मंगलवार, 14 नवंबर 2017

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Sewnath

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

बच्चों को क्यों पिसवा रहे हैं ? डॉ. वेदप्रताप वैदिक

बच्चों को क्यों पिसवा रहे हैं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
ऐसा लगता है कि उत्तराखंड की सरकार को मूर्खता का दौरा पड़ गया है। जो मूर्खता वह करने जा रही है, वह भारत में आज तक किसी भी सरकार ने नहीं की है। मज़े की बात है कि उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। अब उत्तराखंड के 18000 सरकारी स्कूलों में सारे विषयों की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और भाजपा के नेता कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सबसे ज्यादा पलीता उत्तराखंड की सरकार ही लगाएगी। वह अगले साल से पहली कक्षा से ही बच्चों की सारी पढ़ाई अंग्रेजी में करवाएगी। वह हिरण पर घास लादेगी। सारी दुनिया के शिक्षाशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि बच्चों पर विदेशी भाषा का माध्यम थोप देने से उनका बौद्धिक विकास रुक जाता है। उनकी जो शक्ति किसी विषय को समझने में लगनी चाहिए, वह अंग्रेजी से कुश्ती लड़ने में बर्बाद हो जाएगी। वे रटटू तोते बन जाएंगे। उनकी मौलिकता नष्ट हो जाएगी। वे दिमागी तौर पर बीमार हो जाएंगे। जर्मनी में यह मूर्खतापूर्ण प्रयोग किया जा चुका है। जो बच्चे मातृभाषा और राष्ट्रभाषा से स्कूलों में वंचित रहते हैं, वे अपने ही घर में बेगाने हो जाते हैं। वे अपनी परंपराओं, अपनी विचार-पद्धति और अपनी संस्कृति से कट जाते हैं। भाषाभ्रष्ट को संस्कारभ्रष्ट होते देर नहीं लगती। अकबर इलाहाबादी ने क्या खूब लिखा है--- 

हम उन कुल किताबों को काबिले-जब्ती समझते हैं।
जिन्हें पढ़कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं ।।

उत्तराखंड की सरकार ने इतना मूर्खतापूर्ण और दुस्साहसिक निर्णय क्यों किया ? शायद यह सोचकर कि बच्चे अच्छी अंग्रेजी जानेंगे तो बड़ी नौकरियां हथिया लेंगे। नौकरियां हथियाने के लिए आप अपने बच्चों को अंग्रेजी की चक्की में क्यों पिसवा रहे हैं ? यदि आप में दम है, पौरुष है तो इस चक्की को ही तोड़ डालिए। सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी हटाओ का नारा लगाइए। भारत जैसे भाषायी गुलाम राष्ट्रों की बात जाने दीजिए, दुनिया के किसी भी स्वाभिमानी और महाशक्ति राष्ट्र में लोग अपने बच्चों को विदेशी भाषा की चक्की में पिसने नहीं देते। हमारे ज्यादातर शीर्ष नेता अबौद्धिक और अनपढ़ हैं। वे हीनता ग्रंथि के शिकार है। उन्हें यह पता हीं नहीं कि विदेशी भाषाएं कब और क्यों पढ़ाई जानी चाहिए। इसीलिए इतने मूर्खतापूर्ण निर्णय ले लिए जाते हैं।

प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

प्रतिक्रियाएँ : भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक लेख जय विजय की वेबसाइट पर प्रकाशित



भाजपा क्यों लगने दे, यह कलंक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक


लेख जय विजय की वेबसाइट पर प्रकाशित   http://jayvijay.co/2017/11/10/%E0%A4%AD%E0...
प्रतिक्रियाएँ



1.कृपया इस पोस्ट को मा.मोदी जी,और भाजपा के केंद्रीय कार्यालय तथा श्री प्रकाश जावड़ेकर को भेजने का कष्ट करें।
  डॉ.महेश 'दिवाकर', मुरादाबाद

2. वेदप्रताप भाई,
महामूर्खों और महापाखंडियों से समझदारी और इमानदारी की आशा करना उचित नहीं है| इसी लिए तो वर्तमान सरकार देशद्रोह-देशद्रोह चिल्लाती है ताकि उसके देशद्रोह के काले कारनामे इस शोर में डूब जाएं|  देश की भाषाओं के क़त्ल से बड़ा कोई देशद्रोह हो सकता है क्या! सादर,
जोगा सिंह

3. आदरणीय वैदिक जी के इन उद्गारों के लिए साधुवाद।
भारत की मनीषा आज कुन्द हो गयी है। भारत के शिक्षाविद और राजनेता अपनी भाषा, अपनी परम्परा, अपनी संस्कृति और इस महान राष्ट्र के स्वाभिमान के प्रति इतने निस्पृह हो गये हैं कि सहज ही विश्वास नहीं होता। देश में अंग्रेजी को जो अनावश्यक महत्त्व दिया जा रहा है, वह किसी भी देशाभिमानी व्यक्ति की समझ से परे है। सबसे बड़े दुःख की बात तो यह है कि उत्तर भारत के ठेठ हिन्दी-भाषी प्रान्तों में हिन्दी की दुर्गति होने लगी है। हमारे स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि अब उत्तर प्रदेश जैसे विशुद्ध हिन्दी-भाषी प्रान्त में भी बोर्ड परीक्षा में पाँच-पाँच लाख विद्यार्थी हिन्दी के पर्चे में अनुत्तीर्ण हो रहे हैं। अंग्रेजी का व्यामोह इतना बढ़ गया है कि अब इन प्रान्तों के अनपढ़ भी अक्षर-ज्ञान के नाम पर एबीसीडी से शुरुआत करने को वरीयता दे रहे हैं। डॉ. वैदिक को जानकर आश्चर्य होगा कि लखनऊ में मेरे मकान के आसपास की झोंपड़पट्टियों में रहनेवाले बच्चे अव्वल तो पढ़ने नहीं जाते और जाते भी हैं तो वे कखग अथवा अआइ के बजाय ABCD से पढ़ाई आरंभ कर रहे हैं। उन्हें लगता है अंग्रेजी सीखने में न्दी सीखने की अपेक्षा अधिक लाभ है। यह मिथ्या धारणा कौन फैला रहा है? कौन है जो भारतीय भाषाओं के खिलाफ साजिश रच रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर दिल्ली से मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के स्कूलों में भी अब पहली कक्षा से अंग्रेजी की पढ़ाई की बातें हो रही हैं। मूल समस्या कहाँ है? मूल समस्या है-हमारी सरकारी शिक्षालयों में। वहाँ शिक्षक पढ़ाते नहीं। वहाँ जो बच्चे नाम लिखा लेते हैं, वे शिक्षकों के काहिल होने के कारण अपना भविष्य चौपट कर लेते हैं। 

इसके विपरीत निजी स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ाना पड़ता है। और इऩ स्कूलों ने अपने को सरकारी स्कूलों से अलग दिखाने के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बना रखा है। लिहाजा निजी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे अंग्रेजी ही नहीं, सभी विषयों की पढ़ाई में अच्छे होते हैं और जीवन में आगे निकल जाते हैं। सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम रखने के पीछे शायद यही मुगालता काम कर रहा है, कि वहाँ के बच्चे भी अब निजी स्कूलों की तरह आगे निकल सकेंगे। 

यह धारणा पूरी तरह भ्रान्ति-आधारित है। सरकारी स्कूल का शिक्षक पढ़ाएगा ही नहीं तो माध्यम चाहे हिन्दी हो या अंग्रेजी, वहाँ कुछ नहीं बदलने वाला । बेहतर होता, दिल्ली नगर निगम अपने स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने पर ध्यान देती। और इसे दुबारा कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रारंभिक शिक्षा तो मातृभाषा में ही होनी चाहिए-फिर चाहे वह मातृभाषा हिन्दी हो अथवा पंजाबी (दिल्ली के संदर्भ में)। 
आर.वी.सिंह/R.V. Singh उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi) 
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India, प्रधान कार्यालय/Head Office 
लखनऊ/Lucknow- 226 001, फोन/Phone-2288774, मोबाइल/Mob-9454712299, ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in


4. सर, आपका हिंदी भाषा के प्रति लगाव जुड़ाव और उसके प्रति चिंता के लिए आपका नमन है। लेकिन एक बात कहना चाहूंगा। मैं एक गरीब परिवार में जन्‍मा हूं। पढ़ाई लिखाई शुद्ध रूप से हिंदी माध्‍यम से हुआ है। मैं बहुत छोटा कर्मचारी हूं भारत सरकार के केंद्रीय विश्‍वविद्यालय में। पिछले कई सालों से भारत सरकार के विभिन्‍न विभागों में ऊंचे पद के लिए साक्षात्‍कार में जब भी जाता हूं अंग्रेजी में नहीं बोल पाने के कारण चयन नहीं हो पा रहा है। जबकि अपने विश्‍वविद्यालय में मैं एक मेहनती और अच्‍छा कर्मचारी हूं। मैं फिर कैसे अपने बच्‍चों को अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाना चाहूंगा। इसपर कोई सरकार नहीं सोचती।  हिंदी अब पढ़ने-पढ़ाने का नहीं राजनीति का माध्‍यम बन गया है। 
आलोक कुमार r <alokkumarsingh74@gmail.com>

5. महोदय आपकी जानकारी को बता दू कि संघ लोक सेवा आयोग के सामने जो धरना चला थे उसके करता और धर्ता स्वर्गीय श्री राजकारन सिंह थे जिन्हे अनगिनत बार गिरफ्तार किया गया था,लोकसभा में कूदने के कारन श्री पुस्पेंदेर चौहान की पसलिया टूट गयी थी। पुस्पेंदेर चौहान आज भी हिंदी के लिए लड़ रहे हे / श्री देबसिंघ रावत आज भी इस आंदोलन के लिए जिन्दा रखे हे ।
डी.पी. सिंह राठौर

6. भाजपा भटकाव से ग्रस्त एक राजनैतिक दल है जो कभी कुछ करती है तो कभी उसका उल्टा। एक तरफ़ स्वदेशी की बात करती है तो दूसरी तरफ़ अंग्रेजी और अग्रेजियत को देश पर लादने के किए कमर कसे हुए है। विरोधाभासों का नाम है भाजपा। देश को अमेरिका-विलायत बनाने के चक्कर में देश का बंटाधार न कर डाले ऐसा डर मुझे लगने गला है। भाजपा राज के सीमित काल में मुझे लगने लगा है कि इसे सत्ता से हटाया ही जाना चाहिए।
योगेंद्र जोशी

7. मां की बगिया, अपने ही हाथों, जब निज धरा पर ही उजड़ रही है। कैसे कहें कि भविष्य उज्जवल, विश्वभर में ये बढ़ रही है ।
  डॉ. एम.एल गुप्ता 'आदित्य

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किसी भाषा के साहित्य की रक्षा के लिए उस भाषा का जन संचार में प्रवाह प्राथमिक आवश्यकता है।
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
वेबसाइट- वैश्विकहिंदी.भारत /  www.vhindi.in
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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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