सोमवार, 29 मार्च 2021

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] मनुमुक्त 'मानव' मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा गत शाम आयोजित अंतरराष्ट्रीय 'ई-नागरी लिपि सम्मेलन' चौदह देशों के विद्वानों ने की सहभागिता। झिलमिल में हीद भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के शहादत दिवस के उपलक्ष्य में काव्यांजलि

 


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नागरी लिपि सम्मेलन में चौदह देशों के विद्वानों ने की सहभागिता विभिन्न भाषाओं को जोड़ती है नागरी लिपि : गंगाप्रसाद उप्रेती

नारनौल। नागरी लिपि विश्व की सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक लिपि तो है ही, यह विभिन्न भाषाओं को भी आपस में जोड़ती है। यह कहना है नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू के कुलपति गंगाप्रसाद उप्रेती का। मनुमुक्त 'मानव' मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा गत शाम आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय ई- नागरी लिपि सम्मेलन' में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि संस्कृत, हिंदी, नेपाली, मैथिली, मराठी, भोजपुरी आदि अनेक भाषाओं को देवनागरी लिपि एकता के सूत्र में पिरो देती है, जिससे इन्हें समझना सरल हो जाता है। हिंदी साहित्य अकादमी, मोका (मॉरीशस) के अध्यक्ष डॉ हेमराज सुंदर और हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन, एम्स्टर्डम (नीदरलैंड) की अध्यक्ष डॉ पुष्पिता अवस्थी ने नागरी को विश्वलिपि बताते हुए कहा कि देवनागरी भारत की अनेक भाषाओं और बोलियों की ही लिपि नहीं है, बल्कि नेपाली (नेपाल), (फीजीबातफीजी और सरनामी (सूरीनाम) आदि भाषाओं की भी लिपि है तथा अनेक देशों में बसे करोड़ों प्रवासी भारतीय और भारतवंशी विभिन्न भाषाओं को इसके माध्यम से लिख और पढ़ रहे हैं। नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष और पूर्व कुलपति डॉ प्रेमचंद पतंजलि ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि नागरी लिपि विभिन्न बोलियों के लिए ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं के लिए भी नागरी उपयोगी लिपि सिद्ध हो सकती है। उन्होंने आश्वस्त किया कि इंटरनेट आदि साधनों के माध्यम से भी नागरी लिपि को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जाएगा।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, नारनौल के अध्यक्ष डॉ जितेंद्र भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास 'मानव' के प्रेरक सान्निध्य तथा डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में संपन्न हुए इस सम्मेलन में कोलम्बो (श्रीलंका) के डॉ लक्ष्मण सेनेविराठने, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार 'हैप्पी', कोलोन (जर्मनी) की डॉ शिप्रा शिल्पी, पालम (दिल्ली) के डॉ हरिसिंह पाल और अहमदनगर (महाराष्ट्र) के डॉ शहाबुद्दीन शेख ने विशिष्ट अतिथि वक्ता के रूप में सहभागिता की तथा नागरी लिपि के स्वरूप, विकास, महत्त्व और प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें हिंदी को जनभाषा बनाने से पूर्व मनभाषा बनाना पड़ेगा, क्योंकि हिंदी जब  मनभाषा बनेगी, तो उसकी लिपि  देवनागरी स्वत: ही प्रतिष्ठित हो जाएगी। समारोह के प्रारंभ में चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास 'मानव' ने, विषय-प्रवर्तन करते हुए, नागरी लिपि को कंप्यूटर के उपयुक्त बनाने तथा वर्तनी संबंधी त्रुटियों को दूर करने का आह्वान किया। उन्होंने नागरी लिपि केंद्रित अपने कुछ दोहे भी प्रस्तुत किए।

केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली के सहायक निदेशक डॉ दीपक पांडेय की अध्यक्षता और सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति डॉ  उमाशंकर यादव के मुख्य आतिथ्य में 'कविता-कुंभ' के रूप में संपन्न हुए द्वितीय सत्र में सोफिया विश्वविद्यालय, सोफिया (बल्गारिया) की प्रोफेसर डॉ मोना कौशिक और हिंदी राइटर्स गिल्ड, टोरंटो (कनाडा) की निदेशक डॉ शैलजा सक्सेना विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। इस अवसर पर लैडिंग (सूरीनाम) के तेजप्रताप खेदू, मनीला (फिलीपींस) की प्रिया शुक्ला, मनामा (बहरीन) की अनुपम रमेश, कंपाला (युगांडा) के बसंत भंभेरू, सेंटियागो (अमरीका) की  डॉ कमला सिंह, कोलंबो (श्रीलंका) की डॉ अमिला दमयंती, गुवाहाटी (असम) की दीपिका सुतोदिया, गंगटोक (सिक्किम) के डॉ प्रदीप त्रिपाठी आदि विश्व-भर के अनेक प्रतिष्ठित कवियों-कवयित्रियों ने काव्य-पाठ किया।

ये रहे उपस्थित : पांच घंटों तक चले इस अद्भुत एवं ऐतिहासिक सम्मेलन में ट्रस्टी डॉ कांता भारती, विश्वबैंक वाशिंगटन डीसी (अमरीका) की अर्थशास्त्री डॉ एस अनुकृति और कंसलटेंट प्रो सिद्धार्थ रामलिंगम, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, झोटा बजांग (नेपाल) में अंग्रेजी-विभाग के अध्यक्ष प्रो खगेंद्रनाथ बियोगी, महात्मा गांधी हिंदी संस्थान, मौका (मॉरीशस) में सृजनात्मक लेखन एवं प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष डॉ कृष्णकुमार झा, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ में विधि-विभाग के अध्यक्ष डॉ प्रदीप सिंह, चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी में हिंदी-विभाग की प्रोफेसर डॉ सुशीला आर्य, हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला के पूर्व निदेशक डॉ पूर्णमल गौड़, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू की पत्रिका 'वर्तमान साहित्य' के संपादक डॉ पुष्करराज भट्ट, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के प्रतिष्ठित साप्ताहिक 'विश्व-विधायक' के संपादक मृत्युंजयप्रसाद गुप्ता आदि के अतिरिक्त अमलनेर (महाराष्ट्र) के डॉ सुरेश माहेश्वरी, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) की डॉ ऋतु माथुर इंदौर (मध्य प्रदेश) की अलका जैन, हिसार के डॉ राजेश शर्मा, भिवानी के विकास कायत, नारनौल के कृष्णकुमार शर्मा, एडवोकेट तथा डॉ प्रेम सिंह, डॉ  ज्योति कुमारी, डॉ दिनेशकुमार यादव, दामोदर पटेल, श्रवण उपाध्याय, वंदना कुशवाहा, टीकाराम अहिरवार, डॉ संध्या शर्मा, कमल चौरसिया, आरती झा, रामचंद्र केदार, गोकुलेश्वर द्विवेदी, शशिकला त्रिपाठी, शशिकांत सोनवणे, राममोहन तिवारी, काजल विश्वकर्मा, पल्लवी पाटिल, नमिता सिंह आदि महानुभावों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही।
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त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा  “हिन्दी शब्दावली और भाषा की सरलता” विषय पर एक ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन  
दिनांक 25.03.2021 (गुरुवार) को अपराह्न 03.30 बजे किया जा रहा है। इस कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप  में
 पूर्वोत्तर के प्रख्यात हिन्दी विद्वान डॉ. बरुण कुमार, निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, गृहमंत्रालय भारत सरकार रहेंगे।
 प्रो. गंगाप्रासद प्रसाईं, कुलपति कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।
    सभी इच्छुक सदस्यों से निवेदन है कि  इस कार्यशाला में शामिल हो राजभाषा हिंदी के संबंध में नवीन जानकारी प्राप्त करें।
        
 https://meet.google.com/hbt-qcdm-oem

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शहीद भगत सिंहसुखदेव व राजगुरु के शहादत दिवस के उपलक्ष्य में
साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश के उपक्रम पाठक मंचइंदौर इकाई एवं मातृभाषा उन्नयन संस्थान के साझा प्रयासों से गौतमपुरा में 
 काव्यांजलि कवि सम्मेलन का आयोजन

 

इंदौर। शहीद भगत सिंहसुखदेव व राजगुरु के शहादत दिवस के उपलक्ष्य में साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश के उपक्रम पाठक मंचइंदौर इकाई एवं मातृभाषा उन्नयन संस्थान के साझा प्रयासों से गौतमपुरा में आज़ादी के अमृत महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत काव्यांजलि कवि सम्मेलन का आयोजन हुआजिसमें मुख्य अतिथि नगर परिषद गौतमपुरा के अध्यक्ष चैतन्य भावसार व मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन 'अविचलरहे।

 

सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया तत्पश्चात अतिथि स्वागत में गर्मियों के मद्देनज़र अतिथियों एवं कवियों को मिट्टी के सकोरे दिए गए ताकि पक्षियों के लिए इसमें पानी रखा जा सके।


कवि सम्मेलन में प्रथम कवि गौतमपुरा के गोपाल माली रहेजिन्होंने माँ पर कविता पाठ करते गए नेताजी सुभाष चंद बोस के बारे में कविता पढ़ी और कहा कि 'हमारे दिल की धड़कन में आज भी नेताजी सुभाष ज़िन्दा हैं।इनके बाद गौतमपुरा के ही धीरज पाटीदार ने काव्य पाठ कियाउनकी कविता 'एक ओर माँ का आँचलएक ओर क्रांतिकारियों के सर हो गएने ख़ूब तालीयाँ बटोरी। इसके बाद कवि धीरज ने बच्चों से आह्वान किया कि '24 घंटे में से केवल 52 सेकण्ड राष्ट्रगान के नाम कीजिए।

कवि सम्मेलन को ऊर्जा प्रदान करते हुए इंदौर के गीतकार गौरव साक्षी ने कुछ मुक्तक सुनाएइसके बाद हिन्द की सेना जैसे सवैया छन्द सुनाएइसके बाद विशेष माँग पर उनका हस्ताक्षरीय शिव गीत सुनाया गया जिसमें गौरव लिखते हैंकि 'सिर्फ़ शंभु ही स्वयम्भू है जहाँ मेंहर किसी का कोई न कोई जनक है। आदि के आदि से है अस्तित्व में शिवऔर शिव ही अंत के भी अंत तक हैं।इनके बाद उक्त कवि सम्मेलन में झाबुआ से आए कवि हिमांशु भावसार हिन्द ने काव्य पाठ किया और शहीदों पर लिखे मुक्तक और गीतों से समा बांध दिया। उन्होंने शब्द की अधिष्ठात्री का आह्वान करते हुए पढ़ा कि 'हर बालक हो महाकाल-साबेटी स्वयं भवानी हो।

कवि सम्मेलन का शिखर कलश संचालक और गौतमपुरा के वरिष्ठ कवि पंकज प्रजापत ने रखते हुए सैनिक की शहादत के बाद उसके बेटे के प्रथम जन्मदिन की व्यथा सुनाते हुए पढ़ा कि 'सोचा था केक चॉकलेट और गुब्बारे लाओगे। बाजार से मेरी पसंद के खिलोने सारे लाओगेपर आप अपनी पसंद का उपहार चंगा ले आयेऔर मेरे पहले ही जन्मदिन पर तिरंगा ले आये।'


इस वर्ष साहित्य अकादमीमध्यप्रदेश द्वारा स्वतंत्रता दिवस की हीरक जयंती वर्ष पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा हैजिसमें अकादमी के सभी पाठक मंच आयोजन कर शहीदों को याद कर रहे हैं। इसी तारतम्य में पाठक मंचजिला इंदौर इकाई ने भी मातृभाषा उन्नयन संस्थान के साथ मिलकर काव्य अनुष्ठान किया।

ज्ञात हो कि मातृभाषा उन्नयन संस्थान का ध्येय हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर राष्ट्र जागरण करना है और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भी इसी लक्ष्य के साथ आगे बढ़ी है। इस तरह के आयोजनों से नई पीढ़ी का अपने शहीदों के प्रति आदर भाव भी अभिव्यक्त हुआ। विद्यालय के बच्चों के बीच हुए इस काव्य अनुष्ठान का ध्येय बच्चों में संस्कृति के प्रति आदरभाव का बीजारोपण रहा।


वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

murarkasampatdevii@gmail.com  

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मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

मो.: 09703982136

बुधवार, 24 मार्च 2021

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] भारत का नाम केवल भारत हो, गुलामी का प्रतीक इंडिया शब्द हटाएँ। झिलमिल में - डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य' का महाराष्ट्र व गोआ के राज्यपाल मा. भगतसिंह कोश्यारी जी द्वारा सम्मान।

 https://youtu.be/tSdk9OmYPf4

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[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] .'देवनागरी लिपि और वर्तनी: मानकीकरण की ओर' विषय पर राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी दिनांक - 20-03-2021 दोपहर 2.30 बजे। समाज में हिंदी - विवेक गुप्ता । झिलमिल में 'जय विजय' पत्रिका का मार्च 2021 अंक

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पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय द्वारा विश्वनागरी विज्ञान संस्थान के सहयोग से 

.'देवनागरी लिपि और वर्तनी: मानकीकरण की ओर' 
विषय पर राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी दिनांक - 20-03-2021 दोपहर 2.30 बजे से आयोजित की जा रही है।

गूगल मीट लिंक :  Meet.google.com/art-tauu-pmo

 उद्घाटन एवं उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गुरुमीत सिंह जी करेंगे।

 मुख्य अतिथि :  बलदेवराज कामराह जी, अध्यक्ष, विश्व नागरी विज्ञान संस्थान ।
 आशीर्वचन    : आचार्य पी.के. सुब्रमणियम, अधिष्ठाता, मानविकी संकाय।
 बीज वक्तव्य  : विश्व नागरी विज्ञान संस्थान के महासचिव प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी जी ।

 वक्तागण
 1. प्रो. वी.रा. जगन्नाथन, पूर्व निदेशक एवं  प्रोफ़ेसर, इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय,
 2. डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य', उपनिदेशक, हिंदी शिक्षण योजना एवं निदेशक वैश्विक हिंदी सम्मेलन।  
 3. डॉ. ओम प्रकाश प्रजापति, हिंदी विभाग, हिमाचल, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश।
 4. डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल,  उपाध्यक्ष, विश्व नागरी विज्ञान संस्थान तथा निदेशक, केआईआईआईटी वर्ल़्ड ऑफ कॉलेजेज़ होंगे। 

सभी विद्वान व भाषा-प्रेमी सादर आमंत्रित हैं।
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समाज में हिंदी
  - विवेक गुप्ता   

पीढ़ियों का अंतर तो हर दौर में रहा है, बुज़ुर्ग और युवा पीढ़ी के बीच संवाद की कमी हमेशा ही रही है, फिर आज के वृद्ध ख़ुद को अधिक उपेक्षित क्यों महसूस करते हैं?

कारण है, उनका भावी पीढ़ी से संवाद भी कम या लगभग ख़त्म हो गया है। महज़ तीन-चार दशक पहले तक बच्चों और बुज़ुर्गों के बीच जीवंत रिश्ता हुआ करता था। उनके बीच हँसी-ठिठोली होती, ज्ञान का आदान-प्रदान भी होता, वृद्ध अपने नाती-पोतों को दुलार और संस्कार देते, और इस तरह उन्हें सार्थकता का एहसास होता। लेकिन अब इस सबमें एक बड़ा अवरोध है, भाषा!
 
क्षमा, दया, स्वाभिमान, कृपा, संयम, त्याग, निष्ठा जैसे शब्द शहरी बच्चों के लिए नितांत अजनबी बन चुके हैं। उन्हें इनके अँग्रेज़ी शब्द चाहिए, इन नैतिक मूल्यों को समझना और आत्मसात करना तो दूर की बात है! बच्चों को काऊ और स्पैरो समझ आते हैं।

दादा-दादी और पौत्र-पौत्री की भाषा में बहुत अंतर आ चुका है। बहुत से बुज़ुर्गों के लिए इस अंतर को पाट पाना मुश्किल है। भाषा के कृत्रिम हो जाने का ख़तरा भी है, ऐसी भाषा जिसे वे बोल तो लें, परंतु शायद उनका दिल न बोलना चाहे।
 
घरेलू स्तर पर इस स्थिति को बदलने के प्रयास होने चाहिए। समाज के स्तर पर भी कोशिश की जा सकती है। समाज के आयोजनों में हिंदी संभाषण, लेखन इत्यादि से संबंधित प्रतियोगिताएँ हों, वृद्धजन बच्चों का मार्गदर्शन करें। हर घर के बच्चों की सहभागिता अनिवार्य बनाई जाए।

अमेरिका में जैसे दूसरी-तीसरी पीढ़ी के भारतीय बच्चों को हिंदी सिखाने के लिए मंदिरों में कक्षाएँ लगती हैं, भारत में भी वैसा हो तो अच्छा ही है।

हिंदी के लिए निष्ठापूर्वक कार्य करने के मामले में जैन समाज का अनुसरण भी किया जा सकता है। इस समाज के बड़े-बड़े साधु-संत हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूक रहते हैं।

कर्नाटक में जन्मे आचार्य विद्यासागर जी महाराज तो न केवल अनुयायियों को, बल्कि राजनेताओं को भी इसके लिए निर्देशित करते हैं। उन्होंने ‘मूक माटी' नामक महाकाव्य सहित हिंदी और संस्कृत में कई पुस्तकें रची हैं।

इन्हीं सब प्रयासों का सुफल है कि जैन समाज से नाता रखने वाले प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक, अभियंता, सनदी लेखाकार (सीए) भी हिंदी से प्रेम करते हैं, कई तो अभियान भी चला रहे हैं।

भारत में जातिगत समाजों और संगठनों के पास विशिष्ट शक्ति है। वे उस शक्ति का प्रयोग हिंदी भाषा के लिए कर सकते हैं। इस तरह वे बच्चों को सिर्फ़ भाषा से नहीं जोड़ेंगे, बल्कि उन्हें उनके वास्तविक परिवेश, संस्कार और रिश्तों से भी जोड़ेंगे। यही तो समाज का कर्तव्य है!

- विवेक गुप्ता (मधुरिमा, दैनिक भास्कर)


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पत्रिका 'जय विजय' के मार्च 2021 अंक का लिंक प्रेषित है. आप इस लिंक को क्लिक करके पत्रिका को डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं.
https://drive.google.com/file/d/1x3YI1_1rwYywsfoFkuPdOTkseqak8Sl8/view?usp=sharing

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

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लेखिका यात्रा विवरण

मीडिया प्रभारी

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[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] भारत का नाम केवल भारत हो, गुलामी का प्रतीक इंडिया शब्द हटाएँ। झिलमिल में - डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य' का महाराष्ट्र व गोआ के राज्यपाल मा. भगतसिंह कोश्यारी जी द्वारा सम्मान।

 


भारत बने भारत -  इंडिया शब्द हटाएँ - Copy.jpg
भारत को 'इण्डिया' नहीं भारत ही कहें ! विषय पर आयोजित ई-संगोष्ठी की वीडियो निम्नलिखित लिंक पर देखें।
https://youtu.be/tSdk9OmYPf4

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सब मिलकर माँग उठाएँ
भारत का नाम केवल भारत हो, गुलामी का प्रतीक इंडिया शब्द हटाएँ।
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निर्मल कुमार पाटौदी

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत याचिका  क्रमांक WPWIVIL/203/2015 में यह निराकरण चाहा गया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३२ के अंतर्गत संविधान में संशोधन कर 'इण्डियाशब्द को हटाकर सिर्फ 'भारतरखा जाए। याचिका की सुनवाई तीन सदस्यीय खण्डपीठ जिसमें माननीय  मुख्य न्यायाधीश एस ए  बोबड़े,न्यायमूर्ति ए. एस.बोपन्ना और न्याय मूर्ति ऋषिकेश राय की खण्डपीठ के समक्ष हुई।

०३-जून २०२० के अपने आदेश में  न्यायालय ने प्रार्थी के अधिवक्ता की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए याचिका को प्रतिवेदन मानकर भारत  सरकार के संबंधित मंत्रालयों की ओर उचित कार्यवाही हेतु अग्रेषित करने हेतु प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। तदनुसार आपकी सेवा में संविधान संशोधन करने हेतु निम्नलिखित निवेदन प्रस्तुत है  :-

विशेष: भारत राष्ट्र रूपी वृक्ष की बिगड़ी हुई सूरत को संवारने के लिए आवश्यकता पुरुषार्थ रूपी दीपक को पुन: प्रज्वलित करके उसे मूल रूप से उद्घाटित करने की है। भारत तो ‘भारत’ रूप में में अनादिकाल से विद्यमान है। आप स्वयं इस सर्वज्ञात प्रमाण जिनमें ‘ भारत’ ‘भरत’ शब्द हैसे अवगत हैं- जैसे ‘भरत नाट्यमसुब्रह्मण्यम ‘भारती’भारतेंदु हरिश्चंद्र, ‘भारतमाता’, ‘भारत भाग्य विधाता’, ‘मेरा भारत महान’।

आप महानुभाव और मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफ़ेयर्स

 २. लेजिस्लेटिव डिपार्टमेंट (मिनिस्ट्री ऑफ़ लॉ एण्ड जस्टिस),

३. मिनिस्ट्री ऑफ़ पार्लियामेंटरी अफ़ेयर्स 

४.डिपार्टमेंट ऑफ़ लीगल अफ़ेयर्स की ओर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के प्रकाश में संविधान में संशोधन करने हेतु प्रस्तुत निवेदन अगर उचित लगे तो कृपया   अग्रेषित कर दें।

आप महानुभाव की सेवा में -"इण्डिया अर्थात् भारत राज्यों का संघ होगा" के स्थान पर सिर्फ "भारत राज्यों का संघ होगा"। संविधान में संशोधन के लिए अतीत की पृष्ठभूमि  संस्कृतिइतिहास और देश की गौरवशाली परंपरा के आधार पर निम्नानुसार प्रमाण  प्रस्तुत  कर रहा हूँ।

१. भारतवर्ष में तीन 'भरतहुए हैं। पहले ऋषभदेव के पुत्र 'भरतजिनके नाम पर देश का नाम 'भारतवर्षपड़ा।

दूसरे राजा दशरथ के पुत्र ‘ भरत’और तीसरे -शकुंतला का पुत्र 'भरत' दशरथ के पुत्र 'भरतने श्री राम के नाम पर शासन किया थाइसलिए उनके नाम से देश का नाम 'भारतवर्षहोना अस्वाभाविक है।

२.  भारतीय संस्कृति के आद्यप्रणेता जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म अयोध्या में हुआ  निर्वाण कैलाश पर्वत पर हुआ था। प्रगेतिहासिक काल के ग्रंथ ‘आदिपुराण’ (आचार्य जिनसेन कृत) के अनुसार ऋषभदेव ने हिमवान पर्वत से लेकर समुद्र पर्यंत षटखण्डों पर विजय पाकर चक्रवर्ती पद धारण किया।  तब से देश का नामकरण 'भारतवर्षके नाम से प्रसिद्ध हुआ। । जो प्रागैतिहासिक काल में भारत के प्रथम सम्राट  के पद पर सुशोभित हुए थे।आप  मनु के वंशज थे। जिनका वृतांत श्रीमद् भागवत महापुराण में है। देखिए-(३०) (३१) (३२) (३३) (३४)  (३५) एक व्युत्पत्ति के अनुसार भारत ( भा+रत) शब्द का मतलब है आंतरिक प्रकाश या विदेक-रुपी प्रकाश में लीन।

३. भारत सिर्फ एक भू-भाग का ही नाम नहीं है। अपितु  भारतवर्ष को वैदिक काल से 'आर्यावर्त' 'जम्बूद्वीपऔर 'अजनाभदेशके नाम से भी पहचाना गया है।

४. हिंदू पुराणों में भी ऋषभदेव के पुत्र ‘भरत’ के नाम से देश का नामकरण ‘भारत’ स्वीकार किया गया है  देखिए अग्निपुराण अध्याय-१० श्लोक १०१२ में :-

जरामृत्युभयं नास्तिक धर्माधर्मों युगादिकम्। नाधर्म मद्यं तल्या हिमाद्देशात्तु नामित:


 श्रीमद् भागवत् के खण्ड ५।६।३ के अनुसार येपांखलु बरतों ज्येष्ठ: श्रेष्ठगुण आसीद्देनेदं वर्ष भारतमिति मत आर्य व्यपदिशंति।

५. भारत का एक मुंहबोला नाम 'सोने की चिड़ियाभी प्रचलित थादेखिए ३९)
७. भारतवर्ष का नाम ऋग्वेद काल के चक्रवर्ती सम्राट भरत पर पड़ने की प्रामणिकता: २००० वर्ष से भी अधिक पुरातन महाराज खारवेल के हाथी गुम्फाक शिलालेख (उड़ीसा) में जो भारतीय इतिहास के धरोहर के रूप में संरक्षित है, इसमें भी ऋषभदेवउनके पुत्र 'भरतऔर 'भारतवर्षके नाम का वर्णन उल्लेखित है।

८. 'भारतनाम के संबंध में ऋग्वेद में वर्णन मिलता है कि 'भारतएक सम्प्रदाय अथवा जाति का नाम है। जो अपने गर्त में कई पीढ़ियों/ वंशजों को समाए हुए हैं। वेदों में मिले उल्लेख के ९. ईसा पूर्व ११५० में दशराज युद्ध आर्य और भारतजातियों के बीच हुआ था। जिसमें 'भारतोंका नेतृत्व ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। ऋ्ग्वेद में यह वर्णन मिलता है कि महाभारत भारतीय परम्परा और संस्कृति का महाग्रंथ है। 

१०. महाभारत शब्द के कथन का उल्लेख करते हुए महर्षि वेदव्यास जो कि महाभारत ग्रंथ के रचयिता माने जाते हैंकहते हैं कि महाभारत में भारतवंशी क्षत्रियों का वर्णन किया गया है।  इसके आगे १३ जातियों की वंश परंपरा का वर्णन करते हुए वेदव्यास लिखते हैं कि राजा मनु के दो पुत्र देवभ्राट और सुभ्राट थे।इनमें से सुभ्राट के तीन पुत्र थे - दशज्योतिशातज्योति और सहस्त्रज्योति।  ये तीनों ही महाप्रतापी और विद्वान थे। 


११. पुरूवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र 'भरतकी गणना 'महाभारतमें वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुन्तलमहै। एक वृतांत के अनुसार दुष्यंत ने पुरुवंश की परंपरा को आगे बढ़ाया था 


१२. वेदव्यास ऋग्वेद काल का भौगोलिक वर्णन करते हुए लिखते हैं कि उस समय प्रदेश कई वैदिक समूहों अथवा जातियों में विभाजित था।  जिनमें गांधारीअनुद्रुहापुरुतुरुवश और 'भारतआदि जिनमें 'भरतऔर पुरु दोनों ही महत्वपूर्ण जातियाँ थीं।


१३. हिंदू धर्म का प्रसिद्ध पुराण भागवत के अनुसार- सृष्टि के शुरुआत में मनु नामक राजा का राज्य था।  उनके पौत्र का नाम नाभिराय था। जिनके नाम पर ही भारतवर्ष की पहचान अजनाभवर्ष के नाम से हुई इन्हीं अजनाभवर्ष  के पुत्र ऋषभदेव थे। जो स्वयंभू मनु की  पाँचवीं पीढ़ी का क्रम है : स्वयंभू मनुप्रियव्रतअग्नीघ्रनाभि और फिर ऋषभ और फिर 'भरतहुए। ऐसी मार्कण्डेय पुराण में वंशावली है। जिन्हें वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्माविष्णु और शिव का  स्वरूप माना गया हैतथा जैन धर्म में उनको आदि तीर्थंकर के रूप में माना जाता है। इन्हीं ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र 'भरतहुए।

१४. मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि मनु को जन्म देने और उसका भरण-पोषण करने के कारण 'भरत' नामकरण हुआ। जिस खण्ड पर उसका शासन वास था उसे भारतवर्ष कहा गया। नामकरण सूत्र जैन  परंपरा में मिलते हैं।

१५. हड़प्पा और मोहन-जोदड़ो से प्राप्त प्राचीन मूर्तियॉं पुरातत्व विभाग के अनुसार ऋषभदेव की है। 

१६. मरुद्रणों की कृपा से ही 'भरतको भारद्वाज नामक पुत्र हुआ। जो महान ऋषि हुए। चक्रवर्ती राजा 'भरतका उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है। भरत के चरित का उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है।

१७. पुस्तक : भारतवर्ष नामकरण: इतिहास और संस्कृति-लेखकप्राध्यापक जिनेन्द्रकुमार भोमाज के अनुसार भारत शब्द की उत्पत्ति भारत के प्राकृत प्रयोग से हुई। नाभि के पुत्र ऋषभउनके अलौकिक पुत्र  चक्रवर्ती सम्राट ‘भरत’ हुए। जो १४ रत्न३२,००० राजा और लाखों चतुरंग सेनाओं के स्वामी थे। जिसका उल्लेख भागवतहरिवंश और  आदिपर्वविष्णु और ब्रह्मपुराण आदि में मिलता है। 

१८. आचार्य बलदेव उपाध्यायसूरदास काव्यडॉ. जायसवालडॉ. अवधरीलाल अवस्थीडॉ. पी. सी. राय चौधरीडॉ. मंगलदेव शास्त्रीडॉ. वासुदेवशरण अग्रवालडॉ. प्रेमसागर जैनप्रो. आर. डी. कर्मरकर आदि ने ऋषभ के पुत्र 'भरतके कारण देश को 'भारतवर्षके रूप में स्वीकार किया है।
१८.  भारत का एक अन्य नाम 'हिन्दुस्तान भी है। जिसका अर्थ 'हिन्द की भूमियह नाम विशेषकर अरब/ईरान में प्रचलित हुआ।  (३६) (३७) ईरान से आए आक्रमणकारी 'का उच्चारण 'से किया करते थेइस प्रकार उन्होंने 'सिंधु को हिंदुकहा जो भविष्य में 'हिंदुस्तानकहलाया। देश में मुग़लों ने शासन किया। उसके बाद अंग्रेजों के शासन आया। पहले ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के नाम से व्यापार करने हमारे भारत में ये  अंग्रेज़ आए थे  बाद में इन्होंने ‘भारत’ पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इन्होंने ‘इण्डिया’ शब्द को अपने अंग्रेजी शासन के साथ ही भारत में प्रचलित कर दिया।

स्वाधीन होने के बाद  देश के संविधान में असावधानी से ‘भारत’ शब्द से पहले ‘इण्डिया’ शब्द को स्थान दे दिया गया। जो सर्वथा ग़लत था।  जबकि संविधान में ‘सिर्फ ‘भारतभारतीय और भारतीयता’ के अतिरिक्त किसी अन्य देशभाषा और उसकी जाति के शब्द को स्थान देना राष्ट्र और राष्ट्रीयता के अतिरिक्त प्राचीन गौरवइतिहाससंस्कृति और परंपराओं के अनुसार भी असंगत है।

जैनाचार्य अपराजेय साधक संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महायतिराज पिछले  कुछ वर्षों से आव्हान कर रहे हैं कि ‘इण्डिया ‘ शब्द पराधीनता का द्योतक है। जिसने भारत को मानसिक रूप से परतंत्र बना रखा है  जो  विदेशी मानसिकता पर आश्रित है। जबकि ‘भारत’ शब्द भारतीय जीवन पद्धति का स्पंदन’ है। भारत का अर्थ-‘भा’ अर्थात् (प्रकाश या ज्ञान) है। जो निरंतर  ज्ञान की खोज में लगा है। असली सवाल‘भारत’ के भारत होने का है। अपने इतिहास का शब्द ‘भारत’ को भूलने का अर्थ अपने दादा-परदादाओं से संबंध ख़त्म कर लेना है। आपने ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के पृष्ठ ७८९ प्रकाशित जानकारी देते हुए बताया  कि-‘ Indian जिसका मतलब ओल्ड फ़ैशन एण्ड क्रिमिनल पिंपल’ अर्थात् पिछड़े और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग।जब अमेरिकाजापानआस्ट्रेलियाभूटान और पाकिस्तान जैसे सभी देशों की भाषा  में एक ही नाम बोला और लिखा जाता है तो ‘भारत’ के नाम को संविधान में ‘इण्डिया’ के साथ रखा जाना अपमानजनक और असहनीय है। छोटा-सा देश ‘सिलोन’ जब अपना नाम बदलकर ‘श्रीलंका’  कर सकता हैतो संविधान में संशोधन करके सिर्फ़ ’भारत’ रखा जाना संगत है।

निर्मलकुमार पाटोदी,
विद्या -निलय४५शांति निकेतन ,(बॉम्बे हॉस्पीटल के पीछे)इन्दौर-४५२०१० मध्य प्रदेश
सम्पर्क :०७८६९९१७०७० ।  मेल: nirmal.patodi@gmail.com


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वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य' का 
महाराष्ट्र व  गोआ के राज्यपाल 
मा. भगतसिंह कोश्यारी जी द्वारा राजभवन में कोरोना - सेनानी  सम्मान।

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

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