विश्व हिंदी सम्मलेन हेतु कुछ विचार-बिंदु
प्रवीण रघुवंशी...
समय की मांग है कि हम सब हिंदी -प्रेमीगण अपने सम्मिलित प्रयासों से हिंदी के विभिन्न शक्ति-बिन्दुओं को पहचाने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से न सिर्फ भारत में अपितु समस्त विश्व में उसे उसके योग्य पद तक पहुंचाएं। हिंदी के प्रचार, प्रसार और प्रयोग के लिए आवश्यक है कि हम अपने प्रयासों में कॉर्पोरेट समूह की फुर्ती और प्रबंधन की कला को अपनाएं अन्यथा शायद वांछित परिणाम नहीं मिल पाएंगेl समयबद्ध कार्य-योजनाएं बनायीं जाएँ और उनका कार्यान्वन तर्कसम्मत लक्ष्य तक समयबद्ध तरीके से किया जायेl
यह आवश्यक है कि अनेक कंप्यूटर-साधित सॉफ्टवेयर बनाये जाएँ जिससे हिंदी का प्रचलन और भी आसान हो सके। विभिन्न संघठनो द्वारा विकसित भाषा-उपकरण न सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित हो अपितु उसे जन-मानस के लिए सुलभ कराया जायेI
हिंदी सिर्फ एक सरकारी भाषा बन के न रह जाये अपितु लोग उसे सहर्ष एक अत्यंत सरल एवं उपयोगी माध्यम के रूप में स्वीकारें, इस के लिए जरुरी है कि हम हिंदी भाषा को प्रभावशाली ढंग से अन्य भाषा बोलने वालों के दिलों को जीतें और हिंदी की सरलता और उसकी उपयोगिता को समझाएं। इसके लिए आवश्यक है कि हम भाषा-युग्म (language-pair) को लेकर देश-विदेश में अपने साहित्य, विज्ञान, मनोरंजन और अन्य विशेषताओं के द्वारा दूसरी भाषाओँ एवं क्षेत्र के जन-मानस से संपर्क साधित करें। विदेशों में हिंदी के प्रचलन के लिए हमें हिंदी या हिंदुस्तानी साहित्य को स्थानीय भाषा में अनूदित करके वहां के निवासियों के लिए सरस एवं सरल भाषा में उपलब्ध कराएं।
आज लगभग हर देश बाध्य है कि अपनी अर्थ-व्यवस्थता को सुदृढ़ करने के लिए भारत से व्यापार करे क्योंकि विश्व का सबसे बड़ा मध्यम वर्ग हमारे देश में ही उपलब्ध है। और इस सन्दर्भ में अनेक देश गंभीर प्रयास भी कर रहें हैं। इस अवसर को हमे अग्रसक्रिय तरीके से आगे ले जाना चाहिए।
साहित्य के विकास व प्रसार में भी सोशल मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सोशल मीडिया समूहों के परस्पर समन्वय से भारतीय भाषाओं के प्रसार व प्रयोग में काफी मदद मिल सकती है। हमें निरंतर प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग के बारे में सोचना चाहिए और अपने प्रभाव से सरकार एवं अहिन्दी भाषियों को इस प्रकार प्रेरित करना चाहिए कि वो हिंदी को सहर्ष ही अपने आप स्वीकारें।
सादर-
प्रवीण रघुवंशी...
प्रवीण रघुवंशी...
दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए कुछ बुनियादी मौलिक सुझाव
----------------------------------------------------------
सूत्र वाक्य: अपना देश अपनी भाषा/इण्डिया हटाओ-भारत बनाओ
निर्मलकुमार पाटोदी
दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को उसका वांछित अधिकार दिलाने के लिए गम्भीरता से उसका उपयोग सर्वत्र बढ़ाने के लिए जो विचारार्थ विषय चुने गये हैं। विश्वास है, पहली बार हिन्दी के मार्ग की बड़ी बाधाऐं दूर होने की उम्मीदें जागी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सवा साल के कार्यकाल में सरकार में, देश में और दुनिया राष्ट्रों में अपना बात प्रभावी ढंग से बोल कर हिन्दी को उसका प्रथम संवैधानिक प्रथम राजभाषा का सम्मान प्रदान करने के लिए आधार स्थापित कर दिया है। हिन्दी के प्रति उनकी सुलझी हुंई नीति से 'इण्डिया' के स्थान पर 'भारत' का सांस्कृतिक स्वरुप बनने का मार्ग भी खुलने की उम्मीद जाग गयी है। भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन कोरा औपचारिक या साहित्यक होने की अपेक्षा वास्तव में विदेशों में,विधि तंथा न्याय के क्षेत्र में उच्च स्तर तक, प्रशासन में शिखर तक, अन्य भाषा-भाषी राज्यों में सहजता से सम्पर्क भाषा बन जाने के लिए पहली बार दिशा प्रदान करने सफल होगा, ऐसी
आशा करना संगत होगा।
देश अपना है, भाषाऐं अपनी है, संस्कृति अपनी है, इतिहास अपना है, स्वाधीनता अपनी है,संविधान अपना है, तो राष्ट्र का विकास, राष्ट्र के लोगों द्वारा राष्ट्र की भाषाओं के मांध्यम से तेज़ी से होता ही है। ऐसा दुनिया के विकसित राष्ट्रों ने किया है। संविधान का निर्माण हुए पैंसठ वर्ष निकल गये हैं। किंतु अपनी जड़ों से विमुख होने से हमारा विकास सही दिशा
में तेज़ी से नहीं हुआ है। अब भोपाल सम्मेलन को आधार बना कर निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रख कर, सम्यक् निर्णय लेने का अवसर उपलब्ध हुआ है। विचारणीय बिन्दु ये हैं:
१ . भारत सरकार के सभी कार्यालयों, मंत्रालयों, विभागों आदि का कामकाज प्रथम राजभाषा हिन्दी में नोट शीट से ले कर सभी विधेयक तक बिना विलम्ब प्रारम्भ कर दिया जाय।
२. न्याय के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय तक अपील तथा बहस की सुविधा हिन्दी में भी उपलब्ध करा दी जाय।
३. संसद में प्रस्तुत होने वाले सभी प्रस्ताव, विधेयक मूल रूप से हिन्दी में बनाए जाय।
४. विदेशों में स्थित दूतावासों के सभी लोग स्थानीय भाषा का ज्ञान उस देश से सीधे-सीधे जुड़ने के लिये आवश्यक समय में अर्जित करें। दूतावासों का आन्तरिक कामकाज प्रथम
राजभाषा हिन्दी में किया जाय।
५. विदेशों में स्थित दूतावास उस देश में निवास कर रहे भारतीयों से सीधा तादात्म रख सके, इसके लिये प्रतिवर्ष हिन्दी और भारतीय भाषा मिलन-दिवस का आयोजन करें। इसके
माध्यम से उस देश के नागरिकों को सरलता से हिन्दी सिखने की प्रेरणा के साथ वातावरण उपलब्ध कराया जाय।
६. हिन्दी और अन्य भाषा-भाषी राज्यों का विश्व हिन्दी सम्मेलन की तरह का सम्मेलन भाषाओं को निकट लाने के लिए प्रति दो वर्ष में आयोजित किया जाय।
७. सभी प्रशासनिक सेवाओं की प्रवेश परीक्षा हिन्दी में देने की सुविधा उपलब्ध की जाय।
८. देश में देवनागरी लिपि के लिये अँग्रेजी भाषा की लिपि का उपयोग तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है। यह सभी प्रचार माध्यमों की ओर से चल रहा है। यह हिन्दी की लिपि देव नागरी के।अस्तित्व पर संकट पैदा कर रहा है। हतोत्साहित किया ही
जाना चाहिए।
९. भाजपा शासित प्रदेशों में प्रसाशनिक, वैधानिक, न्याय, प्रचार-प्रसार आदि कार्य मूल रूप से प्रदेश का भाषा में करने का निर्णय लिया जाय।
१० राजभाषा हिन्दी किसी भी भारतीय भाषा का विरोध करके आगे नहीं बढ़ेगी। अपितु सभी राज्यों का विकास अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से तेज़ी से हो। ऐसी परस्पर हित कारी भूमिका का निर्वाह करेगी। यही हमारे प्राचीन इतिहास
की सीख है। दुनिया के विश्वविद्यालयों में हमारे विश्वविद्यालयों का स्थान सम्मानजनक हो, इसके लिये, गुणात्मक शिक्षा-प्रणाली की पूर्ति करने के लिए सरकारों के बजट का छ: प्रतिशत शिक्षा पर करना ही होगा।
११ सभी कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को बिना विलम्ब बनाने के समय आ गया है।
१२सभी बच्चों को स्थानीय राज्य भाषा और हिन्दी की पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध की जाना होगी जो बच्चा चाहें वह दुनिया की जितनी भाषाऐं सिखना चाहें सीखें। दुनिया के देशों में हो रहे ज्ञान- विज्ञान और नये-नये अनुसंधान की जानकारी अपने देश की भाषाओं में सीधे-साधे पहुँचावें। यह भाषा नीति भारत राष्ट्र को पुन: सोने की चिड़िया बना देगी।
निर्मलकुमार पाटोदी,
विद्या-निलय, ४५, शान्ति निकेतन, ( बॉम्बे हॉस्पीटल के पीछे ),
इन्दौर-४५२ ०१० म. प्र. मो. ०७८६९९ १७०७०
Web: Vidyasagar.net
प्रस्तुत कर्त्ता
संपत देवी मुरारका
अध्यक्षा, विश्व वात्सल्य
मंच
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें