शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] हिंदीः अ से ह तक और हिंदी में समाहित अध्यात्म, दिव्यता, दर्शन, योग, ज्ञान और विज्ञान – डॉ.मृदुल कीर्ति, 'राजभाषा गौरव' पुरस्कार प्राप्त करते डॉ. एम.एल. गुप्ता आदित्य, वीडियो



हिंदीः अ से ह तक 

और हिंदी में समाहित अध्यात्म, दिव्यता, दर्शन, योग, ज्ञान और विज्ञान

 – डॉ.मृदुल कीर्ति




आध्यात्मिक और दिव्य पक्ष  – संस्कृत देव भाषा है, हिंदी संस्कृत से ही निःसृत दिव्य भाषा है, देव वाणी है ।
‘ अक्षरानामकारोस्मि’ गीता १०/३३वर्णमाला में सर्व प्रथम ‘अकार ‘ आता है।  स्वर और व्यंजन के योग से वर्ण माला बनती हैं।  इन दोनों में ही ‘अकार’ मुख्य है।  ‘अकार’ के बिना अक्षरों का उच्चारण नहीं होता। ‘अक्षरों में अकार मैं ही हूँ’ वासुदेव का यह उदघोष दिव्यता को स्वयं ही उदघोषित और प्रतिष्ठापित करता है। बिना अकार के कोई अक्षर होता ही नहीं है। गीता में स्वयं श्री कृष्ण ने ‘अकार’को अपनी विभूति बताया है। अक्षरों में ‘अकार’ मैं ही हूँ, अकार वर्ण की ध्वनि संचेतन शक्ति है जो वर्णों में प्राण प्रतिष्ठा करती है और उस शक्ति अधिष्ठाता स्वयं ब्रह्म है अतः ‘अकार’ ब्रह्म की विभूति है। दिव्य लक्षणों से युक्त होने के कारण ही इसे ‘देव नागरी ‘ कहते हैं।
‘अकारो वासुदेवस्य’
‘अकार’ नाद तत्व का संवाहक है। ‘अकार’ के बिना शब्द सृष्टि आगे नहीं चलती और ध्वनि तरंगों से अकार ध्वनित होता है।
भागवत – भागवत में लिखा है कि ‘सर्व शक्तिमान ब्रह्मा जी ने ‘ॐ कार ‘ से ही अन्तःस्थ (य र ल व् ) ऊष्म (श ष स ह ) स्वर (अ से औ तक) स्पर्श (क से म ) तथा (ह्रस्व और दीर्घ) आदि लक्षणों से युक्त अक्षर साम्राज्य अर्थात वर्ण-माला की रचना की ।वर्ण माला के दो भाग हैं – स्वर तथा व्यंजन ।
ऋग्वेद के अनुसार  – स्वर्यंत शब्दयंत अति स्वराः
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता। अन्य वर्ण की सहायता के बिना बोले जा सकने वाले वर्ण स्वर हैं। व्यंजन बिना स्वर की सहायता के नहीं बोले जा सकते हैं। व्यंजन में’ अकार ‘ मिलता है, तब ही आकार मिलता है। ‘अक्षर ‘ में प्राण प्रतिष्ठा नाद से होती है और नाद ब्रह्म है। अक्षरों में अकार स्वयं वासुदेव हैं। तब इसका नाश करने वाला भला कौन है। हिंदी में ‘अ’ का अर्थ नहीं और ‘क्षर’ का अर्थ नाश है। अक्षर अर्थात वह तत्व जिसका नाश नहीं होता। अक्षर अपने में ही पूर्ण शाश्वत इकाई है। अक्षरों का क्षरण नहीं होने के कारण ही अक्षर को सृष्टि कर्ता माना गया है। अक्षर को वर्ण भी कहा जाता है। स्वर और व्यंजन के मिलने से ही शब्द सृष्टि का निर्माण होता है।
‘अकारो वासुदेवस्य उकारस्त पितामहः’
वर्ण  – व्–र–ण
व् -पूर्ण, र -प्रवाह, ण -ध्वनि =अर्थात वर्ण वह तत्व है जिसमें पूर्णता है, ध्वनि है और ध्वनि का प्रवाह है।
वर्ण विचार – orthography
शब्द विचार  – etymology
वाक्य विचार – syntax
दार्शनिक पक्ष : पञ्च तत्वों में आकाश सर्वाधिक विराट, विस्तृत और बृहत है. व्योम की तन्मात्रा ‘नाद’ है और ‘नाद ब्रह्म है’। सारे ही वर्ण ध्वनि जगत का विषय है और ध्वनि पर ही आधारित हैं। यही नाद अथवा ध्वनि शब्द सृष्टि का आदि कारण है। नाद ब्रह्म के साधक आचार्य पाटल हैं। पञ्च तत्वों की तन्मात्राओं में आकाश का नाद तत्व सबसे अधिक सूक्ष्म और अनुभव गम्यता की परिधि में आता है। यह सूक्ष्म रूप में सकल आकाश में व्याप्त नाद उर्जा है। नाद ऊर्जा की शक्ति से ही बादलों की गर्गढ़ाहट और बिजली की चमक की ध्वनि हम तक आती है क्योंकि ध्वनि तरंगों में ही प्रकाश उर्जा का भी वास है। ब्रह्माण्ड और तरंगों से संचालित यह अनूठा जगत है , इसमें तरंग वाद है। नाद कर्ण इन्द्रिय का विषय है। किन्तु जिसका प्रभाव पूरे ही मन , देह और चेतना पर होता है। वचन का प्रभाव जन्मों-जन्मों तक पीछा करता है। तभी कहा है कि वाणी की पवित्रता का नाम सत्य है। अक्षरों की दार्शनिकता को थोड़ा और गहराई से देखते हैं। अब हमें इनके उच्चारण में यौगिक पक्ष भी मिलता हैं।
यौगिक पक्ष – प्राण वायु के संतुलन और प्रश्वास-निःश्वास के नियमन को योग कहते हैं।  हिंदी का इससे क्या सम्बन्ध है, आइए देखते हैं।
नाभी से लेकर कंठ तक वाणी के मूल केंद्र है। नाभी से ही बालक को गर्भ में पोषण मिलता है। मेरुदंड के अष्ट चक्रों की संरचना में नाभी के क्षेत्र को मणिपुर क्षेत्र कहा गया है। इस बिंदु पर अनेकों शक्ति रूपी मणियों के केंद्र है , कुण्डलिनी आदि।  उन्हीं में एक वाणी तंत्र है। लगता है कि वाणी कंठ से निकल रही है किन्तु मूल नाभी में है। आईये इसे स्वयं करके ही पुष्ट करते हैं :
आप ‘अ ‘ बोलिए – अब अनुभव करिए कि आपकी नाभी अवश्य हिलती है। यही ‘अकार’ का उद्भव केंद्र है। जैसा कि पहले कहा है कि बिना ‘अकार’ के वर्ण आकार नहीं ले सकते। आपके बोलने की चाह करते ही नाभी केंद्र उतेजित होता है और यहीं प्राण वायु के सहारे से क्रमशः कंठ और होठों तक ऊपर जाते हुए स्वरों का स्वरुप ही भाषा और वार्तालाप बनता है।
एक और महत्वपूर्ण अनुभव करिए – अ से अः तक बोलिए तो नाभी से उतेजित वाणी तंत्र क्रमशः कंठ तक जाता है।
जो सबसे पहले नाभी पर दबाब पड़ता है। वह ‘कपाल भाती’ का ही रूप है । अं भ्रामरी का रूप है। अः श्वास को बाहर निकलने का रूप है। हिन्दी और संस्कृत बोलने में प्राण वायु का सामान्य से कहीं अधिक प्रश्वास और निःश्वास होता है यह प्राणायाम का स्वरुप है। मस्तिष्क को नासाछिद्र के श्वसन प्रक्रिया प्रभावित करते हैं । जब चन्द्र बिंदु का उच्चारण होता है तो इसकी झंकार की तरंगें मस्तिष्क के स्नायु तंत्र तक जाती हैं। विसर्ग का उच्चारण नाभि क्षेत्र से ही है बिना नाभी का क्षेत्र हिले स्वः नहीं बोला जा सकता है।
हिंदी के वर्णों का समायोजन अद्भुत है। वर्गों में विभाजित वर्गीकरण कितना वैज्ञानिक है। यह देखने योग्य है।
कंठ - क वर्ग क ख ग घ इस वर्ग का उच्चारण कंठ मूल से है।
तालु - च वर्ग च छ ज झ इस वर्ग का उच्चारण तालु से है।
मूर्धा - ट वर्ग ट ठ ड ढ ण इस वर्ग का उच्चारण मूर्धा (जीभ के अग्र भाग ) से है।
दन्त - त वर्ग त थ द ध न इस वर्ग का उच्चारण दोनों दांतों को मिलाने से होता है।
होंठ - प वर्ग प फ ब भ म इस वर्ग का उच्चारण दोनों होठों को मिलाने से ही होता है।
हमारे शरीर में दो प्रकार की प्राण और अपान नाम की वायु (वातः ) चल रही है। इन सबका संयमन और नियमन का समीकरण इस पद्धति में है। यह हिंदी के ‘यौगिक पक्ष’ की पुष्टि है। हिंदी भाषा के मनोवैज्ञानिक, निर्दोष और व्याकरण के शाश्वत आधारों की पुष्टि है। पुरातन भाषाविद के मनीषियों की अद्भुत ज्ञान की ज्ञान प्रवणता को नमन है।
ज्ञान पक्ष – जैसे बीज में चैतन्य समाहित वैसे हिंदी के प्रत्येक शब्द में उसके भाव के गहरे अर्थ समाहित है। जहाँ तक नाद है वहाँ तक जगत है। हिंदी के शब्दों के मूल उदगम स्रोत में जाओ, चकित कर देने वाले तथ्य मिलेंगें। सारे जीवन जिन शब्दों का प्रयोग तो किया पर वह किन पदार्थों से बने और क्या भावार्थ हैं इनसे अनजान रहे । निहित अर्थों को जान कर अधिक आनंद पा सकते हैं।
हिंदी का प्रत्येक शब्द गूढ़ अर्थ गर्भा है। बीज की तरह है जिसमें कथित आशय के बीज समाहित हैं। सार्थक शब्दों और समाहित भावों के अगणित शब्द हैं। कुछ को देखिये :
प्रकृतिः  कृति अर्थात रचना, प्र – कृति से प्रथम भी कोई है । अर्थात प्रभु ।
भगवान्:  भ – भूमि, ग  – गगन, व – वायु, अ  – अग्नि , न – नीर = भगवान् = अर्थात जो पञ्च तत्वों का अधिष्ठाता है उसे भगवान् कहते हैं।
विष्णु :    वि  – विशुद्ध , ष्णु  – अणु = विष्णु , अर्थात जिसका अणु-अणु विशुद्ध है।
खग :     ख – आकाश, ग – गमन = अर्थात जो आकाश में गमन करता है।
पादप :   पाद – पग, अपः – जल = जो पग से जल पीता है अर्थात पादप, उदाहरण के लिए वृक्ष ।
अग्रज :  अग्र – पहले , ज – जन्म = पहले जिसका जन्म हुआ हो अर्थात बड़ा भाई।
अनुज :  अनु – अनुसरण, ज – जन्म = अर्थात छोटा भाई।
वारिज :  वारि -जल, ज – जन्म = जल में जो जन्मा हो अर्थात कमल, नीरज , जलज , अम्बुज भी इन्ही अर्थों के अनुमोदन हैं।
वारिद :  वारि – जल, द – ददातु अर्थात देने वाला = जो जल देता है अर्थात बादल, जलद, नीरद, अम्बुद भी यही अर्थ देते हैं।
जगत :   ज – जन्मते, ग – गम्यते इति जगस्तः – अर्थात वह स्थान जहाँ जन्म होता है और जहाँ से गमन होता है = वह जगत कहलाता है।
अर्थ गर्भा शब्दों के विस्तार में जाओ तो स्वयं में ही एक ग्रन्थ बन जाए, इस लेख में इनका विस्तार कदापि संभव नहीं। मात्र कुछ शब्द पुष्टि के लिए है कि हिंदी कितनी रत्न गर्भा है, कितनी गूढ़ गर्भा है। सभी ज्ञान शब्दों में ही तो समाहित हैं। प्रत्येक अक्षर का एक अधिष्ठित देवता भी है अतः कोई अकेला अक्षर भी पूरा दर्शन और अर्थ का पर्याय है।जैसे :
अ का अर्थ ना है – अजर , अमर, अपूर्ण अर्थात जो जर्जर न हो, मरे नहीं, पूरा न हो आदि।
पांच बाल सनकादिक मुनियों ने ब्रम्हा से जब ज्ञान लिया तो ब्रह्मा जी ने तीन बार केवल ‘द’ ; द;  ‘द’ ही कहा जो दान, दया और दमन का सन्देश है।
वैज्ञानिक पक्ष : वर्ण माला का यह वैज्ञानिक पक्ष तो महा अद्भुत है, सच कहें तो विस्मयकारी है।
अ से ह का संतुलन, जिसमें एक बार अकार है तो एक बार वर्ण का अंतिम अक्षर हकार आता है।
अकार और हकार का संतुलन और संयोजन – अकार में कोमल और हकार में कठोर का निरूपण है। एक बार कोमल और एक बार कठोर है। प्रत्येक वर्ग में पहला वर्ण वाद दूसरा प्रतिवाद तीसरा संवाद और चौथा अगति वाद है।
क ख ग घ   -   ka kha ga gha
च छ ज झ   -   cha chha ja jha
ट ठ ड ढ     -   ta thha da dhha
त थ द ध     -   ta tha da dha
प फ ब भ    -   pa pha ba bha
‘अ’ से ‘ह’ तक : अ’ से ह तक के सूत्र को यदि मिलाओ तो अहं बनता है। वस्तुतः सृष्टि संरचना का मूल भी अहं ही है यहाँ अहं का अर्थ सात्विक है। जो अस्तित्व में आने का द्योतक है। अर्थात किसी तत्व का अस्तित्व में आना । इसी अर्थ में सृष्टि संरचना हुई तो यही सात्विक अर्थ का निरूपण हिंदी के अस्तित्व की संरचना का निरूपण करती है। वह सृष्टि संरचना है तो यह शब्द सृष्टि संरचना है।
                                                                                                    हिंदी अ से ह तक – अर्थात अस्तित्व में आना।
अ और ह के ऊपर बिंदु लगते ही अहं होता है। यह बिंदु विस्तृत अर्थों में शून्य होने का द्योतक है। संकुचित अर्थों में अभिमान का द्योतक है। अहं अस्तित्व के अर्थ में कभी जाता नहीं है, इसे किसी उच्चतर में लय करना होता है।  इसका पूर्ण विलय कभी नहीं होता।
एक से एक बढ़कर प्रकांड भाषाविद , पाणिनी जैसे व्याकरण के प्रणेता ने अद्भुत ज्ञान भारतीय संस्कृति को दिया।  जिसका एक अंश भी हम ठीक से समझ भी नहीं पाते हैं।  हम भाषा विज्ञान ज्ञान की अकूत सम्पदा संजोये हुए है।  हिन्दी का मूल्यांकन, सच पूछो तो किसी में कर पाने की क्षमता भी नहीं। राजनैतिक दांव पेंच, वोट की कुटिल नीति की बहुत बड़ी कीमत हमारी संस्कृति और भाषा को चुकानी पड़ रही है। अभी भी देर नहीं हुई है, क्योंकि जागरूक होते ही शक्ति संचरित होने लगती है। अब तो कंप्यूटर की तकनीक से सब कुछ सरल और सहज हो गया है। कंप्यूटर की तकनीक में संस्कृत को सर्वाधिक अनुकूल माना गया है। प्रवासी जो भी हिंदी प्रेमी है , कभी एक -एक रचना को लालायित रहते थे। आज एक क्लिक से सभी महाग्रंथ सुलभ है। अतः हिंदी का वि
कास, रूचि और सजगता अब प्रगति पर ही है। हिंदी से ही तो ‘मौलिक’ भारत का परिचय और अस्तित्व मुखरित है। हमें गर्व है कि हिंदी जैसी दिव्य भाषा हमारी भाषा है।  
 डॉ.मृदुल कीर्ति
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14 सितंबर 2018 को मा. उपराष्ट्रपति जी से
 'राजभाषा गौरव' पुरस्कार प्राप्त करते डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
murarkasampatdevii@gmail.com  
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] मा. प्रधानमंत्री जी की अध्यक्षता में आयोजित 31वीं केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक में हुई वार्ता तथा बैठक हेतु भेजे गए सुझाव। - प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी , सदस्य, केंद्रीय हिंदी समिति।




मा. प्रधानमंत्री जी की अध्यक्षता में आयोजित 31वीं
केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक में हुई वार्ता।



प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी 




                केन्द्रीय हिन्दी समिति की 31वीं बैठक 6-09-2018 को माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की अध्यक्षता में उन्हीं के निवास पर संपन्न हुई। इस बैठक में गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह के अतिरिक्त मानव संसाधन विकास मंत्रीरेल मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, गृह राज्य मंत्री, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री; गुजरात, हिमाचल प्रदेश तथा अरुणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री, संसदीय राजभाषा समिति के सांसद-संयोजक और भारत के विभिन्न भागों से आए आठ विद्वान (गैर-सरकारी सदस्य) थे। समिति के सदस्य-सचिव और राजभाषा विभाग,भारत सरकार के सचिव श्री शैलेश ने समिति का परिचय दिया। गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने प्रधान मंत्री और सदस्यों का स्वागत करने के बाद बैठक का संचालन किया। इसके बाद केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा प्रकाशित गुजराती-हिन्दी कोश का लोकार्पण माननीय प्रधान मंत्री ने किया। तत्पश्चात, सदस्य-सचिव श्री शैलेश ने समिति की 30वीं बैठक का कार्यवृत्त प्रस्तुत किया जिसको संपुष्ट किया गया। इसके बाद वर्तमान समिति के सदस्यों द्वारा दिए गए प्रस्तावों में से मात्र तीन गैर-सरकारी सदस्यों के प्रस्ताव रखे गए। इन प्रस्तावों में मेरे चार प्रस्ताव थे, जबकि मैंने कई प्रस्ताव भेजे थे। प्रो दिलीप कुमार मेधी (गुवाहाटी) के दो प्रस्ताव थे और प्रो गिरीश्वर मिश्र (वर्धा) का एक ही प्रस्ताव रखा गया था। राजभाषा विभाग ने बैठक से पहले इन प्रस्तावों पर विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों से अपनी-अपनी टिप्पणी प्राप्त कर ली थी। बाद में गृह मंत्री ने चर्चा के लिए अनुमति प्रदान की। संसदीय राजभाषा समिति के उपाध्यक्ष श्री सत्य नारायन जटिया तथा समिति के तीन संयोजकों – श्री प्रसन्न कुमार पाटसाणी, अजय मिश्र टेनी और श्री हुकुम नारायण सिंह यादव ने भारत सरकार के कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों,  निगमों आदि में हिन्दी की स्थिति बताते हुए उनमें आ रही कठिनाइयों का ब्योरा दिया। श्री पाटसाणी ने न्यायालयों में हिन्दी को लागू करने की बात भी कही।  
सांसदों के वक्तव्यों के बाद गृह मंत्री ने मुझे (प्रो.गोस्वामी) को अपना वक्तव्य देने के लिए कहा। मैंने प्रधान मंत्री, गृह मंत्री और अन्य सदस्यों को संबोधित करते हुए यह निवेदन किया कि मैंने एक साल पहले 25 प्रस्ताव भेजे थे और अभी 3-4 दिन पहले नौ प्रस्ताव और भेजे थे। पहले के 25 प्रस्तावों में से चार प्रस्ताव कार्यसूची में दिए गए हैं। अपने प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए मैंने कहा कि हाई स्कूल के स्तर पर सभी स्कूलों में शिक्षा माध्यम के रूप में मातृभाषा को अनिवार्य किया जाए, क्योंकि मातृभाषा से बच्चों की सर्जनात्मक शक्ति का विकास होता है और विषय को समझने में आसानी होती है। साथ ही हिंदीतर भाषी राज्यों में विषय के रूप में हिन्दी अनिवार्यत: पढ़ाई जाए ताकि संविधान की अपेक्षा के अनुसार हिन्दी संघ की राजभाषा का दायित्व निभा सके।
दूसरे प्रस्ताव पर मैंने कहा कि देश में कुछ राज्यों में केंद्रीय एवं स्टेट विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, टेक्नॉ लॉजी, विज्ञान आदि में शिक्षा माध्यम की व्यवस्था अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी या मातृभाषा में की जाए। साथ ही इन विषयों की शिक्षण-सामग्री भी हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में तैयार कराई जाए। इससे छात्रों की सर्जनात्मक शक्ति के साथ-साथ उन्हें विषय को समझने मे सहायता मिले गी और इन विषयों का अधिकाधिक विकास भी होगा। इसी के साथ मैंने इस बात को भी उठाया कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल में इन विषयों का हिन्दी में प्रशिक्षण और अनुवाद हो रहा है, लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ और प्रयोगशालाओं के न होने के कारण बहुत ही असुविधा और अड़चन पड़ रही है। यदि यह व्यवस्था की जाती है तो इन विश्वविद्यालयों में सुचारू रूप से काम हो पाए गा।
तीसरे प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि अधिकतर प्रोफेशनल पाठ्यक्रम अंग्रेज़ी में पढ़ाए जाते हैं, लेकिन हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में ये पाठ्यक्रम नगण्य हैं। यदि हिन्दी या भारतीय भाषाओं में प्रोफेशनल कोर्स नहीं होंगे तो युवा वर्ग अपना प्रोफेशनल कॅरियर नहीं बना पाए गा। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमें अपनी भाषाओं को रोजगारपरक बनाना है ताकि युवा वर्ग अपनी भाषाओं की ओर आकर्षित हो सके।
चौथे प्रस्ताव में ज़्यादातर वेबसाइट केवल अंग्रेज़ी में होने की बात को उठाया। अगर हिन्दी में है भी तो वे अधिकतर गूगल से अनूदित होते हैं जो प्राय: सही नहीं होते। इनकी वेबसाइट भी अलग-अलग हैं। इस लिए कार्यालयों की सामग्री हिन्दी या अंग्रेज़ी के बजाय द्विभाषिक हों तो उनका उपयोग अवश्यकतानुसार किया जा सके गा।
इसके बाद मैंने अपने अलग से भेजे गए प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत सरकार के 18 मंत्रालयों/विभागों में निदेशक (राजभाषा) के स्वीकृत पद हैं। इन 18 पदों में से 14 मंत्रालयों में निदेशक के पद काफी समय से खाली पड़े हैं और इस समय केवल 4 पद भरे हुए हैं। इन्हें तत्काल भरने का अनुरोध करते हुए कहा कि इन पदों के अभाव में राजभाषा हिन्दी के विकास और उन्नयन में रुकावट आ रही है। इसके साथ यह भी अनुरोध किया कि राजभाषा विभाग के प्रशिक्षण संस्थान और अनुवाद ब्यूरो जैसे अधीनस्थ कार्यालयों में कार्यरत प्राध्यापक, अनुवादक, सहायक निदेशक आदि कर्मचारियों और अधिकारियों को पिछले 20-25 वर्षों से कोई पदोन्नति नहीं दी गई है। इससे इन अधिकारियों में असंतोष, हताशा और फ्रस्ट्रेशन पैदा हो रहा है। इनकी पदोन्नति की प्रक्रिया तुरंत लागू की जाए ताकि राजभाषा के विकास में गति आ सके। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के बारे में भी मेंने निवेदन करते हुए कहा कि जिस निदेशालय के शब्दकोश का लोकार्पण अभी-अभी प्रधान मंत्री जी ने किया है, उसमें सन् 2007 से निदेशक का पद रिक्त पड़ा है। इसमें समय-समय पर किसी अन्य अधिकारी को दो-तीन वर्ष के लिए अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है जिसके कारण काम में गति नहीं आ रही। इसके साथ ही मैंने यह भी कहा कि इसी निदेशालय में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद कई पद काफी समय से रिक्त पड़े हैं, उन्हें अभी तक भरा नहीं गया। स्थायी निदेशक और स्टाफ की कमी के कारण निदेशालय के कार्यों की गति में भी काफी कमी आ गई है। इसलिए इस संबंध में तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है। अंत में मैंने प्रधान मंत्री जी से यह भी  निवेदन किया कि आप देश के विकास में इतना परिश्रम कर रहे हैं, इस लिए हिन्दी और भारतीय भाषाओं का  विकास और प्रयोग होगा तो देश के विकास में और अधिक सहायता मिले गी।     
हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र और प्रो. गोस्वामी का ऑन-लाइन सेवाओं को हिन्दी में उपलब्ध कराने का प्रस्ताव एक-साथ था। बैठक में प्रो. मिश्र ने हिन्दी के संवर्धन और उसमें गति लाने के लिए हिन्दी अध्ययन हेतु अंतर-विश्वविद्यालयी केंद्र बनाने का प्रस्ताव रखा। साथ ही हिन्दी भाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं के परस्परिक अनुवाद का केंद्र स्थापित करने और उसमें हिन्दी विश्वविद्यालय को न्यूक्लियस (Neucleus) विश्वविद्यालय के रूप में रखने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की गतिविधियों के बारे में बताते हुए विश्वविद्यालय में अपेक्षित संसाधनों और भौतिक सुविधाओं के न होने के कारण उसके समुचित संचालन में आ रही कठिनाई की बात रखते हुए मिश्र जी ने उसे अन्य विश्वविद्यालयों की भाँति सुविधाएं प्रदान करने का अनुरोध भी किया।  
कोच्चिन के प्रो. अरविंदाक्षन ने कहा कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी बैठक में आमंत्रित किया जाए ताकि वे हिन्दी के परिप्रेक्ष्य में इन विषयों की आवश्यकता को बता सकें। गुवाहाटी के प्रो. दिलीप कुमार मेधी ने प्रत्येक विश्वविद्यालय के हिन्दी शोध-प्रबंध (पी.एच-डी)  का माध्यम हिन्दी ही रखने का प्रस्ताव रखा, क्योंकि कुछ विश्वविद्यालयों में हिन्दी का शोध कार्य अंग्रेज़ी में होता है। साथ ही देश के हर महाविद्यालय में हिन्दी विभाग खोलने की व्यवस्था करने के लिए आग्रह भी किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. मोहन ने कहा कि विश्वविद्यालयों में हिन्दी के कई पद रिक्त पड़े हैं,इन्हें तुरंत भरने की व्यवस्था की जाए। इसके साथ प्रो. मोहन विश्व हिन्दी सम्मेलनों की चर्चा करते हुए यूरोप में भी हिन्दी सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। प्रो जोहरा अफजल ने कश्मीर के स्कूलों में हिन्दी की दुर्दशा पर चर्चा करते हुए उस राज्य में हिन्दी को गंभीरता से लागू करने की बात कही। सुश्री प्रतिभा राय ने उड़ीसा के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की उपेक्षा पर चर्चा करते हुए हिन्दी शिक्षण पर समुचित ध्यान देने पर बल दिया। प्रो. निर्मला जैन ने यह अपील की कि हिन्दी के प्रति अति उत्साह न दिखाते हुए अन्य भारतीय भाषाओं को भी ध्यान में रखा जाए।
सभी वक्तव्यों के बाद माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हिन्दी के स्वरूप को क्लिष्ट न बनाया जाए। सामाजिक हिन्दी (अर्थात बोलचाल की हिन्दी) और कार्यालयी हिन्दी में अधिक अंतर न हो और इन दोनों में अधिक निकटता होनी चाहिए। हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं से पारिभाषिक शब्द लेने चाहिए ताकि हिन्दी देश के सभी लोगों के लिए सहज और सुगम हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि बैठक में जो बातें रखी गई हैं, उन्हें कार्यान्वित करने का प्रयास किया जाए।
अंत में गृह राज्य मंत्री श्री किरण रिजिजु ने धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया। बैठक में सभी सदस्यों ने अपनी-अपनी बात तो रखी, लेकिन चर्चा-परिचर्चा नहीं हो पाई।
बैठक की समाप्ति के बाद मैंने प्रधान मंत्री जी को अपना ‘’अंग्रेज़ी-हिन्दी पदबंध कोश’’ भेंट करते हुए कहा कि यह पदबंध पहला द्विभाषिक कोश है और दिगंबर जैन मुनि आचार्य विद्या सागर ने इस कोश को पढ़ कर मुझे आशीर्वाद भी दिया। इसके अतिरिक्त मैंने अपने दो आलेख शिक्षा के माध्यम की भाषा: मातृभाषा और राष्ट्र, राष्ट् रीय चेतना और राष्ट्रभाषा हिन्दी’’ देते हुए कहा कि अगर आपके पास समय हो तो इन्हें पढ़ लें। यह मेरे लिए हर्ष का विषय है कि उन्होंने कहा कि मैं इन्हें ज़रूर पढ़ूँगा। कुछ मिनटों की यह व्यक्तिगत बातचीत बड़ी सुखद रही।

                                                     प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी  

परिशिष्ट
    (27-07-2017 को सचिव, राजभाषा विभाग को भेजे गए 25 प्रस्ताव)   
केंद्रीय हिंदी समिति की आगामी 31वी बैठक हेतु
प्रस्तुत किए गए सुझाव

1.         हाई स्कूल के स्तर पर सभी स्कूलों में (सर कारी एवं निजीशिक्षा माध्यम के रूप में मातृभाषा को अनिवार्य  किया जाना चाहिए। इसके साथ हिं दीतर भाषा-भाषियों को एक विषय के रूप मेंहिंदी अनिवार्यतपढ़ाई  जानी चाहिए ताकि संविधान की अपे क्षानुसार हिंदी संघ की राजभाषा  के नाते संघ की संपर्क भाषा बन  सके।

2.         अधिकतर प्रोफेशनल पाठ्यक्रम अंग्रेजी में पढाए जाते हैंलेकिन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओ में यह नगण्य हैं। यदि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओ में प्रोफेशनल पाठ्यक्रम नहीं होंगे तो युवा वर्ग अपना प्रोफेशनल करियर नहीं बना पाएगा। इस संबंध में गंभीरता से विचार करने और उसे लागू करने की आवश्यकता है।

3.         देश के कुछ राज्यों के केंद्रीय विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, टेक्नॉ लॉजी आदि वैज्ञानिक विषयों के लिए शिक्षा माध्यम हिन्दी या मातृभाषा की व्यवस्था शिक्षा-माध्यम के रूप में की जाए। इन विषयों की शिक्षण-सामग्री भी हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में तैयार कराई जाए।    

4.         हिंदी भाषा परिवार की बोलियों के भाषा-भाषी अपनी-अपनी बोलियों को संविधान की अष्टम अनुसूची में हिंदी के समकक्ष स्थान देने के लिए माँग कर रहे हैं और करेंगे।  इससे हिंदी भाषा परिवार का विघटन होगा और हिंदी का अस्तित्व संकट में पड़  जाएगा। इससे  भारत की एकता और अखंडता में  खतरा पैदा होगा। इसलिए हिंदी भाषा परिवार की किसी भी बोली को अष् टमअनुसूची में  जोड़ा जाए।

5.         हिन्दी भाषा परिवार की बोलियों को साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को गुणवत्ता के आ धार पर शामिल कर लिया जाए ताकि  बोलियों के साहित्यकारों के श् रेष्ठ साहित्य को भी सम्मान एवं प्रोत्साहन मिल सके। इससे बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची से अलग रखा जा सकेगा। 
6.  उच्च न्यायालयों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में निर्णय और आदेश देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 348 में सुनिश्चित प्रावधान हैतथापि उस प्रावधान के विपरीत भारत सरकार ने उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की परिपाटी चलाई हैजिसके फलस्वरूप यथास्थितिवादी उच्चतम न्यायालय न तो उच्चतम न्यायालय में हिंदी के प्रयोग का विकल्प मान रहा है और न ही उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओँ के प्रयोग का मार्ग खुलने दे रहा हैयह राष्ट्रपति जी के तत्संबंधी आदेशों के विपरीत हो रहा है |
7.  केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), आयकर अपीलीय अधिकरण और रेल दावा अधिकरण सहित सभी अधिकरणों की भाषा अंग्रेजी रखी गई हैजोकि संविधान के भाषा संबंधी प्रावधानों के अनुकूल नहीं हैइन अधिकरणों के लिए इस प्रावधान की अपेक्षा की जाती है कि अधिकरण की भाषा हिंदी होगी किंतु सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है|
8.  भाषा-प्रौद्योगिकी के वे सभी उप करण जिन पर भारतीय भाषाओं में का र्य की सुविधा उपलब्ध है या करवा या जाना संभव है, उन्हें भारतीय  भाषाओं में कार्य करने की सुविधा एवं  उपयोग-विधि के साथ ही भारत में बिक्री की अ नुमति दी जाए। साथ ही भारतीय भा षाओं में सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी सुविधाओं के लिए एक ऐसी संस्था गठित की जाए जो स्वतसंज्ञान लेकर प्रत्ये क नईप्रणाली/उपकरण आदि पर हिंदी  तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सु विधाओं के लिए अविलंब कार्रवाई  प्रारंभ कर सके।
9.   केंद्र सरकार के अंतर्गत आ ने वाली सभी मंत्रालयों विभागों  और उनके अधीनस्थ संस्थानों / का र्यालयों आदि द्वारा दी जाने वा ली सभी ऑनलाइन सुविधाएँ केवल अं ग्रेजी में उपलब्ध हैं, यदि कहींभारतीय भा षाएं हैं भी तो वे पूर्णतया नहीं हैं। इन्हें केवल औपचारिकता के लिए नहीं बल्कि पूर्ण रूप से हिंदी में तथा आवश्यकतानुसार  अन्य भारतीय भाषाओं में करवाया जाने की व्यवस्था की जानीचाहिए  ताकि प्रयोग करनेवाला व्यक्ति  प्रयोग कर सके।  - प्रशासन के अंतर्गत बनने वाले सभी कंप्यूटर  सॉफ्टवेयर  प्रणाली आदि में भी इसी प्रकार अनिवार्य रूप से पू र्णतया हिंदी तथा स्थानीयभाषाओं  की व्यवस्था की जानी चाहिए। अन् यथा  – प्रशासन अंग्रेजी प्रशा सन बन कर जनता से कट जाएगा। उल् लेखनीय है कि भीम ऐप, सारथी और  वाहन, अमंग ( Unpoint  Mobile Platform) ,एटीएम से मिलने वाले संदेश आदि  में काफी कुछ अंग्रेजी में हो ने से अंग्रेजी  जाननेवाले इनका उपयोग नहीं कर पाते।

10.  भारत सरकार और इसके अंतर् गत आने वाले उपक्रमों, स्वायत्त  संस्थानों आदि द्वारा अधिकांश कार्य आईटी सोल्यूशन ईआरपी सॉफ् टवेयरकोर बैंकिंग सोल्यूशन आदि के माध्यम से किया जाताहै, जो प्रायअंग्रेजी में है। यदि उन में कहीं हिंदी में कार्य करने  की सुविधा है भी तो प्राय: अति  सीमित, नाम की, (केवल औपचारिकताओं के निर्वाह के लिएवह प्रयोग नहीं की जा रही ।  जिसकेकारण इनके माध्यम से जन ता को सूचनाएँ या जनता का कोई भी काम हिंदी में नहीं हो पाता। इ सलिए ऐसी व्यवस्था की जाए कि इन के माध्यम से तमाम आउटपुट हिंदी  अंग्रेजी द्विभाषी रूप मेंउप लब्ध हो  ताकि जनता अपनी सुविधा से उसका लाभ उठा सके।

11.  इसी प्रकार ज्यादातर वेबसा इट केवल अंग्रेजी

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारका, विश्व वात्सल्य मंच
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लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
मो.: 09703982136