शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

[वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] नागरी के अग्रदूत : जस्टिस शारदाचरण मित्र - प्रो. अमरनाथ

 

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हिन्दी के योद्धा जन्मदिन के अवसर पर - 26


नागरी के अग्रदूत : जस्टिस शारदाचरण मित्र

                        - प्रो. अमरनाथ

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कलकत्ता में जन्मे, कलकत्ता में पढ़े-लिखे, कलकत्ता विश्वविद्यालय से एक ही वर्ष में बी.ए. और एम.ए. की परीक्षा देकर दोनो में प्रथम स्थान प्राप्त करके कीर्तिमान बनाने वाले, प्रेसीडेंसी कॉलेज में मात्र 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी के प्रोफेसर और बाद में बी.एल. की डिग्री लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे जस्टिस शारदाचरण मित्र ( 17.12.1848-04.09.1917 ) देवनागरी लिपि के द्वारा राष्ट्रीय एकता का सपना देखने वाले अप्रतिम स्वप्नदर्शी और सूत्रधार थे. राष्ट्रीय चेतना ने उन्हें एकलिपि विस्तार परिषद नामक संस्था के गठन की ओर प्रेरित किया. अगस्त 1905 ई. में कलकत्ता में उन्होंने एकलिपि विस्तार परिषद का गठन किया. सर्वत्र, विशेषकर भारत वर्ष में सब भाषाओं के लिए संस्कृताक्षर( देवनागरी) का व्यवहार चलाना तथा बढ़ाना ही इस परिषद् का मुख्य उद्देश्य था. इसके वे प्रथम प्रधान मंत्री थे. इसके सदस्यों में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सर गुरुदास बनर्जी, महामहोपाध्याय पंडित सतीशचंद्र विद्याभूषण, महाराजा सर रामेश्वर सिंह( दरभंगा), महाराजा बहादुर प्रतापनारायण सिंह ( अयोध्या), महाराजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह( गिद्धौर, मुंगेर), श्रीधर पाठक, बालकृष्ण भट्ट, रामानंद चटर्जी जैसे मनीषी थे. उस दौर की हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती के विविध विषय स्तंभ के अंतर्गत आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने एक लिपि विस्तार परिषद् की नियमावली  को उपयुक्त और उचित घोषित किया था और कहा था कि हम इस परिषद् के हितचिंतक हैं.  ( सरस्वती, फरवरी 1905 ( भाग-6, संख्या-12,) विविध विषय स्तंभ, पृष्ठ-450)


आगे चलकर 1907 ई. में इस संस्था की ओर से जस्टिस शारदाचरण मित्र ने देवनागर नामक पत्र निकाला जो बीच में कुछ बाधाओं के बावजूद 1917 ई. तक निकलता रहा. इसके प्रवेशांक से लेकर छब्बीसवें अंक तक संपादक थे यशोदानंदन अखौरी. लगभग सवा वर्ष तक इसका प्रकाशन स्थगित रहने के बाद 1911 में इसका नए रूप में प्रकाशन फिर से शुरू हुआ, किन्तु आगे मात्र तीन वर्ष तक ही इसका प्रकाशन हो सका.

एक लिपि विस्तार परिषद के गठन से पूर्व जस्टिस शारदाचरण मित्र ने 22 दिसंबर 1904 को कलकत्ता विश्वविद्यालय इंस्टीच्यूट के ऐतिहासिक सभागार में ए यूनिफार्म अल्फाबेट एंड स्क्रिप्ट फॉर इंडिया शीर्षक अंग्रेजी में व्याख्यान दिया था. उक्त संगोष्ठी की अध्यक्षता सर गुरुदास बनर्जी ( तत्कालीन कुलपति, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने की थी. अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सर गुरुदास बनर्जी ने जस्टिस शारदाचरण मित्र के राष्ट्रलिपि देवनागरी से संबंधित विचारों का पूर्ण समर्थन किया था. जस्टिस शारदाचरण मित्र का यह लेख बाद में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा संपादित दि हिन्दुस्तान रिव्यू एंड कायस्थ समाचार के जनवरी 1905 तथा संयुक्तांक अप्रैल-जून 1905 के अंकों में प्रकाशित हुआ था. उसी वर्ष इस लेख का हिन्दी अनुवाद भारत मित्र ( साप्ताहिक) के दो अंकों में छपा था. बाद में न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र के विचारों का साराँश बालकुकुंद गुप्त ने अपने शब्दों में जमाना ( उर्दू) के अप्रैल-मई-1907 के अंक में हिन्दुस्तान में एक रस्मुलखत शीर्षक लेख के माध्यम से व्यक्त किया था और उनकी प्रशंसा की थी.


आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती के फरवरी 1905 ( भाग-6, संख्या-2) के अंक में अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा था, कलकत्ता हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र एम.ए., बी.एल. चाहते हैं कि इस देश में जितनी भाषाएं हैं, सब एक ही प्रकार की लिपि में लिखी जायं. यह लिपि संस्कृत की वर्णमाला की भित्ति पर होनी चाहिए अर्थात् देवनागरी अक्षरों में सब प्रान्तिक  भाषाएं लिखी जानी चाहिए..... अपने प्रस्ताव के समर्थन में न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र ने प्राय: वही बातें कही हैं जो हम अपने देशव्यापक के भाषा संबंधी लेख में कह चुके हैं.. लक्षण अच्छे हैं..... इस मामले में, जबतक बंगवासी अगुआ न होंगे तबतक सफलता की कम आशा है. ( सरस्वती, फरवरी 1905 ( भाग-6, संख्या-2,) विविध विषय स्तंभ, पृष्ठ-42-43)

न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र का विचार था कि भारत के विपरीत यूरोप और अमेरिका में लिपि की एकरूपता है.  लिपि की एकरूपता भारत में भी अनिवार्य है. भारत की वह लिपि देवनागरी ही होनी चाहिए. यूरोप और अमेरिका में रोमन लिपि का जो स्थान है, भारत, वर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड और जापान में भी देवनागरी लिपि का वही स्थान होना चाहिए. वे लिखते हैं, नीयरली आल दि कंट्रीज ऑफ यूरोप एंड अमेरिका हैव पार्टिकुलर्ली वन अल्फाबेट एंड वन सिरीज ऑफ कैरेक्टर्स, ह्वाइल वी इन इंडिया हैव सो मेनी, एंड इज इट नाट टाइम दैट वी शुड थिंक ऑफ ए कामन स्क्रिप्ट ? आई एम क्वाइट स्योर  यू विल एन्स्वर, एस. दैट कामन स्क्रिप्ट इन माई ओपीनियन शुड बी द देवनागरी. इट शुड अक्कूपाई द सेम पोजीशन इन इंडिया इन्क्लूडिंग वर्मा ऐंड सिलोन एंड एवेन स्याम एंड जापान एज द रोमन कैरेक्टर इन यूरोप एंड अमेरिका. ( द हिन्स्तान रिव्यू एंड कायस्थ समाचार, इलाहाबाद, जनवरी 1905, पेज-8)

तृतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, कलकत्ता ( दिसंबर 1912)  के तेरहवें  प्रस्ताव पर बोलते हुए  शारदाचरण मित्र ने कहा था कि भाषा का पार्थक्य देशकाल के अनुसार हुआ है. देश के भेद से भाषा का भेद अपरिहार्य है. पर साहित्य की भाषा एक होनी चाहिए. मैं आठ वर्षों से यह चेष्टा कर रहा हूँ कि नागरी लिपि सारे भारत में प्रचलित हो. संभव है कि हिन्दी भाषा सारे भारत में प्रचलित होने के लिये इसमें परिवर्तन की आवश्यकता हो. पर इस रूपान्तर से हिन्दी की कोई हानि नहीं हो सकती ( तृतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, कलकत्ता कार्य विवरण, पहला भाग, 1912, पृष्ठ- 85)

निश्चित रूप से देवनागर एक अनोखा प्रयोग था. इसमें सभी भारतीय भाषाओं की रचनाएं देवनागरी लिपि में लिप्यंतरित होकर प्रकाशित होती थीं. इसकी ख्याति सम्पूर्ण भारत में थी. उस समय भारत का भूगोल भी आज जैसा नहीं था. देवनागर में भारत के विस्तार को कश्मीर से कुमारिका अंतरीप और ब्रह्मदेश से गांधार पर्यंत कहा गया है. इस विशाल भू-भाग को एकता के सूत्र में बाँधना ही जस्टिस शारदाचरण मित्र का संकल्प था.

 देवनागर के पहले ही अंक में उसके उद्देश्यों की घोषणा करते हुए विस्तार से लिखा गया है, जगद्विख्यात भारतवर्ष ऐसे महाप्रदेश में जहाँ जाति-पाँति, रीति-नीति, मत आदि के अनेक भेद दृष्टिगोचर हो रहे हैं, भाव की एकता रहते भी भिन्न- भिन्न भाषाओं के कारण एक प्रांतवासियों के विचारों से दूसरे प्रांतवालों का उपकार नहीं होता. इसमें संदेह नहीं कि भाषा का मुख्य उद्देश्य अपने भावों को दूसरे पर प्रकट करना है, इससे परमार्थ ही नहीं समझना चाहिए, अर्थात मनुष्य को अपना विचार दूसरे पर इसलिए प्रकट करना पड़ता है कि इससे दूसरे का भी लाभ हो किन्तु स्वार्थ साधन के लिए भी भाषा की बड़ी आवश्यकता है. इस समय भारत में अनेक भाषाओं का प्रचार होने के कारण प्रांतिक भाषाओं से सर्वसाधारण का लाभ नहीं हो सकता. भाषाओं को शीघ्र एक कर देना तो परमावश्यक होने पर भी दुस्साध्य सा प्रतीत होता है.

 इस पत्र का उद्देश्य है भारत में एक लिपि का प्रचार बढाना और वह लिपि देवनागराक्षर है. देवनागर का व्यवहार चलाने में किसी प्रान्त के निवासी का अपनी लिपि या भाषा के साथ स्नेह कम नहीं पड़ सकता. हाँयह अवश्य है कि अपने परिमित मण्डल को बढाना पड़ेगा.  1911  की संपादकीय टिप्पणी की पृष्ठ संख्या 32 पर देवनागर के बारे में संकल्प व्यक्त करते हुए कहा गया है, “’देवनागर का उद्देश्य केवल भारतीय भाषाओं के लिए, न कि पृथ्वी भर की सभी भाषाओं के लिए एक लिपि का प्रचार करना है. देवनागर का सिद्धांत सूत्र अधोलिखित है,

श्रीमद्भारतवर्ष भूतिभरितैर्नानाविधै भाषणे / पूर्णभारतभव्य मानव मनोबंधाय सूत्रं दृढं.

श्रीदेवाक्षरदक्षमेकालिपि विस्तारैकवीरं नवम् / पत्रं राजति देवनागर महो! गृह्णन्तु तत्कोविदा:”

अर्थात् अनेक विभूतियों और अनेक प्रकार के भाषणों से परिपूर्ण श्री भारतवर्ष के समग्र मानवों के भव्य मन को दृढ़ता से ग्रथित करने के दृष्टिकोण से देवाक्षर के विस्तार में यत्नशील नवीन पत्र देवनागर है. इसे विद्वान स्वीकार करें.

देवनागर में बंगला, उर्दू, नेपाली, उड़िया, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, मलयालम, पंजाबी आदि की रचनाएं देवनागरी में लिप्यंतरित होकर छपती थीं. इसमें पं. रामावतार शर्मा, डॉ. गणेश प्रसाद, शिरोमणि अनंतवायु शास्त्री, अक्षयवट मिश्र, कोकिलेश्वर भट्टाचार्य जैसे मनीषियों की रचनाएं आमतौर पर प्रकाशित होती थीं. गोपालकृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, मोतीलाल घोष जैसे मनीषियों ने देवनागर की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. 

1913 ई. में जस्टिस शारदाचरण मित्र और उनके कुछ सहयोगियों द्वारा भारत के सेक्रेटरी आफ स्टेट को एक ज्ञापन भी दिया गया था. इसमें कहा गया था कि 1911 ई. की जनगणना के अनुसार भारत की संपूर्ण जनसंख्या 315132537 में से 294875811 व्यक्ति निरक्षर थे.  यद्यपि लिंग और धर्म के अनुसार इस निरक्षरता के प्रतिशत में उतार- चढ़ाव थाफिर भी 90 प्रतिशत पुरुष और 99 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर थीं. ऐसी दशा में भारतीय भाषाओं के लिए एक सार्वजनीन लिपि के प्रश्न पर विचारार्थ भारतीयों और भारतीय हितों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाले आयोग का गठन सरकार को करना चाहिए. ( द्रष्टव्यदेवनागरी लिपि आन्दोलन का इतिहास, रामनिरंजन परिमलेन्दु, पृष्ठ-238)

उल्लेखनीय है कि जस्टिस शारदाचरण मित्र ने संपूर्ण भारत वर्ष के लिए नागरी लिपि के प्रयोग का प्रस्ताव और उसके लिए संघर्ष उस वक्त चलाया जिन दिनों रेवरेंड जे. नोल्स जैसे लोग लंदन से संपूर्ण भारत के लिए रोमन लिपि का प्रयोग प्रस्तावित कर रहे थे और ईसाई मिशनरियाँ भारत के कोने- कोने में इसके प्रचार में लगी हुई थीं. 1910 ई. में रेवरेंड जे. नोल्स की पुस्तक आवर ड्युटी टु इंडिया एंड इंडियन इलीट्रेट्स, रोमन लेटर्स फॉर इंडियन लैँग्वेजेज प्रकाशित हुई थी और उसमें उन्होंने भारतीय भाषाओं के रोमन लिप्यन्तरण की अनुशंसा की थी. जार्ज ग्रियर्सन खुद भी इसके समर्थक थे. बनारस के एक प्रतिष्ठित पादरी एडविन ग्रीव्ज ने तो जस्टिस शारदाचरण मित्र के प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया था. किन्तु शारदाचरण मित्र अपने विचारों पर अंत तक अडिग रहे. उन्होंने भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि ही नहीं, फारसी और अरबी लिपियों का भी अनिवार्य रूप से बहिष्कार करने का सुझाव दिया था.

जस्टिस शारदाचरण मित्र 1904 से 1908 तक कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहे. इसके पूर्व वे 1878 से 1880 तक कलकत्ता नगर निगम के पार्षद, 1884 से 1890 तक बंगाल टेक्स्ट बुक कमेटी के सदस्य, 1885 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कलासंकाय के अधिष्ठाता (डीन) रहे. वे कलकत्ता के प्रतिष्ठित बंगीय साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष और बाद में उसके अध्यक्ष रहे. 1884 में उन्होंने कलकत्ता आर्य विद्यालय की नींव रखी थी.

4 सितंबर 1917 को शारदाचरण मित्र का देहावसान हो गया. उनके निधन पर 17 अक्टूबर 1917 को सरस्वती ने उनके महान योगदान का स्मरण करते हुए लिखा, देवनागरी लिपि को समस्त भारत में प्रचलित करने के लिए आपने ही यह पहला, और दुख है कि अंतिम प्रयास किया. यदि यह उद्योग जारी रहता तो इससे हिन्दी का ही नहीं, देश का भी बहुत कल्याण होता. ( सरस्वती, अक्टूबर, 1917, विविध विषय स्तंभ के अंतर्गत बाबू शारदाचरण मित्र का स्वर्गवास शीर्षक टिप्पणी, पृष्ठ-212-213). नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के विगत साठ वर्षो का सिंहावलोकन शीर्षक पुस्तक में पृष्ठ- संख्या-9 पर कहा गया है कि, समस्त भारत वर्ष के लिए एक लिपि की आवश्यकता का आन्दोलन वर्तमान युग के आरंभ में जस्टिस शारदाचरण मित्र ने आरंभ किया था.

निधन के बाद जस्टिस शारदाचरण मित्र और उनके योगदान को बंगाल के लोगों ने ही नहीं, हिन्दी भाषियों ने भी तेजी से भुला दिया. हमें खुशी है कि कोलकाता की अपनी भाषा संस्था ने वर्ष 2000 में उनकी स्मृति में जस्टिस शारदाचरण मित्र स्मृति भाषा सेतु सम्मान का शुभारंभ किया. यह सम्मान अपने रचनात्मक अवदान और अनुवाद कार्य द्वारा हिन्दी तथा किसी अन्य भारतीय भाषा और साहित्य के बीच सेतु निर्मित करने वाले साहित्यकार को दिया जाता है. सिद्धेश, शंकरलाल पुरोहित, चंद्रकांत बांदिवडेकर, बी. वै. ललिताम्बा, बी.रा.जगन्नाथन, चमन लाल, ए. अरविन्दाक्षन, बिन्दु भट्ट, दिनकर कुमार, विजयराघव रेड्डी, सुशील गुप्ता, दामोदर खड़से, राजेन्द्रे प्रसाद मिश्र, चमनलाल सप्रू, इबोहल सिंह कांग्जम, रामचंद्र परमेश्वर हेगड़े, बीना बुदकी आदि साहित्यकार इस सम्मान से विभूषित हो चुके हैं.

आज जन्मदिन के अवसर पर हम बंगाल के इस मनीषी और चिंतक के महान योगदान का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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प्रस्तुत कर्ता : संपत देवी मुरारकाविश्व वात्सल्य मंच

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लेखिका यात्रा विवरण

मीडिया प्रभारी

हैदराबाद

मो.: 09703982136

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