शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

“दुर्गादत्त पाण्डेय को श्रद्धांजलि”

दुर्गादत्त पाण्डेय को श्रद्धांजलि


नगर के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य के कवि श्री दुर्गादत्त पाण्डेय का पिछले रविवार 26 मई 2013   को बैंगलोर में आकस्मिक निधन हो गया जिससे नगरद्वय के हिंदी-उर्दू साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई | इस संदर्भ में नगर के हिंदी-उर्दू साहित्यिक संस्थाओं सांझ के साथी, कादम्बिनी क्लब, दक्षिण भारती साहित्य प्रकाशन समिति, ऑथर्स गिल्ड ऑफ इण्डिया, हैदराबाद चैप्टर, निराला साहित्य परिषद्, अबीर गुलाल, श्रीचंद कविता महाविद्यालय, सबरस, दसरंग, हंस वाहिनी, तृतीया, साहित्य संगम, जिन्दा दिलाने, हैदराबाद, समाज-दर्पण, आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि, ने सम्मिलित रूप से एक शोक सभा का आयोजन दिनांक 29-5-13 को हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली में किया | इस सभा में उपरोक्त संस्थाओं के पदाधिकारियों के अतिरिक्त उनके मित्र एवं प्रशंसक उपस्थित थे |

अवसर पर दुर्गादत्त पाण्डेय को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सर्वश्री नरेंद्र राय, अहिल्या मिश्र, मुस्तफा अलीबेग, सुजात अली, वेणुगोपाल भट्टड़, अजीत गुप्ता, वीर प्रकाश लाहोटी सावन, भंवरलाल उपाध्याय, बिशनलाल संघी, रामकृष्ण पाण्डेय, ओमप्रकाश अग्रवाल, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, मदनलाल मरलेचा, बलबीर सिंग, सखत अली, फरीद सहर, वहीद पाशा खादरी, शबाहत अली, नुसरत अली, सय्यद अब्दुल कादिर, मो. उमर, मुनव्वर अली मुख़्तर, श्रीमती पवित्रा अग्रवाल, मीना मूथा, भावना पुरोहित, संपत देवी मुरारका, सुषमा बैद, लीला बजाज, ज्योति नारायण, एलिजाबेथ कुरियन ने उनके व्यक्तित्व, स्वभाव, रचनाओं और अपने-अपने साथ बीते संस्मरणों का उल्लेख किया | जिसमें कहा गया कि दुर्गादत्त पाण्डेय एक अच्छे हास्य-व्यंग्य कविं होने के साथ-साथ एक अच्छे इंसान भी थे | उनकी मिलन सारिता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार हँसता हुआ चेहरा अभी भी हमारी आँखों में बसा हुआ है |

पिछले कुछ वर्षों से वे देशभर में आयोजित होने वाले अखिल भारतीय कवि-सम्मेलनों में प्राथमिकता से बुलाये जाने लगे थे, जहां उन्हें भरपूर सराहना मिल रही थी | उनका निधन ऐसे असमय पर हुआ कि जब वे बुलंदियों को छूने के करीब थे |

किस्मत की खूबी देखिये टूटी कहाँ कमन्द
दो चार हाथ जबकि लबे बाम रह गया

उनकी पानी वाला और शिखंडी कविता जहां उनके व्यंग्य के तेवर को दर्शाती है वहीं ये क्या हो रहा पाशामें हास्य-व्यंग्य के अतिरिक्त कट्टर साम्प्रदायिकता पर भी प्रहार करती है | इसी रचना की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य है |

मंदिर मस्जिद बनाते जारइं
खुलूस मोहब्बत मिटाते जारइं
चंदे तगड़े खाते जारइं
राम रहीम बन गए तमाशा
ये क्या हो राइं पाशा

सांझ के साथीके अध्यक्ष श्री नरेंद्र राय ने जहां इन पंक्तियों के साथ अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की |

हास्य-व्यंग्य में खोया रहता
     वो मतवाला चला गया
दक्खनी का पाशा मशहूर
     वो पानी वाला चला गया

वहीं हैदराबाद दूरदर्शन के Dy  Director श्री सुजात अली ने कहा,
        ‘दिल में यादों की तरह         
        आँख में अश्कों की तरह
        तुम मेरे पास हो
        फूल में खुशबू की तरह

अंत में दो मिनट का मौन एवं शान्ति पाठ के साथ सभा का समापन हुआ |

संपत देवी मुरारका
लेखिका यात्रा विवरण
   मीडिया प्रभारी
अध्यक्षा (इण्डिया काइण्डनेस मूवमेंट)
हैदराबाद
मो.नं.: 09441511238

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