रविवार, 13 अगस्त 2017

पूरी आन-बान-शान से टोरंटो की सड़कों पर कवियों का मान संवर्धन करता चलेगा “साहित्य रथ”

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर

पूरी आन-बान-शान से टोरंटो की सड़कों पर कवियों का मान संवर्धन करता चलेगा “साहित्य रथ”
भारत से बाहर विश्व में पहली बार निकलेगा “साहित्य रथ”
“विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा” भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाली परेड में भारत से बाहर विश्व में पहली बार अपने महत्वाकांक्षी उपक्रम “साहित्य रथ” को साहित्यकारों की शान के रूप में टोरंटो की सड़कों पर उतारेगा। यह परेड २० अगस्त, २०१७ को नाथन फिलिप स्क्वेयर, टोरंटो में निकाली जायगी। इस “साहित्य रथ” का प्रमुख मंतव्य वर्तमान के रचनाकारों का जनता से सीधा परिचय करवाना है और हमारे पूर्व साहित्यकारों यानि आदि काल, भक्ति काल, रीति काल व आधुनिक काल के रचनाकारों का उनके चित्रों के माध्यम से आम जनता के बीच एक पारंपरिक संबंध कायम करना है और विशेषत: हमारी नयी पीढ़ी को हमारे पुराने रचनाकारों के दर्शन करवाना है। २० अगस्त को निकलने वाली इस परेड की ग्रैंड मार्शल भारतीय फ़िल्म जगत की मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी होंगी। इस “साहित्य रथ” में जहाँ एक ओर “राजस्थान एसोसियेशन आफ़ नार्थ अमेरिका” द्वारा राजस्थान की सांस्कृतिक छटा बिखेरी जायेगी वहीं साथ ही साथ कनाडा के कवि ’साहित्य रथ’ के मंच से देश भक्ति की रचनाएँ सुनाते हुए वातावरण को राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप प्रकाशमय और ओजमय बनाते चलेंगे। चल कविसम्मेलन का यह प्रयोग भी विश्व में पहला और अनूठा होगा, ऐसा हमारा विश्वास है। इस पूरे कार्यक्रम को ए टी एन लाइव टेलीकास्ट करेगा व ज़ी टीवी व अन्य बहुत से टीवी रिकार्ड करके प्रस्तुत करेंगे। 
हम एक मल्टीकल्चरल समाज में रहते हैं अतएव हमारा प्रयास है कि इस कवि सम्मेलन में अधिकतम भारतीय भाषाओं यानि हिंदी, पंजाबी, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी, उर्दू, मराठी, अंग्रेजी यानि अधिकतम भाषाओं के कवि देशभक्ति की कविताएँ सुनायें और “साहित्य रथ” के प्रयास को सार्थकता के शिखर पर पहुँचाने में उत्साहपूर्वक व तन-मन-धन से सहयोग करें। ७० वर्ष से अधिक आयु के कवियों के लिये रथ पर ही बैठने की व्यवस्था होगी और अधिकतम १० रचनाकार ही रथ पर बैठ सकेंगे अतएव कनाडा में रहने वाले इच्छुक कवि तुरंत अपने नाम हमें vishvahindi@gmail.com पर भेजदें ताकि वह लिस्ट तैयार करके आयोजकों को प्रेषित की जा सके।
याद रखिये “साहित्य रथ” आपका, आपके लिये और आपके सक्रिय सहयोग द्वारा ही अपनी मंजिल तय कर सकेगा। 
- प्रो. सरन घई, संस्थापक-अध्यक्ष, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा, संपादक – “प्रयास”
प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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भारत की भाषायी गुलामी -डॉ. वेदप्रताप वैदिक। झिलमिल में तथ्य भारती जुलाई अंक तथा ज्ञानवर्धक वीडियो हिंदी में भी


भारत की भाषायी गुलामी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं की कितनी दुर्दशा है ? इस दुर्दशा को देखते हुए कौन कह सकता है कि भारत वास्तव में स्वतंत्र है ? ‘पीपल्स लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडिया’ नामक संस्था ने कई शोधकर्ताओं को लगाकर भारत की भाषाओं की दशा का सूक्ष्म अध्ययन करवाया है। कल इसके 11 खंड प्रकाशित हुए हैं। इस अवसर पर वक्ताओं ने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक तो यह कि पिछले 50 वर्षों में भारत की 250 भाषाएं लुप्त हो गई हैं, क्योंकि इन भाषाओं को बोलनेवाले आदिवासी बच्चों को सिर्फ देश की 22 सरकारी भाषाओं में ही पढ़ाया जाता है। उनकी भाषाएं सिर्फ घरों में ही बोली जाती हैं। ज्यों ही लोग अपने घरों से दूर होते हैं या बुजुर्गों का साया उन पर से उठ जाता है तो ये भाषाएं, जिन्हें हम बोलियां कहते हैं, उनका नामो-निशान तक मिट जाता है। इनके मिटने से उस संस्कृति के भी मिटने का डर पैदा हो जाता है, जिसने इस भाषा को बनाया है। इस समय देश में ऐसी 780 भाषाएं बची हुई हैं। इनकी रक्षा जरुरी है। 

अपनी भाषाओं की उपेक्षा का दूसरा दुष्परिणाम यह है कि हम अपनी भाषाओं के माध्यम से अनुसंधान नहीं करते। भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का खजाना उपलब्ध है लेकिन हम लोग उसकी तरफ से बेखबर हैं। हम प्लेटो, सात्र्र और चोम्सकी के बारे में तो खूब जानते हैं लेकिन हमें पाणिनी, चरक, कौटिल्य, भर्तृहरि और लीलावती के बारे में कुछ पता नहीं। हमारे ज्ञानार्जन के तरीके अभी तक वही हैं, जो गुलामी के दिनों में थे। इस गुलामी को 1965-66 में सबसे पहले मैंने चुनौती दी थी। 50-52 साल पहले मैंने दिल्ली के ‘इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़’ में मांग की थी कि मुझे अपने पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी (मेरी मातृभाषा) में लिखने दिया जाए। अंग्रेजी तो मैं जानता ही था, मैंने फारसी, रुसी और जर्मन भी सीखी। प्रथम श्रेणी के छात्र होने के बावजूद मुझे स्कूल से निकाल दिया गया। संसद में दर्जनों बार हंगामा हुआ। यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। आखिरकार स्कूल के संविधान में संशोधन हुआ। मेरी विजय हुई। भारतीय भाषाओं के माध्यम से उच्च शोध के दरवाजे खुले। इन दरवाजों को खुले 50 साल हो गए लेकिन इनमें से दर्जन भर पीएच.डी. भी नहीं निकले। क्यों ? क्योंकि अंग्रेजी की गुलामी सर्वत्र छाई हुई है। जब तक हमारे देश की सरकारी भर्तियों, पढ़ाई के माध्यम, सरकारी काम-काज और अदालातें से अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व नहीं हटेगा, भारतीय भाषाएं लंगड़ाती रहेंगी और हिंदुस्तान दोयम दर्जे का देश बना रहेगा। 
04.08.2017



अब तक केवल अंग्रेजी में बन रहे  ज्ञानवर्धक - सूचनापरक वीडियो अब हिंदी में भी 

भारत का प्रमुख मीडिया समूह नेटव्रक -18 जो कि CNBC, CNBC Awaz, News 18 India, ETV  आदि कई चैनलों के साथ काम करता है।
  विभिन्न विषयों पर  शिक्षित  करने के उद्धेश्य से अंग्रेजी में  ज्ञानवर्धक -सूचनापरक  वीडियो निर्मित कर रहा है ।

अंग्रेजी में इस प्रयोग को आजमाने के बाद अब हम वैसे ही वाडियो हिंदीभाषी  क्षेत्र के लिए हिंदी में ले कर आ रहे हैं 
ताकि देश की भाषा में देश की जनता को हर क्षेत्र की जानकारी दी जा सके।
प्रस्तुत हैं ऐसे दो वीडियो के लिंक ।


कैसे होती है ऑनलइन शॉपिंग (How Online Shopping Works) 

जानिए कैसे चुने जाते हैं भारत के उपराष्ट्रपति (How Vice President of India Is Elected) 


कृपया इन वीडियो को देखें और टिप्पणी क्षेत्र में जा कर अपनी टिप्पणियाँ भी दें।



हमारा वादा है कि हम हिंदी में ऐसे और अधिक  ज्ञानवर्धक वीडियो आप के लिए ले कर आते रहेंगे।

सादर

पुलकित गुप्ता

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

-- 
वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी पुस्तक : Surendra Gambhir




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 प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी पुस्तक में तेरह देशों में विरासती हिंदी भाषा के संरक्षण और ह्रास का विवरण है। विभिन्न विद्वज्जनों द्वारा भाषा-विज्ञान की दृष्टि से लिखे गए इन लेखों के देशों में छः गिरमिटिया श्रमिकों के देश हैं, पांच पश्चिमी सभ्यता वाले देश हैं और दो एशिया के देश हैं। हिन्दी की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए भारत में हिन्दी जगत के तीन विशेष पक्षों पर अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखे गए लेख भी इस पुस्तक के परिशिष्ट में सम्मिलित हैं। विषय-प्रस्तावना और भारत से बाहर के देशों के बारे में तेरह लेखों का केन्द्रीय बिंदु है - सामाजिक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से विरासती भाषाओं की वर्तमान स्थिति, इतिहास और भविष्य के लिए संभावनाएं। कुछ लेखों में उन उन देशों में साहित्यिक गतिविधि के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी है। 

पुस्तक में लेखों की अनुक्रमणिका इस प्रकार है -

पुरोवाक् - डा० गिरीश्वर मिश्र
विषय-प्रस्तावना - डा० सुरेन्द्र गंभीर
मारीशस - डा० विनेश हुकूमसिंह 
गयाना - डा० सुरेन्द्र गंभीर
त्रिनिदाद - डा० विशम भीमल
सूरिनाम - डा० मोहनकांत गौतम
फ़ीजी - डा० बृजलाल और डा० रिचर्ड बार्ज़
दक्षिणी अफ़्रीका - डा० उषादेवी शुक्ल
आस्ट्रेिलिया - डा० रिचर्ड बार्ज़
ब्रिटेन - डा० कविता वाचक्नवी
अमेरिका - डा० विजय गंभीर
कनाडा - डा० शैलजा सक्सेना
न्यूज़ीलैंड - सुनीता नारायण
यू.ए.ई. - पूर्णिमा वर्मन
नेपाल - डा० मृदुला शर्मा

भारत (परिशिष्ट) - 
हिन्दी की संवैधानिक स्थिति - डा० विजय मल्होत्रा
व्यवसाय में हिन्दी - डा० वशिनी शर्मा
हिंदी से जुड़ी तकनीकें और उनका प्रयोग - बालेन्दु शर्मा दाधीच


यह पुस्तक तीन वर्षों के परिश्रम का परिणाम है और आशा है यह जानकारी और निष्कर्ष विषय के ज्ञानवर्धन में अपना योगदान कर सकेंगे। 

पुस्तक की पृष्ठ-संख्या - २३२
सहयोग - महात्त्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ
संपादन  - डा० सुरेन्द्र गंभीर और डा० वशिनी शर्मा 

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साहित्य और समाज के रिश्ते- गिरीश्वर मिश्र, झिलमिल - प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी - संपादन -



साहित्य और समाज के रिश्ते



गिरीश्वर मिश्र




शिक्षा की भाषा, दैनंदिन कार्यों में प्रयोग की भाषासरकारी काम-काज की भाषा के रूप में हिंदी को उसका जायज गौरव दिलाने के लिए अनेक प्रबुद्ध हिंदी सेवी और हितैषी चिंतित हैं और कई तरह के प्रयास कर रहे हैं जनमत तैयार कर रहे हैं. समकालीन साहित्य की युग-चेतना पर नजर दौडाएं तो यही दिखता है कि समाज में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों पर प्रहार करने और विद्रूपताओं को उघारने के लिए साहित्य तत्पर है. इस काम को  आगे बढाने के लिए स्त्री-विमर्शदलित-विमर्शआदिवासी विमर्श जैसे अनेक विमर्शों के माध्यम से हस्तक्षेप किया जा रहा है . इन सबमें  सामजिक न्याय की गुहार लगाई जा रही है ताकि अवसरों की समानता और समता समानता के मूल्यों को स्थापित किया जा सके. आज देश के कई राजनैतिक दल भी  प्रकट रूप से इसी तरह के मसौदे के साथ काम कर रहे हैं. आजाद भारत में ‘स्वतंत्रता’ की जाँच-पड़ताल की जा रही है. साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तनकामी और जीवंत रचनाकार यथार्थपीड़ाप्रतिरोध और संत्रास को लेकर अनुभव और कल्पना के सहारे मुखर हो रहे हैं. इन सब प्रयासों में सोचने का परिप्रेक्ष्य आज बदला हुआ है. यह अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि आज जिस देश और काल में हम जी रहे हैं वही बदला हुआ है . अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और राजनीतिक समीकरण बदला हुआ है . संचार की तकनीक और मीडिया के जाल ने हमारे ऐन्द्रिक अनुभव की दुनिया का विराट फैलाव दिया है. ऐसे में जब इस सप्ताह ‘दद्दा’ यानी राष्ट्रकवि श्रदधेय मैथिलीशरण गुप्त की एक सौ इकतीसवीं जन्मतिथि पड़ी तो उनके अवदान का भी स्मरण आया. इसलिए भी कि उनके सम्मुख भी एक साहित्यकार के रूप में अंग्रेजों के उपनिवेश बने हुए परतंत्र भारत की मुक्ति का प्रश्न खड़ा हुआ था. उन्हें राजनैतिक व्यवस्था की गुलामी और मानसिक गुलामी दोनों की ही काट सोचनी थी और साहित्य की भूमिका तय कर उसको इस काम में नियोजित भी करना था.

उल्लेखनीय है कि गुप्त जी का समय यानी बीसवीं सदी के आरंभिक वर्ष आज की प्रचलित खड़ी बोली हिंदी के लिए भी आरंभिक काल था . समर्थ भाषा की दृष्टि से हिंदी के लिए यह एक संक्रमण का काल था. भारतेन्दु युग में शुरुआत हो चुकी थी पर हिंदी का नया उभरता रूप अभी भी ठीक से अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका  था . सच कहें तो आज की हिंदी आकार ले रही थी या कहें रची जा रही थी . भाषा का प्रयोग पूरी तरह से रवां नहीं हो पाया था. इस नई चाल की हिंदी के महनीय शिल्पी ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गुप्त जी को ब्रज भाषा की जगह खड़ी बोली हिंदी में काव्य-रचना की सलाह दी और इस दिशा में प्रोत्साहित किया.

गुप्त जी के मन-मस्तिष्क में देश और संस्कृति के सरोकार गूँज रहे थे. तब तक की जो कविता थी उसमें प्रायः परम्परागत विषय ही लिए जा रहे थे. गुप्त जी ने राष्ट्र को केन्द्र में लेकर काव्य के माध्यम से भारतीय समाज को संबोधित करने का बीड़ा उठाया. उनके इस प्रयास को तब और स्वीकृति मिली जब 1936 में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी से उन्हें ‘राष्ट्र-कवि’ की संज्ञा प्राप्त हुई. एक आस्तिक वैष्णव परिवार में जन्मे और चिरगांव की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले-बढे गुप्त जी का बौद्धिक आधार मुख्यतः स्वाध्याय और निजी अनुभव ही था. औपचारिक शिक्षा कम होने पर भी गुप्त जी ने समाजसंस्कृति और भाषा के साथ एक दायित्वपूर्ण रिश्ता विकसित किया. बीसवीं सदी के आरम्भ से सदी के मध्य तक लगभग आधी सदी तक चलती उनकी विस्तृत काव्य यात्रा में उनकी लेखनी ने चालीस से अधिक काव्य कृतियाँ हिंदी जगत को दीं . इतिवृत्तात्मक और पौराणिक सूत्रों को लेकर आगे बढती उनकी काव्य-धारा सहज और सरल है . राष्ट्रवादी और मानवता की पुकार लगाती उनकी कवितायेँ छंद बद्ध होने के कारण पठनीय और गेय हैं. सरल शब्द योजना और सहज प्रवाह के साथ उनकी बहुतेरी कवितायेँ लोगों की जुबान पर चढ़ गई थी.  उनकी कविता संस्कृति के साथ संवाद कराती सी लगती हैं. उन्होंने उपेक्षित चरित्रों को लिया . यशोधराकाबा और कर्बलाजयद्रथ बधहिडिम्बाकिसानपञ्चवटीनहुषसैरंध्रीअजितशकुंतला,शक्तिवन वैभव आदि खंड काव्य उनके व्यापक विषय विस्तार को स्पष्ट करते हैं. साकेत और जय भारत गुप्त जी के दो महाकाव्य हैं.
संस्कृति और देश की चिंता की प्रखर अभिव्यक्ति उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना भारत-भारती में हुई जो गाँव शहर हर जगह लोकप्रिय हुई. उसका पहला संस्करण 1014 में प्रकाशित हुआ था . उसकी प्रस्तावना जिसे लिखे  भी एक सौ पांच साल हो गए आज भी प्रासंगिक है . गुप्त जी कहते हैं ‘यह बात मानी हुई है कि भारत की पूर्व और वर्त्तमान दशा में बड़ा भारी अंतर है . अंतर न कह कर इसे वैपरीत्य कहना चाहिए . एक वह समय था कि यह देश विद्याकला-कौशल और सभ्यता में संसार का शिरोमणि था और एक यह समय है कि इन्हीं बातों का इसमें शोचनीय अभाव हो गया है . जो आर्य जाति कभी सारे संसार को शिक्षा देती थी वही आज पद-पद पर पराया मुंह ताक रही है’!

गुप्त जी का मन देश की दशा को देख कर व्यथित हो उठता है और समाधान ढूँढ़ने चलता है.  फिर गुप्त जी स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘क्या हमारा रोग ऐसा असाध्य हो गया है कि उसकी कोई चिकित्सा ही नहीं है’ ?. इस प्रश्न पर मनन करते हुए गुप्त जी यह मत स्थिर कर पाठक से साझा करते हैं :  ‘संसार में ऐसा काम नहीं जो सचमुच उद्योग से सिद्ध न हो सके . परन्तु उद्योग के लिए उत्साह की आवश्यकता है . बिना उत्साह के उद्योग नहीं हो सकता . इसी उत्साह के उद्योग नहीं हो सकता. इसी उत्साह को उत्तेजित करने के लिए कविता एक उत्तम साधन है.’  इस तरह के संकल्प के साथ गुप्त जी काव्य-रचना में प्रवृत्त होते हैं .

भारत-भारती काव्य के तीन खंड हैं अतीतवर्तमान और भविष्यत् . बड़े विधि विधान से गुप्त जी भारत की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा की विभिन्न धाराओं का वैभवअंग्रेजों के समय हुए उसके पराभव के विभिन्न आयाम और जो भी भविष्य में  संभव है उसके लिए आह्वान को रेखांकित किया है. उनकी खड़ी बोली हिंदी के प्रसार की दृष्टि से प्रस्थान विन्दु सरीखी तो हैं ही उनकी प्रभावोत्पाक शैली में उठाये गया सवाल आज भी मन को मथ रहे हैं: हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी ? हमें आज फिर इन प्रश्नों पर सोचना विचारना होगा और इसी बहाने समाज को साहित्य से जोड़ना होगा. शायद ये सवाल हर पीढ़ी को अपने अपने देश कल में सोचना चाहिए.


प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र Prof. GirishwarMisra, Ph.D
कुलपति  / Vice-Chancellor
महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय /Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya
पोस्ट हिंदी विश्वविद्यालय /P.O. Hindi Vishwavidyalaya,
गांधी हिल्स  / Gandhi Hills, वर्धा-442001 / Wardha-442001
दूरभाष/Tel.: +91-7152-230904 ए वं  230907, फैक्स/Fax : +91-7152-230903 



प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी 



प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी पुस्तक में तेरह देशों में विरासती हिंदी भाषा के संरक्षण और ह्रास का विवरण है। विभिन्न विद्वज्जनों द्वारा भाषा-विज्ञान की दृष्टि से लिखे गए इन लेखों के देशों में छः गिरमिटिया श्रमिकों के देश हैं, पांच पश्चिमी सभ्यता वाले देश हैं और दो एशिया के देश हैं। हिन्दी की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए भारत में हिन्दी जगत के तीन विशेष पक्षों पर अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखे गए लेख भी इस पुस्तक के परिशिष्ट में सम्मिलित हैं। विषय-प्रस्तावना और भारत से बाहर के देशों के बारे में तेरह लेखों का केन्द्रीय बिंदु है - सामाजिक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से विरासती भाषाओं की वर्तमान स्थिति, इतिहास और भविष्य के लिए संभावनाएं। कुछ लेखों में उन उन देशों में साहित्यिक गतिविधि के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी है। 

पुस्तक में लेखों की अनुक्रमणिका इस प्रकार है -
पुरोवाक् - डा० गिरीश्वर मिश्र                                                       विषय-प्रस्तावना - डा० सुरेन्द्र गंभीर
मारीशस - डा० विनेश हुकूमसिंह                                                गयाना - डा० सुरेन्द्र गंभीर
त्रिनिदाद - डा० विशम भीमल                                                     सूरिनाम - डा० मोहनकांत गौतम
फ़ीजी - डा० बृजलाल और डा० रिचर्ड बार्ज़                                  दक्षिणी अफ़्रीका - डा० उषादेवी शुक्ल
आस्ट्रेिलिया - डा० रिचर्ड बार्ज़                                                     ब्रिटेन - डा० कविता वाचक्नवी
अमेरिका - डा० विजय गंभीर                                                      कनाडा - डा० शैलजा सक्सेना
न्यूज़ीलैंड - सुनीता नारायण                                                        यू.ए.ई. - पूर्णिमा वर्मन
नेपाल - डा० मृदुला शर्मा

भारत (परिशिष्ट) - 
हिन्दी की संवैधानिक स्थिति - डा० विजय मल्होत्रा                        व्यवसाय में हिन्दी - डा० वशिनी शर्मा
हिंदी से जुड़ी तकनीकें और उनका प्रयोग - बालेन्दु शर्मा दाधीच

यह पुस्तक तीन वर्षों के परिश्रम का परिणाम है और आशा है यह जानकारी और निष्कर्ष विषय के ज्ञानवर्धन में अपना योगदान कर सकेंगे। 
पुस्तक की पृष्ठ-संख्या - २३२,  सहयोग - महात्त्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,  प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ

संपादन  - डा० सुरेन्द्र गंभीर और डा० वशिनी शर्मा 


डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क - vaishwikhindisammelan@gmail.com

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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