मंगलवार, 14 नवंबर 2017

FW: HSSA Newsletter October 2017 New2




Dear Good Colleagues

Namaste

Please find attached October 2017 Hindi Khabar.

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Sewnath

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

बच्चों को क्यों पिसवा रहे हैं ? डॉ. वेदप्रताप वैदिक

बच्चों को क्यों पिसवा रहे हैं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
ऐसा लगता है कि उत्तराखंड की सरकार को मूर्खता का दौरा पड़ गया है। जो मूर्खता वह करने जा रही है, वह भारत में आज तक किसी भी सरकार ने नहीं की है। मज़े की बात है कि उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। अब उत्तराखंड के 18000 सरकारी स्कूलों में सारे विषयों की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और भाजपा के नेता कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सबसे ज्यादा पलीता उत्तराखंड की सरकार ही लगाएगी। वह अगले साल से पहली कक्षा से ही बच्चों की सारी पढ़ाई अंग्रेजी में करवाएगी। वह हिरण पर घास लादेगी। सारी दुनिया के शिक्षाशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि बच्चों पर विदेशी भाषा का माध्यम थोप देने से उनका बौद्धिक विकास रुक जाता है। उनकी जो शक्ति किसी विषय को समझने में लगनी चाहिए, वह अंग्रेजी से कुश्ती लड़ने में बर्बाद हो जाएगी। वे रटटू तोते बन जाएंगे। उनकी मौलिकता नष्ट हो जाएगी। वे दिमागी तौर पर बीमार हो जाएंगे। जर्मनी में यह मूर्खतापूर्ण प्रयोग किया जा चुका है। जो बच्चे मातृभाषा और राष्ट्रभाषा से स्कूलों में वंचित रहते हैं, वे अपने ही घर में बेगाने हो जाते हैं। वे अपनी परंपराओं, अपनी विचार-पद्धति और अपनी संस्कृति से कट जाते हैं। भाषाभ्रष्ट को संस्कारभ्रष्ट होते देर नहीं लगती। अकबर इलाहाबादी ने क्या खूब लिखा है--- 

हम उन कुल किताबों को काबिले-जब्ती समझते हैं।
जिन्हें पढ़कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं ।।

उत्तराखंड की सरकार ने इतना मूर्खतापूर्ण और दुस्साहसिक निर्णय क्यों किया ? शायद यह सोचकर कि बच्चे अच्छी अंग्रेजी जानेंगे तो बड़ी नौकरियां हथिया लेंगे। नौकरियां हथियाने के लिए आप अपने बच्चों को अंग्रेजी की चक्की में क्यों पिसवा रहे हैं ? यदि आप में दम है, पौरुष है तो इस चक्की को ही तोड़ डालिए। सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी हटाओ का नारा लगाइए। भारत जैसे भाषायी गुलाम राष्ट्रों की बात जाने दीजिए, दुनिया के किसी भी स्वाभिमानी और महाशक्ति राष्ट्र में लोग अपने बच्चों को विदेशी भाषा की चक्की में पिसने नहीं देते। हमारे ज्यादातर शीर्ष नेता अबौद्धिक और अनपढ़ हैं। वे हीनता ग्रंथि के शिकार है। उन्हें यह पता हीं नहीं कि विदेशी भाषाएं कब और क्यों पढ़ाई जानी चाहिए। इसीलिए इतने मूर्खतापूर्ण निर्णय ले लिए जाते हैं।

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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प्रतिक्रियाएँ : भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक लेख जय विजय की वेबसाइट पर प्रकाशित



भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक


लेख जय विजय की वेबसाइट पर प्रकाशित   http://jayvijay.co/2017/11/10/%E0%A4%AD%E0...
प्रतिक्रियाएँ



1.कृपया इस पोस्ट को मा.मोदी जी,और भाजपा के केंद्रीय कार्यालय तथा श्री प्रकाश जावड़ेकर को भेजने का कष्ट करें।
  डॉ.महेश 'दिवाकर', मुरादाबाद

2. वेदप्रताप भाई,
महामूर्खों और महापाखंडियों से समझदारी और इमानदारी की आशा करना उचित नहीं है| इसी लिए तो वर्तमान सरकार देशद्रोह-देशद्रोह चिल्लाती है ताकि उसके देशद्रोह के काले कारनामे इस शोर में डूब जाएं|  देश की भाषाओं के क़त्ल से बड़ा कोई देशद्रोह हो सकता है क्या! सादर,
जोगा सिंह

3. आदरणीय वैदिक जी के इन उद्गारों के लिए साधुवाद।
भारत की मनीषा आज कुन्द हो गयी है। भारत के शिक्षाविद और राजनेता अपनी भाषा, अपनी परम्परा, अपनी संस्कृति और इस महान राष्ट्र के स्वाभिमान के प्रति इतने निस्पृह हो गये हैं कि सहज ही विश्वास नहीं होता। देश में अंग्रेजी को जो अनावश्यक महत्त्व दिया जा रहा है, वह किसी भी देशाभिमानी व्यक्ति की समझ से परे है। सबसे बड़े दुःख की बात तो यह है कि उत्तर भारत के ठेठ हिन्दी-भाषी प्रान्तों में हिन्दी की दुर्गति होने लगी है। हमारे स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि अब उत्तर प्रदेश जैसे विशुद्ध हिन्दी-भाषी प्रान्त में भी बोर्ड परीक्षा में पाँच-पाँच लाख विद्यार्थी हिन्दी के पर्चे में अनुत्तीर्ण हो रहे हैं। अंग्रेजी का व्यामोह इतना बढ़ गया है कि अब इन प्रान्तों के अनपढ़ भी अक्षर-ज्ञान के नाम पर एबीसीडी से शुरुआत करने को वरीयता दे रहे हैं। डॉ. वैदिक को जानकर आश्चर्य होगा कि लखनऊ में मेरे मकान के आसपास की झोंपड़पट्टियों में रहनेवाले बच्चे अव्वल तो पढ़ने नहीं जाते और जाते भी हैं तो वे कखग अथवा अआइ के बजाय ABCD से पढ़ाई आरंभ कर रहे हैं। उन्हें लगता है अंग्रेजी सीखने में न्दी सीखने की अपेक्षा अधिक लाभ है। यह मिथ्या धारणा कौन फैला रहा है? कौन है जो भारतीय भाषाओं के खिलाफ साजिश रच रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर दिल्ली से मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के स्कूलों में भी अब पहली कक्षा से अंग्रेजी की पढ़ाई की बातें हो रही हैं। मूल समस्या कहाँ है? मूल समस्या है-हमारी सरकारी शिक्षालयों में। वहाँ शिक्षक पढ़ाते नहीं। वहाँ जो बच्चे नाम लिखा लेते हैं, वे शिक्षकों के काहिल होने के कारण अपना भविष्य चौपट कर लेते हैं। 

इसके विपरीत निजी स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ाना पड़ता है। और इऩ स्कूलों ने अपने को सरकारी स्कूलों से अलग दिखाने के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बना रखा है। लिहाजा निजी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे अंग्रेजी ही नहीं, सभी विषयों की पढ़ाई में अच्छे होते हैं और जीवन में आगे निकल जाते हैं। सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम रखने के पीछे शायद यही मुगालता काम कर रहा है, कि वहाँ के बच्चे भी अब निजी स्कूलों की तरह आगे निकल सकेंगे। 

यह धारणा पूरी तरह भ्रान्ति-आधारित है। सरकारी स्कूल का शिक्षक पढ़ाएगा ही नहीं तो माध्यम चाहे हिन्दी हो या अंग्रेजी, वहाँ कुछ नहीं बदलने वाला । बेहतर होता, दिल्ली नगर निगम अपने स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने पर ध्यान देती। और इसे दुबारा कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रारंभिक शिक्षा तो मातृभाषा में ही होनी चाहिए-फिर चाहे वह मातृभाषा हिन्दी हो अथवा पंजाबी (दिल्ली के संदर्भ में)। 
आर.वी.सिंह/R.V. Singh उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi) 
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India, प्रधान कार्यालय/Head Office 
लखनऊ/Lucknow- 226 001, फोन/Phone-2288774, मोबाइल/Mob-9454712299, ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in


4. सर, आपका हिंदी भाषा के प्रति लगाव जुड़ाव और उसके प्रति चिंता के लिए आपका नमन है। लेकिन एक बात कहना चाहूंगा। मैं एक गरीब परिवार में जन्‍मा हूं। पढ़ाई लिखाई शुद्ध रूप से हिंदी माध्‍यम से हुआ है। मैं बहुत छोटा कर्मचारी हूं भारत सरकार के केंद्रीय विश्‍वविद्यालय में। पिछले कई सालों से भारत सरकार के विभिन्‍न विभागों में ऊंचे पद के लिए साक्षात्‍कार में जब भी जाता हूं अंग्रेजी में नहीं बोल पाने के कारण चयन नहीं हो पा रहा है। जबकि अपने विश्‍वविद्यालय में मैं एक मेहनती और अच्‍छा कर्मचारी हूं। मैं फिर कैसे अपने बच्‍चों को अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाना चाहूंगा। इसपर कोई सरकार नहीं सोचती।  हिंदी अब पढ़ने-पढ़ाने का नहीं राजनीति का माध्‍यम बन गया है। 
आलोक कुमार r <alokkumarsingh74@gmail.com>

5. महोदय आपकी जानकारी को बता दू कि संघ लोक सेवा आयोग के सामने जो धरना चला थे उसके करता और धर्ता स्वर्गीय श्री राजकारन सिंह थे जिन्हे अनगिनत बार गिरफ्तार किया गया था,लोकसभा में कूदने के कारन श्री पुस्पेंदेर चौहान की पसलिया टूट गयी थी। पुस्पेंदेर चौहान आज भी हिंदी के लिए लड़ रहे हे / श्री देबसिंघ रावत आज भी इस आंदोलन के लिए जिन्दा रखे हे ।
डी.पी. सिंह राठौर

6. भाजपा भटकाव से ग्रस्त एक राजनैतिक दल है जो कभी कुछ करती है तो कभी उसका उल्टा। एक तरफ़ स्वदेशी की बात करती है तो दूसरी तरफ़ अंग्रेजी और अग्रेजियत को देश पर लादने के किए कमर कसे हुए है। विरोधाभासों का नाम है भाजपा। देश को अमेरिका-विलायत बनाने के चक्कर में देश का बंटाधार न कर डाले ऐसा डर मुझे लगने गला है। भाजपा राज के सीमित काल में मुझे लगने लगा है कि इसे सत्ता से हटाया ही जाना चाहिए।
योगेंद्र जोशी

7. मां की बगिया, अपने ही हाथों, जब निज धरा पर ही उजड़ रही है। कैसे कहें कि भविष्य उज्जवल, विश्वभर में ये बढ़ रही है ।
  डॉ. एम.एल गुप्ता 'आदित्य

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किसी भाषा के साहित्य की रक्षा के लिए उस भाषा का जन संचार में प्रवाह प्राथमिक आवश्यकता है।
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
वेबसाइट- वैश्विकहिंदी.भारत /  www.vhindi.in
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'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
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भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक





​​इंदौर,अगस्त 1990 में डॉ. वेदप्रताप वैदिक द्वारा आयोजित अखिल भारतीय अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन में हजारों आंदोलनकारियों ने भाग लिया।
 मंच पर बैठे हैं पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह, मप्र के मुख्यमंत्री श्री सुंदरलाल पटवा, हिमाचल के मुख्यमंत्री श्री शांताकुमार, 
उप्र के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, केन्द्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्रा, श्री जार्ज फर्नाडीस तथा लगभग 50 सांसद व विधायकगण। www.drvaidik.in
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12 मई 1994 को डाॅ. वेदप्रताप वैदिक द्वारा संघ लोकसेवा आयोग पर आयोजित अंग्रेजी विरोधी धरना। धरने में शामिल नेताओं में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह, 
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी व श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, चौधरी देवीलाल, श्री रामविलास पासवान, श्री नीतीश कुमार तथा अन्य नेतागण।​
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भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक


उत्तरी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली का नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा है। ये दोनों निगमें ऐसे भयंकर काम करने जा रही हैं, जिन्हें गुरु गोलवलकर या दीनदयाल उपाध्याय देख लेते तो अपना माथा कूट लेते। इन दोनों निगमों के दिल्ली में 1700 स्कूल हैं। इन स्कूलों की नर्सरी और पहली कक्षा के बच्चों को अब हर विषय अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना होगा। यह अनिवार्य होगा। धीरे-धीरे सभी कक्षाओं में अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य करने की कोशिश की जाएगी। गजब की मूर्खता है, यह ! अभी तक तो देश में झगड़ा यह था कि बच्चों को अंग्रेजी एक विषय के तौर पर पढ़ाई जाए या नहीं ? अब होनेवाला यह है कि सारे विषय अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाए जाएं। यह विचार जिस दिमाग में उपजा है, उसका ठस्स होना, उसका गुलाम होना, उसका नकलची होना अपरंपार है। उनका यह विचार बाल-शिक्षा के समस्त सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। 

मैंने आज तक किसी भी बाल-शिक्षा विशेषज्ञ को इतना मूर्खतापूर्ण विचार प्रस्तुत करते हुए नहीं पाया। बल्कि उल्टा पाया। दुनिया के श्रेष्ठतम शिक्षाविदों का कहना है कि बच्चों की शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा ही होनी चाहिए। ऐसा होने पर उनकी मौलिकता बनी रहती है, स्मृति प्रखर रहती है, समय कम लगता है, आत्म-विश्वास बढ़ता है और विदेशी भाषा का माध्यम होने पर वे रट्टू तोते बन जाते हैं, उनकी बुद्धि कुंद हो जाती है, उनकी सीखने की क्षमता मंद पड़ जाती है और उनका आत्मविश्वास घट जाता है। अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई देश में लाॅर्ड मैकाले की औलादों को पैदा करता है। अंग्रेजी के चलते देश में करोड़ों बच्चे हर साल अनुत्तीर्ण होते हैं और वे पढ़ाई से मुंह मोड़ लेते हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था की दुश्मन अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई है और अंग्रेजी माध्यम की अनिवार्य पढ़ाई तो अत्यंत विनाशकारी है। स्वेच्छा से जितनी भी विदेशी भाषाएं सीखें, उतना अच्छा लेकिन भाजपा की ये नगर निगमें अपना मुंह काला करने पर उतारु हैं तो इन्हें कौन रोक सकता है ? भाजपा इस कलंक को कैसे धोएगी, वही जाने। वह इसे लगने ही क्यों दे ?


वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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डॉ. अमरनाथ शर्मा का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र



डॉ. अमरनाथ शर्मा का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र

दिल्ली कार्पोरेशन के अंतर्गत आने वाले स्कूलों को आगामी मार्च से अंग्रेजी माध्यम में बदल देने का फैसला ।

प्रतिक्रियाएँ- 1
प्रो अमर नाथ शर्मा का माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र (दिनांक नवंबर, 2017) में दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में मार्च 2018 से अंग्रेज़ी पढ़ाने के संबंध में जो व्यथा व्यक्त की है, उससे दिल्ली के अधिकतर लोग सहमत हैं। हम सभी व्यथित हैं कि दिल्ली नगर निगमों के स्कूलों में मार्च 2018 से पहली कक्षा से अंग्रेज़ी शुरू हो जाएगी। कैसी विडंबना है इस देश कीजिसमें अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं और उनमें से सौ से अधिक बड़ी भाषाएँ बोली, पढ़ी और लिखी जाती हैं। फिर पता नहीं, हम विदेशी भाषा अंग्रेज़ी का सहारा क्यो लेते हैं, क्यों अंग्रेज़ी पर निर्भर रहते हैअनेक विद्वानों, शिक्षाविदों और महापुरुषों का यही मत रहा है कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। महात्मा गांधी ने हरिजन के जुलाई, 1938 के अंक में अपने विद्यार्थी जीवन के अनुभव बताते हुए मातृभाषा के महत्व को प्रतिपादित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है। अपने विषय को सीखने और समझने की पकड़ बच्चे के लिए अपनी मातृभाषा में अधिक आसान और स्पष्ट होती है और अध्यापक के लिए सम्झना और पढ़ाना भी सरल होता है। वास्तव में विदेशी भाषा में अपने विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते और अगर आ भी जाते है तो आधे-अधूरे। अंग्रेज़ी जैसी भाषा को तो दिमाग में घुसेड़ना भी बहुत ही कष्टकारी होता है, क्योंकि वह जैसी लिखी जाती है वैसी बोली नहीं जाती। इसकी वर्तनी (spelling) और उच्चारण को सीखने में काफी समय लग जाता है। वस्तुतशिक्षा के प्रति हमारी सरकारों का दृष्टिकोण उपेक्षित, उदासीन और संवेदनहींन रहा है। वे नहीं जानते और न ही जानने का प्रयास करते हैं कि देश के विकास में शिक्षा की अहम भूमिका रहती है और मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने पर बच्चे में देश-भक्ति, अपनी संस्कृति और जीवनादर्शों के संस्कार बचपन से ही पैदा हो जाते हैं।
थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने सन् 1835 में जिस शिक्षा व्यवस्था का निर्धारण किया था, उससे हम आगे नहीं बढ़े हैं। मैकाले को न तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान था और न ही किसी भारतीय भाषा का। इस लिए उसने अपनी उपनिवेशी शक्ति का प्रयोग करते हुए तत्कालीन भारत पर अंग्रेज़ी को थोपा वह अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी को विश्व की भाषाओं में सर्वाधिक उत्कृष्ट और समृद्ध मानता था और इसी से वह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को खत्म करना चाहता था। हम आज तक उसीकी नकल करते आ रहे हैं। लगता है कि न तो हम भारतीय संदर्भ में कुछ सोचते हैं और न ही हमारा कोई विज़न है राजनीति के तथाकथित कर्णधार और अंग्रेज़ीदाँ अधिकारी शिक्षा की प्रकृति, प्रवृति, प्रासंगिकता और महत्ता को समझे बिना अपने स्वार्थ के आधार पर अपनी मर्ज़ी से शिक्षा में बदलाव करते रहते हैं। श्री लाल शुक्ल ने अपने राग दरबारी उपन्यास में व्यंग्य करते हुए एक पात्र से सही कहलवाया है किहमारी शिक्षा पद्धति सड़क की वह कुतिया है जिसे हर कोई एक लात मार देता है। शिक्षा के ठेकेदारों और तथाकथित कर्णधारों को मालूम होना चाहिए कि नई पीढ़ी के स्वाभाविक विकास में पराई भाषा रुकावट डालती है। भारत सरकार द्वारा गठित शिक्षा आयोगों ने भी शिक्षाशस्त्रीय दृष्टि से समय-समय पर यही कहा है कि विद्यारंभ करने वाले विद्यार्थी के लिए उसकी मातृभाषा ही सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है, लेकिन इन आयोगों की सिफ़ारशों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक में मैं प्राथमिक कक्षाओं का विद्यार्थी था और उस समय अंग्रेज़ी पाँचवीं कक्षा से ही प्रारंभ होती थी। क्या हमारी शिक्षा आज की शिक्षा से अच्छी नहीं थी? वास्तव में दिल्ली नगर निगम प्राइवेट स्कूलों से मुक़ाबला करना चाहते हैं और इस मुक़ाबले में वे अंग्रेज़ी का सहारा ले कर अपनी पढ़ाई का स्तर बढ़ाना चाहते हैं। इस से शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं हो गा। क्या आप समझते हैं कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिक मेधावी और कुशल होते हैं? ऐसा कदापि नहीं है। यह केवल भ्रम है कि अङ्ग्रेज़ी पढ़ने वाले बच्चे होशियार होते हैं। अगर नगर निगमों के स्कूलों को वैज्ञानिक दृष्टि से शिक्षा के स्तर को सुधारने का प्रयास किया जाए और उन स्कूलों के अध्यापक ईमानदारी तथा मेहनत से शिक्षण-कार्य कराएँ तो कोई वजह नहीं कि ये स्कूल भी शिक्षा के उच्च स्तर पर पहुँच सकते हैं। हमारे सामने फ़िनलैंड, स्वीडन आदि अनेक देशों के उदाहरण हैं जहाँ स्कूलों में मातृभाषा में ही शिक्षण कराया जाता है। इस प्रयास में हिन्दी का योगदान उल्लेखनीय होगा और निगमों में पढ़ने वाले बच्चों का मानसिक विकास तो होगा ही, वह अपने देश के समाज, संस्कृति और जीवन-शैली से भी अवगत होगा। बचपन में पड़े संस्कार प्रायजीवन पर्यंत विद्यमान रहते हैं। वह एक नकलची और रटंतू न बन कर कुशल और मेधावी भी होगा
अतभारत सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगमों से आग्रह है कि वे इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और प्राथमिक स्कूलों में हिन्दी में ही पढ़ाई की व्यवस्था कराएँ। इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का तो विकास होगा ही, साथ में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अनुरक्षण भी होगा और बालक सच्चे भारतीय के रूप में आगे बढ़ेगा

  प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी
सदस्य, केंद्रीय हिंदी समिति, भारत सरकार
महासचिव एवं निदेशकविश्व नागरी विज्ञान संस्थान, गुरुग्राम-दिल्ली                                             
     Kkgoswami1942@gmail.com,   मो : 0-9971553740      
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आदरणीय  सर ,
सादर नमस्कार .
आपका प्रधानमंत्री मोदी जी को लिखा खुला पत्र पढ़ा . गज़ब ..अद्भुत ..। आप जैसे विद्वान् अपनी सजगता के चलते हिंदी का बाल भी बांका नहीं होने देंगे , इस बात का पूरा विश्वास है .समस्त हिंदी - जन की ओर से आपको कोटिश: धन्यवाद और अभिनन्दन सादर !
भारती गोरे 
प्रोफ़ेसर , हिंदी विभाग ,डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय,औरंगाबाद -४३१००४ महाराष्ट्र 
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 महोदय , 
     आपके द्वारा आदरणीय प्रधानमंत्री जी को लिखा गया खुला पत्र काफी सराहणीय प्रयास है और उम्मीद है कि इस प्रयास का कुछ ठोस परिणाम निकलेगा I
प्रीतेश कुमार, priteshkumar1978@gmail.com
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प्रो. जी सादर नमस्कार,
आपने जिस प्रश्न को उठाया है अत्यंत ही विचारात्मक है | मैं कैनेडा से एक हिंदी की पत्रिका पिछले २० वर्षों से हिंदी को बचाने लिए प्रकाशित कर रहा हूँ | विदेशों में काम करने वाले भारत के काउंसिलर आदि कहते तो हिंदी की बातें लेकिन किसी की सहायता नहीं करते | उनका सारा काम अंग्रेज़ी में ही होता है | और यदि हिंदी के विषय में उनसे कोइ बात कही जाय तो उसे ताल दिया जाता | मैं आप इस विचार से सहमत हूँ और अपने इस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थक हूँ  |
हिंदी चेतना सम्पादक श्याम त्रिपाठी 
shiamtripathi@gmail.com
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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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