मंगलवार, 11 अगस्त 2020

वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] आधुनिक हिन्दी के संरक्षक राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन - प्रो. अमरनाथ, प्रेमचंद व्यक्तितत्व एवं कृतित्व पर ई-संगोष्ठी, प्रेमचंद व्यक्तितत्व एवं कृतित्व पर ई-संगोष्ठी, शाश्वत सृजन परहिन्दी के योद्धा प्रेमचंद का भाषा चिन्तन, महानायक तिलक

 


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हिन्दी के योद्धा : जिनका आज जन्मदिन है-  




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  राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन  

प्रो. अमरनाथ


भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन (1.8.1882- 1.7.1962) का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण ही हुआ. 17 फ़रवरी 1951 को मुजफ्फरनगर 'सुहृद संघके 17 वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर टण्डन जी ने कहा था- "हिन्दी के पक्ष को सबल करने के उद्देश्य से ही मैंने कांग्रेस जैसी संस्था में प्रवेश कियाक्योंकि मेरे हृदय पर हिन्दी का ही प्रभाव सबसे अधिक था और मैंने उसे ही अपने जीवन का सबसे महान व्रत


 बनाया....... हिन्दी साहित्य के प्रति मेरे (उसी) प्रेम ने उसके स्वार्थों की रक्षा और उसके विकास के पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया." 

राजर्षि में बाल्यकाल से ही हिन्दी के प्रति अनुराग था. इस प्रेम को बालकृष्ण भट्ट और मदन मोहन मालवीय जी ने प्रौढ़ता प्रदान करने की. 10 अक्टूवर 1910 को काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन महामना मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ और टण्डन जी सम्मेलन के मंत्री नियुक्त हुए. तदनन्तर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी की अत्यधिक सेवा की. टण्डन जी ने हिन्दी के प्रचार- प्रसार के लिए हिन्दी विद्यापीठ प्रयाग की स्थापना की. इस पीठ की स्थापना का उद्देश्य हिन्दी शिक्षा का प्रसार और अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करना था. सम्मेलन हिन्दी की अनेक परीक्षाएँ सम्पन्न करता था. इन परीक्षाओं से दक्षिण में भी हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ. सम्मेलन के इस कार्य का प्रभाव महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भी पड़ाअनेक महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम को मान्यता मिली. वे जानते थे कि सम्पूर्ण भारत में हिन्दी के प्रसार के लिए अहिन्दी भाषियों का सहयोग अपेक्षित है. शायद उनकी इसी सोच का परिणाम था सम्मेलन में गाँधी का लिया जाना. आगे चलकर 'हिन्दुस्तानीके प्रश्न पर टण्डन जी और महात्मा गाँधी में मतभेद हुआ. गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे. उन्होंने गुजरात शिक्षा सम्मेलनभड़ौच में 20 अक्टूबर 1917 को दिए गए अपने भाषण  में कहा है, “ऐसी दलील दी जाती है कि हिन्दी और उर्दू दो अलग अलग  भाषाएं हैं. यह दलील सही नहीं है. उत्तर भारत में मुसलमान और हिन्दू दोनो एक ही भाषा बोलते हैं. भेद पढ़े लिखे लोगों ने डाला है.  इसका अर्थ यह है कि  हिन्दू शिक्षित वर्ग ने हिन्दी को केवल संस्कृमय बना दिया है. इस कारण कितने ही मुसलमान उसे समझ नहीं सकते.  लखनऊ के मुसलमान भाइयों ने उर्दू में फारसी भर दी है और उसे हिन्दुओं के समझने के अयोग्य बना दिया है.  ये दोनो केवल पंडिताऊ भाषाएं हैंऔर उनको जनसाधारण में कोई स्थान प्राप्त नहीं है.  ( संपूर्ण गाँधी वाँग्मयखण्ड-14, प्रकाशन विभागभारत सरकार, 1965, पृष्ठ-20-20)

      इस विषय पर लम्बे समय तक टण्डन जी और महात्मा गाँधी के बीच पत्र व्यवहार होता रहा.  टंडन जी हिन्दी के समर्थक थे- अपेक्षाकृत संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के. डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार तो  काँग्रेस की बैठक में होने वाले मतदान में 78 के मुकाबले 77 वोटों से हिन्दुस्तानी हार गई और वह एक वोट सभाध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद का था. डॉ. अम्बेडकर ने अपने एक व्याख्यान में कहा हैं, “भारतीय संविधान के प्रारूप पर विचार करते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकृत किए जाने के प्रश्न पर कांग्रेस पार्टी मीटिंग में क्या हुआयदि मैं इस बात को अब जनता को बताऊं तो शायद रहस्योद्घाटन का दोष मुझे नहीं दिया जाएगा. इस प्रश्न से संबंधित धारा 15 से अधिक विवादास्पद कोई दूसरी धारा नहीं थी. इससे अधिक विरोध किसी धारा का नहीं हुआ. इससे अधिक गरमागरमी किसी धारा पर नहीं हुई. एक लम्बे विवाद के बाद जब इस प्रश्न पर मतदान हुआदोनो पक्ष में 78 मत थे. राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी को स्थान एक मत से मिला. ये तथ्य मैं अपनी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर सामने रख रहा हूँ. प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काँग्रेस पार्टी में मेरा स्वाभाविक प्रवेश था.”( अम्बेडकर भीमरावथाट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्सडॉ. बाबा साहेब अंबेडकर राइटिंग्स एण्ड स्पीचेजखण्ड-1, सं. बसंत मूनएजूकेशन डिपार्टमेंटगवर्नमेंट ऑफ महाराष्ट्र, 1989, पृष्ठ-148) यद्यपि इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस की जिस मीटिंग का उल्लेख डॉ. अम्बेडकर ने किया है वह किस तारीख को और कहाँ हुई थी. जे. आर. कपूर ने तो यहाँ तक लिखा है कि कांग्रेस की इस तरह की किसी मीटिंगं की कोई प्रामाणिक सूचना नहीं मिलती जिसमें हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर मतदान हुआ हो. देयर बीइंग प्रेक्टिकल यूनानिमिटी ऑन द क्वेश्चन ऑफ हिन्दी वीइंग द ऑफिशियल लैंग्वेज ऑप द यूनियन, देयर वाज नेवर एनी ऑकेजन फॉर इट दू बी पुट टू वोट इन एनी कांस्चूयेन्ट असेम्बली कांग्रेस पार्टी मीटिंग.”( www.wikipedia.org/hindi and hindustani).

 इसके बाद जैसे जैसे आजादी करीब आती गई दो राष्ट्रों के सिद्धांत को बल मिलता गया और साम्प्रदायिकता बाढ़ की तरह उफनती गई. मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार किया. जुलाई 1947 में कांग्रेस ने देश विभाजन को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया. ऐसी दशा में हिन्दी और हिन्दुस्तानी के मसले को नए ढंग से देखा जाने लगा. नेताओं ने उर्दू को भी विभाजन को बढ़ावा देने वाली भाषा के रूप में देखा और इस तरह हिन्दी और उर्दू को हिन्दू और मुस्लिम से जोड़कर देखने वालो की संख्या बढ़ती गई. अंतत: गाँधी जी के समन्वय और धर्मनिरपेक्षतावादी दृष्टिकोण के पक्ष में आवाजें मंद पड़ती गईं और 17 जुलाई 1947 को संविधान सभा के बाहर कांग्रेस की मीटिंग में हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर मतदान हुआ जिसमें 32 के मुकाबले 63 वोटों से हिन्दी की जीत हुई. एक दूसरे मतदान में देवनागरी के पक्ष में 63 और विरोध मे 18 मत पड़े. जाहिर है सन् 1949 में 11 से 14 सितंबर तक चलने वाली बैठक में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया. भाषा संबंधी इस मुद्दे को ऐतिहासिक परिणति तक पहुँचाने में राजर्षि टण्डन की भूमिका अन्यतम थी.

 टंडन जी को गाँधी जी ने 25.05.1945 को लिखे अपने पत्र में कहा है, “मेरे पास उर्दू में खत आते हैंहिन्दी में आते हैं और गुजराती में. सब पूछते हैं किमैं कैसे हिन्दी साहित्य सम्मेलन में रह सकता हूँ और हिन्दुस्तानी भाषा में भी वे कहते हैंसम्म्लन की दृष्टि में हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है. जिसमें नागरी लिपि को ही राष्ट्रीय स्थान दिया जाता है. जब मैं सम्मेलन की भाषा  और नागरी लिपि को पूरा राष्ट्रीय स्थान नहीं देता हूँ तब मुझे सम्मेलन में से हट जाना चाहिए.. ऐसी दलील मुझे योग्य लगती है. इस हालत में क्या सम्मेलन से हटना मेरा फर्ज नहीं होता है ऐसा करने से लोगों को दुविधा न रहेगी  और मुझे पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ. जवाब में टण्डन जी ने 8.05.1945 को गाँधी जी को लिखा, “पूज्य बापूजीआप का 25 मई का पत्र मुझे मिला. आप को  स्वयं हिन्दी साहित्य सम्मेलन का सदस्य रहते हुए लगभग 27 वर्ष हो गए. इस बीच आपने  हिन्दी प्रचार का काम राष्ट्रीयता की दृष्टि से किया. वह सब काम गलत थाऐसा तो आप नहीं मानते होंगे. राष्ट्रीय दृष्टि से हिन्दी का प्रचार वांछनीय हैयह तो आप का सिद्धांत है ही. आप के नए दृष्टिकोण के अनुसार उर्दू-शिक्षण का भी प्रचार होना चाहिए. यह पहले काम से भिन्न एक नया काम हैजिसका पिछले काम से कोई विरोध नहीं है.

सम्मेलन हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानता है. उर्दू को वह हिन्दी की एक शैली मानता हैजो विशिष्टजनों में प्रचलित है. स्वयं वह हिन्दी की साधारण शैली में काम करता हैउर्दू शैली का नहीं. आप हिन्दी के साथ उर्दू को भी चलाते हैं. सम्मेलन उसका तनिक भी विरोध नही करता. किन्तुराष्ट्रीय कामों में अंग्रेजी को हटाने में वह उसकी सहायता का स्वागत करता है. भेद केवल इतना ही है कि आप दोनो चलाना चाहते हैं. सम्मेलन आरंभ से केवल हिन्दी चलाता आया है. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सदस्यों को हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सदस्य होने से रोक नहीं है. हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से निर्वाचित प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी एकैडमी के सदस्य हैं और हिन्दुस्तानी एकैडमी हिन्दी और उर्दू दोनो शैलियाँ और लिपियाँ चलाती है. इस दृष्टि से मेरा निवेदन है कि मुझे इस बात का कोई अवसर नहीं लगता कि आप सम्मेलन छोड़ें. ..... मुझे जो बात उचित लगीऊपर निवेदन किया किन्तु यदि आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं और आप की आत्मा यही कहती है कि सम्मेलन से अलग हो जाऊं तो आप के अलग होने की बात पर बहुत खेद होते हुए भी नतमस्तक हो आप के निर्णय को स्वीकार करूंगा.

विनीतपुरुषोत्तमदास टण्डन (उद्धृतहिन्दी राष्ट्रभाषा से राजभाषा तकविमलेश कान्ति वर्मापृष्ठ-43) 

गाँधी जी ने टण्डन जी के उक्त पत्र का विस्तार से जवाब अपने 13.06.1945 को लिखे पत्र में दिया इसके बाद फिर टंडन जी ने लगभग पाँच पृष्ठ का पत्र गाँधी जी को लिखा. इस तरह लम्बे पत्राचार के बाद अन्तत:  सेवाग्राम  से 25 जुलाई 1945 को गाँधी जी को लिखना पड़ा, “आप का ता. 11.7.45 का पत्र मिला. मैने दो बार पढ़ा. बाद में भाई किशोरीलाल को दिया. वे स्वतंत्र विचारक हैंआप जानते होंगे. उन्होंने जो लिखा है सो भी भेजता हूँ. मैं तो इतना ही कहूंगाजहां तक हो सका मैं आप के प्रेम के अधीन रहा हूँ. अब समय गया है कि वही प्रेम मुझे आप से वियोग कराएगा. मैं अपनी बात नहीं समझा सका हूँ. यही पत्र आप सम्मेलन की स्थाई समिति के पास रखें. मेरा ख्याल है कि सम्मेलन ने मेरी हिन्दी की व्याख्या अपनायी नहीं है.  अब तो मेरे विचार इसी दिशा में आगे बढ़े हैं.  राष्ट्रभाषा की मेरी व्याख्या में हिन्दी और उर्दू लिपि और दोनो शैलियों का ज्ञान आता है.  ऐसा होने से ही दोनो का समन्वय होने का है तो हो जाएगा. मुझे डर है कि मेरी यह बात सम्मेलन को चुभेगी. इसलिए मेरा स्तीफा कबूल किया जाय. हिन्दुस्तानी प्रचार सभा का कठिन काम करते हुए मैं हिन्दी की सेवा करूँगा और उर्दू की भी. “( उद्धृतउपर्युक्तपृष्ठ- 50)

और इस तरह हिन्दुस्तानी और हिन्दी के विवाद में महात्मा गाँधी का दशकों पुराना संबंध हिन्दी साहित्य सम्मेलन से टूट गया.

हिन्दी के स्वरूप को लेकर उन दिनों काँग्रेस के भीतर ही दो गुट हो गए- एक गाँधीजी की हिन्दुस्तानी का पक्षधर और दूसरा टण्डन जी की हिन्दी का. राजर्षि टण्डन के संघर्ष का ही परिणाम था कि गाँधीनेहरूमौलाना अबुलकलाम आजाद आदि द्वारा हिन्दुस्तानी के समर्थन के बावजूद काँग्रेस की बैठक में होने वाले मतदान में 78 के मुकाबले 77 वोटों से हिन्दुस्तानी हार गई. इसके बाद जैसे जैसे आजादी करीब आती गईदो राष्ट्रों के सिद्धांत को बल मिलता गया और साम्प्रदायिकता बढ़ती गई.  स्वाभाविक था हिन्दी और उर्दू को हिन्दू और मुस्लिम से जोड़कर देखने वालों की संख्या बढ़ती गई और अंतत: गाँधी जी के समन्वय और धर्मनिरपेक्षतावादी दृष्टिकोण के पक्ष में आवाजें मंद पड़ती गईं. इस बीच देश विभाजित हो चुका था और पाकिस्तान उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित कर चुका था. जाहिर है सन् 1949 में 11 से 14 सितंबर तक लगातार चलने वाली बहस के बाद संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया.

प्रसिद्ध साहित्यकार लक्ष्मीनारायण सुधांशु हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति राजर्षि टण्डन के योगदान का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- ‘‘उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य क्षेत्र में कोर्इ सर्जनात्मक कृति नहीं दी हैकुछ तुकबन्दियों तथा लेखों के अतिरिक्त उन्होंने और कुछ नहीं लिखा. लेकिन उनकी वास्तविक कृति है अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का संगठन. इसके द्वारा उन्होंने हिन्दी साहित्य की परीक्षाओं का जो संचालन कियाउससे साधारण जनता में हिन्दी साहित्य के प्रति अभिरुचिसाहित्य की जानकारी और लोक साहित्य में जागृति की भूमिका बनी. सम्मेलन की परीक्षाओं का जाल सम्पूर्ण भारत में बिछ गया. सन् 1910-1950 के मध्य राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का श्रेय टण्डन जी को है. इसीलिए लोग उन्हें राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्राण कहा करते थे.’’

सन् 1949 में जब संविधान सभा में राजभाषा सम्बंधी प्रश्न उठाया गया तो उस समय एक विचित्र स्थिति थी. पं० नेहरूअबुलकलाम आजाद जैसे अनेक नेता हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे. वहाँ गाँधीजी का बार -बार हवाला दिया गया. मो. इस्माइल ने गाँधी जी के एक लेख का हिस्सा उद्धृत किया,  भारत के करोड़ो ग्रामीणों को पुस्तकों से कोई मतलब नहीं है. वे हिन्दुस्तानी बोलते हैं जिसे मुस्लिम उर्दू में लिखते हैं तथा हिन्दू उर्दू लिपि या नागरी लिपि में लिखते हैं. अतएव मेरे और आप जैसे लोगों का कर्तव्य है कि दोनो लिपियों को सीखें. ( संविधान सभा में 14 सितंबर को दिए गए भाषण से ) परन्तु टण्डन जी झुके नहीं. 11,12,13,14 दिसम्बर 1949 को गरमागरम बहस के बाद हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर सदन में मतदान हुआ और अन्तत: देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी संघ की राजभाषा घोषित हुई.

      ‘हिन्दी राष्ट्रभाषा क्यों’, ‘मातृभाषा की महत्ता’, ‘भाषा का सवाल’, ‘गौरवशाली हिन्दी’, ‘हिन्दी की शक्ति’, ‘कवि और दार्शनिक’ आदि विषयों पर टण्डन जी के निबंध प्रकाशित हैं.

पुरुषोत्तमदास टण्डन के बहु आयामी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को देखकर उन्हें 'राजर्षिकी उपाधि से विभूषित किया गया. 15 अप्रैल सन् 1948 की संध्यावेला में सरयू तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संत देवरहा बाबा ने उन्हें 'राजर्षिकी उपाधि से अलंकृत किया.

भारत सरकार ने उन्हें देश का सर्वोत्तम सम्मान भारत रत्न’ से विभूषित किया.

आज उनके जन्मदिन पर हम हिन्दी के लिए किए गए उनके महान योगदान का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

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संदेश -  क्या नई शिक्षा नीति  के प्रावधानों से भारत में शिक्षा के माध्यम में कुछ परिवर्तन होगा ?
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प्रेमचंद व्यक्तितत्व एवं कृतित्व पर ई-संगोष्ठी 

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शाश्वत सृजन पर

हिन्दी के योद्धा प्रेमचंद का भाषा चिन्तन


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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

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लेखिका यात्रा विवरण

मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

मो.: 09703982136

शनिवार, 8 अगस्त 2020

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन ? वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 1, वेद प्रताप वैदिक, राहुल देव तथा आर.के. सिन्हा

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नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन... ?
वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 1

नई शिक्षा नीति बनाकर सरकार ने सराहनीय कार्य किया है लेकिन ऐसा करने में उसने छह साल क्यों लगा दिए ? उसके छह साल लग गए याने शिक्षा के मामले में उसका दिमाग बिल्कुल खाली था ? शून्य था ? क्या सचमुच ऐसा था ? नहीं ! भाजपा पहले दिन से भारत की शिक्षा-प्रणाली के सुधार पर जोर दे रही है। भाजपा के पहले जनसंघ और जनसंघ के पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मैकाले की शिक्षा-प्रणाली का डटकर विरोध करता रहा है और कांग्रेस सरकारों की शिक्षा-नीति में कई बुनियादी सुधार सुझाता रहा है। लेकिन इस नई शिक्षा नीति को मोटे तौर पर देखने से यह पता नहीं चलता कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन कैसे होंगे ? 

कुछ संशोधन और परिवर्तन तो शिक्षा के ढांचे को अवश्य सुधारेंगे लेकिन देखना यह है कि यह नई शिक्षा-व्यवस्था 'इंडिया' और 'भारत' के बीच अब तक जो दीवार खड़ी की गई है, उसे तोड़ पाएगी या नहीं ? देश के निजी स्कूलों और कालेजों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े छात्र ‘इंडिया’ हैं और सरकार के टाटपट्टी स्कूलों में पढ़े हुए ग्रामीणों, गरीबों, पिछड़ों के बच्चे ‘भारत’ हैं। इस भारत की छाती पर ही इंडिया सवार रहता है।

इस दोमुंही शिक्षा नीति का खात्मा कैसे हो ? इसका आसान तरीका तो यह है कि देश के सारे गैर-सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। संपूर्ण शिक्षा का सरकारीकरण कर दिया जाए। ऐसा करने के कई दुष्परिणाम हो सकते हैं। इसमें कई व्यावहारिक कठिनाइयां भी हैं लेकिन देश में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का एक नायाब तरीका मैंने 5-6 साल पहले सुझाया था, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाद में अपने फैसले की तौर पर घोषित कर दिया था। वह सुझाव यह है कि राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक जितने भी लोग सरकारी तनखा पाते हैं, उनके बच्चों की पढ़ाई अनिवार्य रुप से सरकारी स्कूलों और कालेजों में ही होनी चाहिए। देखिए, फिर क्या चमत्कार होता है ? रातोंरात शिक्षा के स्तर में सुधार हो जाएगा। यदि हमारा शिक्षा मंत्रालय कम से कम इतना ही करे कि यह बता दे कि हमारे कितने न्यायाधीशों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, पार्षदो, अफसरों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी शिक्षा-संस्था में पढ़ते हैं ? ये आंकड़े ही हमारी आंखें खोल देंगे। यदि हमें भारत को महान और महाशक्ति राष्ट्र बनाना है तो इस दोमुंही शिक्षा नीति को ध्वस्त करना होगा। 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
वरिष्ठ पत्रकार, विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष व भारतीय भाषा समर्थक।
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ह निश्चय ही क्रांतिकारी और अनिवार्य कदम होगा। आशा है यह निजी विद्यालयों पर भी समान रूप से लागू होगा। इसके बिना न प्रभावी होगा न अंग्रेजी का घातक वर्चस्व खत्म हो पाएगा। शिक्षा में सामाजिक व भाषिक विषमता मिटाने तथा उसे समतामूलक बनाने के लक्ष्य की भी यही माँग है।
नयी शिक्षा नीति के बारे में ख़बर है कि पाँचवीं कक्षा तक अंग्रेज़ी की पढ़ाई नहीं होगी। पाँचवी तक बच्चे हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में पढ़ेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार का शिक्षा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी क़दम है।
राहुल देव
वरिष्ठ पत्रकार
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नई शिक्षा नीति-2020 की घोषणा हो गई है। इसके विभिन्न बिन्दुओं पर बहस तो होगी ही । पर इसने एक बड़े और महत्वपूर्ण दिशा में कदम बढ़ाने का इरादा व्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में नई शिक्षा नीति में पाँचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को ही पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है।इसे क्लास आठ या उससे आगे तक भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी स्तर से होगी। नई शिक्षा नीति में यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को विद्यार्थियों पर जबरदस्ती थोपा नहीं जाएगा।

मातृभाषा में बच्चा तत्काल ग्रहण करता है> यह बार-बार सिद्ध हो चुका है कि बच्चा सबसे आराम से सहज भाव से अपनी भाषा में पढाए जाने पर उसे तत्काल ग्रहण करता है । जैसे ही उसे मातृभाषा की जगह किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाने लगता है, तब ही गड़बड़ चालू हो जाती है। जो बच्चे अपनी मातृभाषा में शुरू से ही पढ़ना चालू करते हैं उनके लिए शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावनाएं अधिक प्रबल रहती हैं। यानि बच्चे जिस भाषा को घर में अपने अभिभावकों, भाई-बहनों, मित्रों के साथ बोलते हैं उसमें ही उन्हें पढ़ने में उन्हें अधिक सुविधा रहती है । पर हमारे यहाँ तो कुछ दशकों से अंग्रेजी के माध्यम से स्कूली शिक्षा लेने-देने की महामारी ने अखिल भारतीय स्वरुप ले रखा था ।

क्या आप मानेंगे कि जम्मू-कश्मीर तथा नागालैंड ने अपने सभी स्कूलों में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही किया हुआ है? महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडू, बंगाल समेत कुछ अन्य राज्यों में छात्रों को विकल्प दिए जाते रहे कि वे चाहे तो अपनी पढाई का माध्यम अंग्रेजी रख सकते हैं । यानि उन्हें अपनी मातृभाषा से दूर करने के सरकारी स्तर पर ही प्रयास हुए लेकिन, यह स्थिति अब ख़त्म होगी ।

कोई भी देश तब ही तेजी से आगे बढ़ सकता है, जब उसके नौनिहाल अपनी जुबान में ही पढ़ाई शुरू करने का सौभाग्य पाते हैं। और, बच्चों को नर्सरी से पांचवी कक्षा तक की प्रारंभिक शिक्षा यदिउसी भाषा में दी जाय जो वह अपने घर में अपनी माँ और दादा-दादी से बोलना पसंद करता है तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता ।

आपको जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपने लिए खास जगह बनाने वाली अनेक हस्तियां मिल जाएंगी जिन्होंने अपनी प्राइमरी शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही ग्रहण की। इनमें गुरुदेव रविन्द्र नाथ टेगौर से लेकर प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और बाबा साहेब अंबेडकर शामिल हैं। गुरुदेव रविन्द्र नाथ टेगोर की शुरूआती शिक्षा का श्रीगणेश अपने उत्तर कलकत्ता के घर में ही हुआ। उनके परिवार में बांग्ला भाषा ही बोली जाती थी। उन्होंने जिस स्कूल में दाखिला लिया, वहां पर भी पढ़ाई का माध्यम बांग्ला ही था। यानी बंगाल की धरती की भाषा। देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद की आरंभिक शिक्षा बिहार के सीवान जिले के अपने गांव जीरादेई में ही हुई। उधर तब तक अंग्रेजी का नामोनिशान भी नहीं था। उन्होंने स्कूल में हिन्दी, संस्कृत और फारसी पढ़ी। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कोलकात्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से ली। बाबा साहेब की प्राथमिक शिक्षा सतारा, महाराष्ट्र के एक सामान्य स्कूल से हुई। उधर पढ़ाई का माध्यम मराठी था। भारत की चोटी की इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सक्रिय लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमेन रहे ए.वी.नाईक का संबंध दक्षिण गुजरात से है। उन्हें अपने इंदहल गांव के प्राइमरी स्कूली में दाखिला दिलवाया गया। वहां पर उन्होंने पांचवीं तक गुजराती, हिन्दी, सामाजिक ज्ञान जैसे विषय पढ़े। अंग्रेजी से उनका संबंध स्थापित हुआ आठवीं कक्षा में आने के बाद। नटराजन चंद्रशेखरन टाटा समूह के नए चेयरमेन नटराजन चंद्रशेखरन के नाम की घोषणा हुई। तब कुछ समाचार पत्रों ने उनका जीवन परिचय देते हुए लिखा कि चंद्रशेखरन जी ने अपनी स्कूली शिक्षा अपनी मातृभाषा तमिल में ग्रहण की थी।उन्होंने स्कूल के बाद इंजीनियरिंग की डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल की। यह जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण थी। खास इस दृष्टि से थी कि तमिल भाषा से स्कूली शिक्षा लेने वाले विद्यार्थी ने आगे चलकर अंग्रेजी में भी महारत हासिल किया और कैरियर के शिखर को छुआ। प्रसून जोशी बेशक, एड गुरु और गीतकार प्रसून जोशी के पिता उत्तर प्रदेश में एक सरकारी स्कूल के अध्यापक थे। इसलिए उन्होंने जगह-जगह तबादले होते रहते थे। इसके चलते प्रसून ने मेरठ, गोपेश्वर, हापुड़ वगैरह के सरकारी स्कूलों में विशुद्ध हिन्दी माध्यम से अपनी स्कूली शिक्षा लेनी शुरू की थी। वे कहते है कि अगर उन्होंने स्कूली दिनों में हिन्दी का बढ़िया तरीके से अध्ययन न किया होता तो वे एड की दुनिया में अपने पैर नहीं जमा पाते।

भारत में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने की अंधी दौड़ के चलते अधिकतर बच्चे असली शिक्षा को पाने के आनंद से वंचित रह जाते हैं। दिक्कत ये है कि अधिकतर अंग्रेजी के मास्टरजी तो अंग्रेजी की व्याकरण से स्वयं ही वाकिफ नहीं होते। शिक्षा का असली आनंद बहरहाल, आप असली शिक्षा का आनंद तो तब ही पा सकते हैं,जब आपने कम से कम पांचवीं तक की शिक्षा अपनी मातृभाषा में हासिल की हो। ऐसे सौभाग्यशाली लोगों में मैं भी शामिल हूँ और मुझे इस बात पर गर्व है ।

स्पष्ट कर दूं कि अंग्रेजी का कोई विरोध नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा या अध्ययन को लेकर कोई आपत्ति भी नहीं है। मसला यह है कि हम अपनी मातृभाषा, चाहे हिन्दी, तमिल, बांग्ला असमिया, उड़िया, तेलगू, मलयालम, मराठी, गुजरती में प्राइमरी स्कूली शिक्षा देने के संबंध में कब गंभीर होंगे? अब नई शिक्षा नीति के लागू होने से स्थिति बदलेगी। अभी तक तो हम बच्चों को सही माने में शिक्षा तो नहीं दे रहे थे। हां, शिक्षा के नाम पर प्रमाणपत्र जरूर दिलवा देते थे। शिक्षा का अर्थ है ज्ञान। बच्चे को ज्ञान कहां मिला? हम तो उन्हें नौकरी पाने के लिए तैयार करते रहते हैं।

हमारे य़हां पर दुर्भाग्यवश स्कूली या कॉलेज शिक्षा का अर्थ नौकरी पाने से अधिक कुछ नहीं रहा है। स्कूली शिक्षा में बच्चों को मातृभाषा से इतर किसी अन्य भाषा में पढ़ाना उनके साथ अन्याय करने से कम नहीं है। यह मानसिक प्रताड़ना के अतिरिक्त और क्या है ? शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है, दूसरा, उसे उत्तम नागरिक़ तथा तीसरा, परिवार को पालन पोषण करने योग्य और अंतिम सुख की प्राप्ति कराना है। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं।

क्या जो शिक्षा हमारे देश के करोड़ों बच्चों को मिलती रही है उससे उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हो हुई? नहीं। इधर तो व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रहा । जब इस तरह की सोच के साथ हम शिक्षा का प्रसार-प्रचार करेंगे तो मातृभाषा की अनदेखी स्वाभाविक ही है। बहरहाल, अब लगता है कि हालात बदलेंगे।

आर.के. सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)
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( इसी विषय पर संगोष्ठी अगले भागों में भी जारी रहेगी। )

झिमि

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

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हैदराबाद

मो.: 09703982136

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन ? वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 2, डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य', प्रेम चन्द अग्रवाल, डॉ. राजेश्वर उनियाल, प्रवीण जैन, निर्मल कुमार पाटौदी,उदय कुमार सिंह, हरिसिंह पाल, सुरेंद्रसिंह शेखावत,

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नई शिक्षा नीति से शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन... ?  
वैश्विक ई-संगोष्ठी भाग - 2

यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के स्वाभाविक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। विश्व के सभी विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा में ही पढ़ते हैं और वहाँ सभी कार्य भी उनकी भाषा में ही होते हैं। इसलिए विकास की गति में भी वे बहुत आगे हैं। हमने तो बी.ए. तक और शायद बहुत लोगों ने एम.ए. तक भी मातृभाषा माध्यम से ही पढ़ाई की। 

स्वतंत्रता के समय भी देश के 99. 99% लोग मातृभाषा में ही पढ़ते थे। राजीव गांधी के शासनकाल में जो शिक्षा नीति आई उसके बाद देश में धीरे-धीरे पूरी तरह शिक्षा का अंग्रेजीकरण होता चला गया। जब पैदा होते ही बच्चे को अंग्रेजीमय बना दिया जाए तो फिर मातृभाषा, राज्य भाषा और राष्ट्रभाषा की बात कौन करता?  इसलिए धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था अंग्रेजी के रंग में रंगती चली गई। भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों, चैनलों, सिनेमा, विज्ञापन आदि में भी अंग्रेजी ने अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी। विदेशी भाषा माध्यम के कारण नई पीढ़ियों की मौलिक सोच के बजाय रटने की प्रवृत्ति ने देश के विकास पर भी अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

नई शिक्षा नीति का मसौदा बनाए जाते समय 'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' के इसी समूह के माध्यम से देश के अनेक विद्वानों द्वारा मातृभाषा माध्यम से शिक्षण के लिए लगातार एक अभियान चलाया गया था। और तमाम विद्वानों के विचार नई शिक्षा नीति समिति के अध्यक्ष माननीय कस्तूरीरंगन जी को तथा माननीय मंत्री जी को भेजे गए थे। यह प्रसन्नता का विषय है कि उन तमाम सुझावों आदि पर भी समिति व सरकार द्वारा विचार किया गया है।

नई शिक्षा नीति में कम से कम प्राथमिक शिक्षा स्तर तक मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान निश्चय ही स्वागत योग्य है।  लेकिन अगर यह प्रावधान ऐच्छिक बनकर रह गया तो निश्चय ही इससे किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं होगा बल्कि नुकसान होने की आशंका है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश में कम से कम प्राथमिक शिक्षा स्तर तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, इसका कार्यान्वयन सरकार की इच्छा शक्ति व राजनैतिक कौशल पर निर्भर करेगा ‌। पिछले करीब 35 वर्षों से अंग्रेजी को ही शिक्षा मानने वाले अंग्रेजी में रंगे भारतीय समुदाय को सच्चाई समझाने के लिए भी हमें विशेष प्रयास करने होंगे। अभी नहीं तो कभी नहीं। सभी मातृभाषा प्रेमियों को अपने-अपने राज्य में मातृभाषा माध्यम की नीति लागू करने के लिए पूरी शक्ति से प्रयास करने चाहिए।

डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य
निदेशक, वैश्विक हिंदी सम्मेलन

आज आदरणीय प्रधानमंत्री ने नई शिक्षा नीति पर बोलते हुए अन्य बातों के अतिरिक्त पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा में शिक्षा के माध्यम पर विशेष रूप से अपना मत व्यक्त किया। प्रधानमंत्री के मुख से मातृभाषा के पक्ष में बोलना बहुत महत्त्वपूर्ण है और हमें आशा बंधाता है। हमारा प्रधानमंत्री जी से निवेदन है कि वे:

1. मातृ‌भाषा में शिक्षा की नीति सभी, सरकारी और निजी विद्यालयों पर समान रूप से लागू हो। प्रधानमंत्री यह तो सुनिश्चित कर ही सकते हैं कि जिन प्रदेशों में भाजपा सरकार हैं, उन प्रदेशों में तो इस शिक्षा नीति का कठोरता से पालन हो।

2. मातृभाषा में शिक्षा तभी सफल होगी जब मातृभाषाओं में शिक्षा पाये बच्चों को रोजगार मिलने में कोई भेदभाव नहीं होगा। इसके लिए सरकार को नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करनी होगी, अन्यथा यह मातृभाषा में शिक्षा का नीति अर्थहीन है और असफल ही सिद्ध होगी। जो भाषा आपको रोजगार उपलब्ध नहीं करवा सकती, कोई क्यों उसमें शिक्षा लेकर अपने भविष्य को अंधकारमय बनायेगा।
हमें आशा है कि प्रधानमंत्री देश को अंग्रेजी की दासता से भी मुक्ति दिलायेंगे।
प्रेम चन्द अग्रवाल, अम्बाला शहर


शिक्षा लेना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और वह किस विषय या माध्यम से शिक्षा लेना चाहता है, यह उसके विवेक पर निर्भर करता है । किसी भी छात्र पर भाषाई बंधन नहीं डाला जा सकता है । लेकिन जब एक शिशु अपनी मां की गोद से निकलकर विद्यालय जाए तो वहां उसे अपनी मातृभाषा अवश्य दिखनी चाहिए । नई शिक्षा नीति  में इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा पर बल दिया गया है ।  
डॉ. राजेश्वर उनियाल, पूर्व उपनिदेशक  राजभाषा 

राशिनी में हिन्दी और संस्कृत अनिवार्य करने का उल्लेख कहीं भी नहीं है। लेकिन यह स्वभाविक है कि सीखने में आनंद आने पर विद्यार्थी अतिरिक्त भाषा सीखने में रुचि दिखाते हैं। राज्य में हजारों सीबीएसई पाठ्यक्रम आधारित स्कूल हैं जो कई भाषाओं को पहले से ही सिखाते आ रहे हैं। लेकिन सरकारी स्कूल के विद्यार्थी अतिरिक्त भाषा सीखने के अवसर से वंचित हो रहे हैं। हम स्वयं ही विद्यार्थियों को हिन्दी या कोई अन्य भारतीय भाषा सीखने के अवसर से दूर कर रहे हैं। वर्ष 1962 और 2020 के समय में बहुत बदलाव आ गया है और विचार भी बदल गए हैं।  जब तमिलनाडु के विद्यार्थी अतिरिक्त भाषा के रूप में हिन्दी, कन्नड, तेलुगु और मलयालम का चयन करेंगे तो अन्य राज्य के विद्यार्थी भी तमिल का चयन करना शुरू कर देंगे। लेकिन इसका विरोध कर हम ऐसे अवसरों को नजरअंदाज कर रहे हैं। नई शिक्षा नीति 2020 में प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च अध्ययन तक विश्व स्तरीय शिक्षा की परिकल्पना की गई है और इसका उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों में सुधार करना भी है। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण को दिए गए महत्व का सभी ने स्वागत किया है।
प्रवीण जैन, हिंदी सेवी

सब के अंतर्मन में यह व्यावहारिक समझ आना आवश्यक है कि तीन भाषा की नीति को दफ़ना दिया जाए। दो भाषा नीति से ही देश का भला होगा। आठवीं अनुसूची की भाषाओं के माध्यम से राज्यों का कामकाज हर क्षेत्र में चलें। बिना अंग्रेज़ी की बैशाखी के हमारी भाषाओं के अपने दम पर खड़े होना ही पड़ेगा। तब ही उनको अपना वास्तविक अधिकार प्राप्त हो सकेगा।
पूरे भारत राष्ट्र को जोड़ने का काम हिंदी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा नहीं कर सकेगी। हिंदी और हिंदीतर भाषी प्रदेशों में सर्वाधिक प्रचलित हिंदी ही है। अंग्रेज़ी तो मात्र कुछ मुट्ठी भर लोगों का स्वार्थ पूर्ति कर रही है। इस सत्य को जितनी जल्दी पहचान लिया जायेगा, उतना ही १४५ करोड़ लोगों का भला होगा। देश तेज़ी से अपनी महान भाषाओं के सहारे विकास कर लेगा। उन्नत राष्ट्रों की पंक्ति में पहुच सकेगा। अपनी भाषाओं को अपनाने से ‘इण्डिया’ से मुक्ति मिल जायेगी ‘भारत’ अपने ज्ञान, अध्यात्म और प्राचीन विरासत के आधार पर पुन: अपने स्वर्ण युग जैसा गौरव प्राप्त कर लेगा।
निर्मल कुमार पाटौदी, हिंदी सेवी, इन्दौर

भारत की  नई शिक्षा नीति, वर्ष 2020  में इस बार जो परिवर्तन किए गए हैं उससे बहुत सारी समस्याओं  का निदान होना प्रारंभ हो जाएगा । प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को माध्यम रखने का निर्णय लिया गया है और इसके लिए आवश्यक दिशा निर्देश भी वर्ष , 2020 की शिक्षा नीति में उल्लिखित हैं। राज्य सरकारों को इसे शीघ्र लागू करने के लिए अवश्य तत्काल पहल करना है  तो यह उनके ऊपर निर्भर करता है कि वह इसे किस तरह से लागू व क्रियान्वित करती हैं ? केंद्र सरकार द्वारा एनसीईआरटी को यह जिम्मेवारी दी गई है कि वह भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची में वर्णित भाषाओं में पाठ्य पुस्तकें तैयार करें और  उसे शीघ्र संबंधित कक्षाओं के लिए उपलब्ध कराएं और राज्य के  स्तर पर संबंधित राज्य सरकार इस प्रसंग में एससीआरटी को आवश्यक दिशा निर्देश देकर पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराने की कार्यवाई सुनिश्चित करें । एससीआरटी को इस क्षेत्र में पहल करना है ताकि प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा में पठन-पाठन शीघ्र  सुदृढ़ हो  सके ।  जब प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होगी तो उस भाषा में बच्चों के पठन-पाठन की जड़ें तो मजबूत होगी हीं और बच्चे धीरे-धीरे उसे अपने साथ स्वयं विकसित करने लगेंगे तथा आने वाले समय में, माध्यमिक शिक्षा, और उच्च शिक्षा  - दोनों में भी इसके परिणाम पहले से बेहतर जरूर होंगे । मेरा तो यही मानना है कि आने वाले समय में अंग्रेजी का पठन-पाठन धीरे-धीरे स्वयं क्षीण होता जाएगा और लोक चेतना के साथ विकसित  हो रही आधुनिक भारतीय भाषाएं अपने- अपने क्षेत्रों में नव विकास के साथ-साथ केंद्रीय स्तर पर प्रयोग में आ रही हिंदी को भी, और परिवर्तित एवं परिष्कृत  करेंगी । अब हमारी कोशिश होनी चाहिए  कि इस नई शिक्षा नीति के साथ कोई राजनीति न की जाए और आधुनिक भारतीय भाषाओं को अपनाए जाने के बारे में जिस प्रकार के प्रावधान इसमें  किए गए हैं, उनको, तत्काल कार्यान्वित करने के लिए, देश के सभी राज्यों में, उनके स्वयं के स्तर से,  अथक प्रयास किए जाएं । यदि प्रबुद्ध जन  अपने निजी सम्मान और व्यक्तिगत उत्कर्ष को  तिलांजलि देकर सामाजिक उत्थान और राष्ट्र-हित के लिए काम करना चाहते हैं तो उन्हें नई शिक्षा नीति के भाषा संबंधी महत्वपूर्ण प्रावधानों को बिना कोई लाग लपेट या हिचक के, कार्यान्वित करने के लिए तत्काल पहल करना चाहिए और बच्चों को,  हर स्तर पर शीघ्र अतिशीघ्र मातृभाषा में एवं  क्षेत्रीय भाषाओं में,  हर विधा की पाठ्य पुस्तकें, जो उनके कोर्स के लिए विहित की गई हों,  उपलब्ध कराई जाएं।
उदय कुमार सिंह, पूर्व  राजभाषा अधिकारी 

यह बहुत ही उत्साहवर्धक प्रस्ताव है कि अब भविष्य में कक्षा 5वीं तक घरेलू/मातृभाषा में पढ़ाई होगी। किंतु मेरे जैसे छिद्रान्वेशी विद्यार्थी के मन में इस घरेलू /मातृभाषा के बारे में अस्वभाविक शंका है कि नई शिक्षा नीति में न तो हिंदी भाषा का जिक्र है और न नागरी लिपि का।क्या भारत में राजस्थानी, हिमाचली, कुमाऊनी, गढ़वाली, भोजपुरी घरेलू भाषा नहीं है। हिंदी किस क्षेत्र की घरेलू भाषा है, मुझे ज्ञात नहीं है।हम तो अपने अपने घरों में ब्रज, अवधी,कौरवी,रुहेली, भदावरी, कन्नौजी, बुंदेली आदि बोलते हैं। ज्यादा से ज्यादा शहरों में ही हिंदी बोली जाती है।वह भी मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस जैसे शहरों में तो ब्रजभाषा ही बोली जाती है।अगर कोई हिंदी बोलता भी है तो उसे डांटकर चुप करा जाता कि -"जादै अंग्रेजी मति झारै।"यही स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी है। यदि यह स्पष्ट कर दिया जाता कि अष्टम अनुसूची में उल्लिखित क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षण कराया जाएगा तो कुछ गनीमत थी। पूर्वोत्तर के राज्यों में और भी स्थिति विषम है । मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कौन-कौन सी मान्य घरेलू और क्षेत्रीय भाषाएं हैं, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। 

मेरे विचार से प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं को भारतीय भाषाओं में लिया जाना सुनिश्चित किया जाय और इनमें अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाय तो स्वमेव विद्यार्थी भारतीय भाषाओं की ओर उन्मुख होंगे। भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता से शहरी-ग्रामीण,अमीर -गरीब और साधन-संपन्न एवं साधनहीन के बीच की दीवार भी ढह जाएगी।
हरिसिंह पाल, सचिव, नागरी लिपि परिषद

ठीक नहीं भाषा के प्रश्न पर विवाद । निश्चित ही भारत में प्रारम्भिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा होने से देश की बौद्धिक संपदा समृद्ध ही होगी । इस पर आपत्ति जताने वालों को एक बार भाषा विज्ञानियों की बातों पर गौर करना चाहिए ।    
सुरेंद्रसिंह शेखावत, सामाजिक चिंतक व टिप्पणीकार 

और इधर बिज़नेस स्टैंडर्ड (हिंदी) में शेखर गुप्ता वही राग अलाप रहे हैं कि जनता अंग्रेजी माध्यम चाहती है। पर जनता दुनिया भर के मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के मत के विरुद्ध क्यों जा रही है, इसकी पड़ताल कौन करेगा?
हीरालाल कर्णावट

मैं कहना चाहता हूँ :---- 1) राष्ट्र की एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए -- नि:संदेह भारत के लगभग 10 राज्यों की राजभाषा होने -- बोलने के आधार पर विश्व में नंबर एक स्थान रखने -- वैज्ञानिक और सरल देवनागरी लिपि -- निर्माण में अरबी - फ़ारसी के साथ सभी भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत के समायोजन से परिपूर्ण हिन्दी के अलावा अन्य कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा की अधिकारिणी नहीं है | 2) स्कूलों में उत्तर भारत के सभी स्कूल तथा केन्द्रीय और नवोदय विद्यालय आदि में हिन्दी पहले स्थान पर --- दूसरे स्थान पर अंग्रेजी के साथ ही साथ अन्य सभी भारतीय भाषाओं को विकल्प में रखा जाए जिसमें स्टूडेंट्स कोई एक चुनेंगे ( जिस भाषा में स्टूडेंट्स अधिक होंगे उनके शिक्षक स्कूलों में रखे जायेंगे -- अन्य भाषाओं का पठन - पाठन आनलाइन होगा )।दूसरी तरफ गैर हिन्दी भाषी राज्यों में राज्य के स्कूलों में पहले नंबर की भाषा उस राज्य की जनभावना के अनुसार राज्य निर्धारित करेंगे --- दूसरे स्थान पर हिन्दी - अंग्रेजी के साथ अन्य सभी भारतीय भाषाएँ होंगी ( जिस भाषा में स्टूडेंट्स अधिक होंगे उनके टीचर स्कूलों में रखे जायेंगे । अन्य भाषाओं का पठन - पाठन आनलाइन होगा ) | 3) अन्य विषयों के माध्यम के मामले में भी केंद्र - राज्य सरकारें अपने यहाँ पाठ्य पुस्तकों की उपलब्धता तथा जनभावना के अनुसार निर्णय ले सकेंगे | 4) इसी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं तथा नौकरियों में अन्य कम्पलसरी सब्जेक्ट्स के साथ केवल एक भाषा लेनी होगी विकल्प में हिन्दी - अंग्रेजी के साथ सभी भारतीय भाषाएँ भी होंगी ( प्रतियोगी उनमें से कोई एक चुन सकेंगे , परीक्षा विकल्प भी सभी भाषाओँ में उपलब्ध कराये जाएंगे -- अपनी सुविधानुसार प्रतियोगी परीक्षा विकल्प चुन सकेंगे ( चीन - जापान - जर्मनी आदि कुछ ऐसी ही मिलती - जुलती व्यवस्थाएँ अपनाकर आज उन्नति कर रहे हैं ।) इस व्यवस्था से निकले कर्मचारी - अधिकारी आज की तुलना में अधिक ईमानदार और गरीब जनता के प्रति उत्तरदायी होंगे -- सभी भाषाओं को न्याय मिलेगा | ये बातें अन्य भाषा - भाषियों को समझाकर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत संस्थाएं पहल करके एक राय बना सकती हैं । आपके सुझावों के इन्तजार में --- 
डॉ. अशोक कुमार तिवारी हिन्दी शिक्षक || वाट्स अप नंबर -- +९१९४२८०७५६७४

इस संबंध में संक्षिप्त, सार्थक, सुझावों व  विचारों का स्वागत है।

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पत्रिका 'जय विजय' के अगस्त 2020 अंक का लिंक प्रेषित है. आप इस लिंक
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महात्मा गाँधी को अपना आदर्श माननेवाले राजनेताओं  व राजनैतिक दलों के ध्यानार्थ।

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच

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