शनिवार, 21 अप्रैल 2018

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिन्दी में हो उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही: अतुल कोठारी


नई दिल्ली: न्यायपालिका के कार्यों में हिन्दी के प्रयोग का चलन शुरू करने की मांग एक बार फिर से उठने लगी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हमें हिन्दी को अपनी अदालतों में लाना चाहिए. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्यवाही होना हर देशवासी के लिए गौरव की बात होगी. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव और भारतीय भाषा अभियान के राष्ट्रीय संरक्षक अतुल कोठारी ने कहा कि भारत की भाषाओं में वे सभी क्षमताएं हैंजो न्यायिक क्षेत्र की किसी भी भाषा में होनी चाहिए. भारत की भाषाओं को न्यायालय  में कामकाज की भाषा बनाने से जुड़ी तकनीकी एवं व्यवहारिक बाधाओं के समाधान भी खोजे जा सकते हैं.
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की ओर से दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय ज्ञानोत्सव में महान्यायवादीपूर्व न्यायाधीश और उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय  के वकीलों समेत विधि क्षेत्र के कई विशेषज्ञ शामिल हुए. इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा भी शामिल हुए. तीन दिन में पांच राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की उपस्थिति ईश्वर की कृपा एवं कार्यकर्ताओं के परिश्रम से संपन्न हुआ.
अतुल कोठारी ने कहा कि देश की बहुसंख्य आबादी अपनी भाषा में संवाद करती है. इसके बावजूद न्यायालयों की भाषा आज भी अंग्रेजी बनी हुई है. न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए यह जरूरी है कि लोगों को उनकी भाषा में न्याय मिले. अपनी भाषा में न्यायिक प्रक्रिया चलेगी तो पारदर्शिता अधिक होगी और लोग न्यायालय के निर्णयों को बेहतर ढंग से समझ एवं आत्मसात कर पाएंगे. 
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि आजादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बावजूद देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में हिंदी में कार्यवाही नहीं होती है. अतुल कोठारी ने कहा कि भारतीय भाषा अभियान की यह मांग है कि जिला सत्र न्यायालयों में लोगों को अपनी भाषा में न्याय मिलना चाहिए. इसके साथ ही उच्च न्यायालय में भी अंग्रेजी के साथ-साथ राज्य के लोगों की भाषा में न्याय मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए.
संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) के उपखंड (क) के तहत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में किए जाने का प्रावधान है. हालांकिइसी अनुच्छेद के खंड (2) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की अनुमति से प्राधिकृत कर सकता है.
कोठारी ने बताया कि उत्तर प्रदेशबिहारराजस्थान और मध्य प्रदेश समेत देश के चार राज्यों के उच्च न्यायालयों को हिंदी में कामकाज के लिए प्राधिकृत किया गया है. जबकिअन्य न्यायालयों में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी में ही की जाती हैं. हालांकिमातृभाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता और यह एक वैज्ञानिक सत्य है. इसके बावजूद अपनी भाषा में न्याय पाने का अधिकार अभी तक लोगों को नहीं मिला है.
 ज़ी न्यूज़ जालस्थल: कड़ी 


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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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शनिवार, 14 अप्रैल 2018

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिंदी के नाम पर पाखंड - डॉ. वेदप्रताप वैदिक


हिंदी के नाम पर पाखंड

- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

ताजा खबर यह है कि विश्व हिंदी सम्मेलन का 11 वां अधिवेशन अब मोरिशस में होगा। मोरिशस की शिक्षा मंत्री लीलादेवी दोखुन ने सम्मेलन की वेबसाइट का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘आज हिंदी की हालत पानी में जूझते हुए जहाज की तरह हो गई है।’ अच्छा हुआ कि उन्होंने डूबते हुए जहाज नहीं कहा। पिछले 70 सालों में यदि हमारी सरकारों का वश चलता तो वे हिंदी के इस जहाज को डुबाकर ही दम लेतीं। स्वतंत्र भारत की सरकारों को कौन चलाता रहा है ? नौकरशाह लोग ! ये ही लोग असली शाह हैं। हमारे नेता तो इनके नौकर हैं। हमारे नेता लोग शपथ लेने के बाद दावा करते हैं कि वे जन-सेवक हैं, प्रधान जन-सेवक! यदि सचमुच जनता उनकी मालिक है तो उनसे कोई पूछे कि तुम शासन किसकी जुबान में चला रहे हो ? जनता की जुबान में ? या अपने असली मालिकों, नौकरशाहों की जुबान में ? आज भी देश की सरकारों, अदालतों और शिक्षा-संस्थाओं के सारे महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में होते हैं। संसद में बहसें हिंदी में भी होती हैं, क्योंकि हमारे ज्यादातर सांसद अंग्रेजी धाराप्रवाह नहीं बोल सकते और उनके ज्यादातर मतदाता अंग्रेजी नहीं समझते। लेकिन संसद के सारे कानून अंग्रेजी में ही बनते हैं। हिंदी के नाम पर बस पाखंड चलता रहता है।

 43 साल पहले जब पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ था, तब मैंने ‘नवभारत टाइम्स’ में संपादकीय लिखा था- ‘हिंदी मेलाः आगे क्या?’ उस संपादकीय पर देश में बड़ी बहस चल पड़ी थी लेकिन जो सवाल मैंने तब उठाए थे, वे आज भी मुंह बाए खड़े हुए हैं। हर विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रस्ताव पारित होता है कि हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की भाषा बनाओ। वह राष्ट्र की भाषा तो अभी तक बनी नहीं और आप चले, उसे संयुक्तराष्ट्र की भाषा बनाने ! घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने !! इस सम्मेलन पर हमारे विदेश मंत्रालय के करोड़ों रु. हर बार खर्च हो जाते हैं लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता। 

हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज स्वयं हिंदी की अनुपम वक्ता हैं और मेरे साथ उन्होंने हिंदी आंदोलनों में कई बार सक्रिय भूमिका निभाई है लेकिन वे क्या कर सकती है ? हिंदी के प्रति उनकी निष्ठा निष्कंप है लेकिन वे सरकार की नीति-निर्माता नहीं हैं।वे सरकार नहीं चला रही हैं। सरकार की सही भाषा नीति तभी बनेगी, जब जनता का जबर्दस्त दबाव पड़ेगा। लोकतंत्र की सरकारें गन्ने की तरह होती हैं। वे खूब रस देती हैं, बशर्ते कि उन्हें कोई कसकर निचोड़े, मरोड़े, दबाए, मसले, कुचले ! यह काम आज कौन करेगा ?


वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई


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