका सफल संचालन डॉ. सी. जयशंकर बाबु एवं स्वर्णज्योति किया | तृतीय सत्र में डॉ. विभारानी द्वारा 'एक नई मेनका' नाटक प्रस्तुत किया गया |

संगोष्ठी में शामिल होने वाले प्रमुख साहित्यकारों, आचार्यों में डॉ. सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, गीता श्री, डॉ. बिंदु भट, प्रो. दुर्गेश नंदिनी, प्रो. सैयद मेहरून, प्रो. देवराज, संपत देवी मुरारका, विभारानी, स्वर्णज्योति, मंजु रुस्तगी, डॉ. बशीर, डॉ. पी. आर.वासुदेवन, नीर शबनम, अनिल अवस्थी, ईश्वर करुण झा, लक्ष्मी अय्यर, डॉ.के. वत्सला, डॉ. पार्वती, आभा सिंहा, मुकेश मिश्र, नील प्रभा भारद्वाज, सुनीता, श्रावणी पांडा, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, डॉ.पी.के. बाल सुब्रमनियम, डॉ. शेषण, डॉ. सुंदरम, शैरिराजन, कुलजीत कौर, कल्याणी, प्रमुख प्रकाशक बालकृष्ण तनेजा, महेश भारद्वाज एवं अन्य गणमान्य उपस्थित थे |

दि. 3 दिसंबर 2011 को चतुर्थ सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम में रवीन्द्र नृत्य, श्रावणी पांडा ने प्रस्तुत किया | महादेवी गीत अभिनय की मंजु रुस्तगी ने प्रस्तुति दी | दूसरे चरण में आयोजित कवि गोष्ठी संपन्न हुई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. रत्नाकर पांडेय, सुधा अरोड़ा ने की | संगोष्ठी में पधारे सभी साहित्यकारों ने काव्य पाठ एवं लघुकथा पढी | श्री ईश्वर करुण झा ने संचालन किया | समापन समारोह के पश्चात श्री रमेश गुप्त 'नीरद' ने धन्यवाद ज्ञापित किया | 

संपत देवी मुरारका
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी  
हैदराबाद 

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

'जम्मू-वैष्णों माता' यात्रा

'जम्मू-वैष्णों माता'  यात्रा 











'जम्मू-वैष्णों माता'  यात्रा 

तीर्थाटन की मन में आई, निकल पड़े हम मस्ताने |
माँ बेटा मिल घूम के आवें, मन लगा बड़ा हर्षाने || 
भारत के सिर मोर मुकुट की, गाथा तुम्हें सुनाऊँ |
हरियाली नदी पर्वत मंदिर, क्या-क्या मैं बतलाऊँ ||
देख विहंगम दृश्य स्वर्ग का, भान हमें है कराती |
रावी, तवी, चिनाव के जल से, धरती ये हरियाती  ||
बागे बाहू किला यहाँ पर,जहां तीन देवियाँ विराजे |
काली माँ जहां 'बवे काली माँ' लक्ष्मी वैष्णों दायें बाएं साजें ||
पीर बुधन अली शाह, सबके मन पर राज किये |                   
500 वर्ष दूध पर जिये, देह यहाँ फिर त्याग दिये ||                          
बागे बाहू उद्यान का देखो, अनुपम बड़ा नजारा |
450 केनाल धरा पर, बना हुआ है सारा ||
स्वर्णिम प्रकाश से आलोकित  हो सबके मन को भाती |
किरणों जैसा तेज बिखरता एक अलौकिक  छटा दिखाती ||
 रवि-तनया तवी नदी के तट पर नन्हा सा हरिद्वार बस गया |
 देव देवियों का द्वादश ज्योतिर्लिंग सहित शिव धाम बन  गया ||
 नदी चिनाब  के तट का दृश्य मनोहारी कैसे वर्णन कर पाऊँ |
निहारते छवि कदम्ब-वृक्ष की फिर शिवधाम स्थान पर आऊँ ||
नैनाभिराम रघुनाथ मंदिर तेंतीस करोड़ देवों का सुलभ दर्शन |
 सबसे बड़ा  पारदर्शी  जग-प्रसिद्ध स्फटिक-लिंग का आकर्षण ||
रणविरेश्वर मंदिर है ऊँचा, जहं शिव शालीग्राम के मध्य |
कटरा से ही त्रिकुट शिखर तक, वादियों के सुखद दृश्य ||
बाण गंगा, चरण-पादुका  मंदिर दर्शन पुण्य अपार |
 अर्ध -क्वांरी हाथी-मत्था ,सांझी-छत हो, आई दरबार ||
गंगा की जलधार नहा कर जा पहुँची मैं माता  के द्वार |
चरण गंगा का करूँ आचमन, दर्शन करुँ मैं बारम्बार ||
नमन करूँ देवी श्री चरणों में, भक्तों का माँ करे उद्धार |
मिलता रहे बुलावा मुझको, माँ के दर्शन का हर बार ||
सलाल डेम, शिवखोरी, घाटियाँ मन मोहित कर जायेँ |
हाथी के सर मुकुट त्रिकुट का, दर्शन चित्त  चुराएँ ||
रोमांचकारी अनुभवों को शब्द नहीं दे पाई हूँ |
विस्तृत लेख लिखे, कविता में नहीं पिरो पाई हूँ ||

संपत देवी मुरारका 
हैदराबाद 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

अक्षरधाम -कुतुबमीनार








अक्षरधाम -कुतुबमीनार 



अक्षरधाम -कुतुबमीनार 
 दिल्ली रूपी अँगूठी में, अक्षरधाम का अनमोल हीरा जड़ गया |     .      
गुजरात के गाँधीनगर का, अक्षरधाम भी फीका पड़ गया ||

स्वामीनारायण अक्षरधाम,समूचा देख मन्त्र-मुग्ध थी |
शिल्प-कला कौशल की, यह कृति अनुपम अदभुत थी ||

आधुनिक युग को प्राचीन युग से, प्रभावित यहाँ देखा |   
आयें यहाँ तो ज्ञानचक्षु भी, खुल जायें अनेकों का ||

अक्षरधाम-महिमा का बखान अक्षरों में संभव नहीं | 
इसकी छवि  को देख कर ही हो सकेगा अनुभव यहीं ||

कुतुबमीनार पर चढ़ चाँद सितारे छूने को मन डोलता | 
मीनार की कारीगरी सजीव ऎसी कि हर पत्थर बोलता || 

करूँ प्रार्थना ईश्वर से मैं पर्यटन में सक्षम सब रहें |
ऎसी दुर्लभ कृतियों का दर्शन सभी नागरिक कर सके ||

संपत देवी मुरारका 
हैदराबाद