मंगलवार, 29 सितंबर 2015

दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन, बालेन्दु शर्मा दाधिची



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अनेक विद्वानों ने अनेक कोणों से दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की आलोचना की है। नकारात्मकता का यह उद्घोष भी कहीं न कहीं हिंदी भाषा-संसार की सकारात्मकता और जीवंतता की ओर संकेत करता है। मैं ऐसे विद्वानों से क्षमायाचना सहित अपनी मतभिन्नता दर्ज करना चाहूँगा। मैंने बहुत अधिक विश्व हिंदी सम्मेलन तो प्रत्यक्ष नहीं देखेकिंतु पिछले तीन सम्मेलनों (न्यूयॉर्कजोहानीसबर्ग और भोपाल) के अपने अनुभव के आधार पर मैं भोपाल के आयोजन को बेहद उत्कृष्ट मानता हूँ। ऐसा नहीं कि इस बार के सम्मेलन में कोई कमियाँ नहीं रहीं। वे अवश्य थींजैसी कि हर बार होती हैं। लेकिन सम्मेलन की विशेषताओं और सफलताओं के सामने मुझे उनकी कोई विशेष अहमियत प्रतीत नहीं होती। भोपाल ने अद्वितीय आयोजन करके दिखाया है। मेरी स्मृति में इतना भव्यव्यापक और सुप्रबंधित कोई अन्य आयोजन नहीं दिखतासिवाय माइक्रोसॉफ्ट के सिएटल (अमेरिका) स्थित मुख्यालय में आयोजित एमवीपी समिट केजिसमें भाग लेने कामौका मुझे कोई आठ साल पहले मिला था।
भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन ने हमें सिखाया है कि अपनी भाषा का उत्सव कैसे मनाया जाता है। अंग्रेजी में जिसे अपनी भाषा को 'सेलिब्रेटकरना कहते हैं। हमारे किसी राज्य या शहर ने पहले कभी किसी भारतीय भाषा को इस अंदाज में सेलिब्रेट किया होऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। आजादी के बाद से हिंदी परस्पर विरोधाभासी भावनाओं के बीच पिसती रही है। एक वर्ग उसकी उपेक्षा से चिंतित है और दूसरा उसे थोपे जाने से। कोई 'पिछड़ेपनके इस प्रतीक से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है। अफ़सरशाहीमीडिया और पश्चिमपरस्तों ने कुछ ऐसा माहौल बना दिया है कि हिंदी-भाषी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से हिंदी का अख़बार पढ़ते हुएस्कूलों में अपने बच्चों से हिंदी में बात करते हुए और दफ़्तरों में हिंदी बोलते हुए संकोच का अनुभव करने लगा है। और ऐसे माहौल में हम अपनी भाषा के गौरव को महसूस करने की बात करते हैं! भोपाल ने हिंदी के गौरव की लंबी-चौड़ी बातें नहीं कीं। उसने प्रत्यक्ष दिखाया है कि किसी भाषा के प्रति गौरव महसूस करना वास्तव में क्या होता है।


भोपाल ने ऐसा माहौल रच दिया था कि हिंदी के प्रति गौरव का भाव स्वतः आता था। शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसे वहाँ अंग्रेज़ी बोलने की आवश्यकता महसूस हो रही हो और हिंदी के प्रति हीनता का भाव प्रतीत हुआ हो। क्या आज हिंदी को सबसे बड़ी आवश्यकता इसी आत्म गौरव को जगाने की नहीं हैक्या हिंदी भाषियों को हिंदी की हीनता के भाव से मुक्ति दिलाना हमारा पहला लक्ष्य नहीं हैयदि हाँतो भोपाल को बधाई दीजिए कि उसने यह लक्ष्य हासिल करके दिखा दिया।


दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान भोपाल मध्य प्रदेश की नहीं बल्कि हिंदी की राजधानी प्रतीत हो रहा था। अगर आप भाषा और साहित्य के लिए समाज में किसी गौरवशाली स्थान की कल्पना करते हैं तो आपको भोपाल जाना चाहिए था। भोपाल में यह सपना जीवंत हो गया था। हवाई अड्डे से आयोजन स्थल तक मार्ग में जगह-जगह विद्वानों का स्वागत करते अनगिनत बैनर और पोस्टरचौराहों पर तुलसीदास से लेकर प्रेमचंद और माखन लाल चतुर्वेदी से लेकर अज्ञेय तक हिंदी के महान रचनाकारों के विशाल चित्रऔर अखबारों में हिंदी पर केंद्रित बड़े-बड़े परिशिष्ट एक आश्चर्यजनकअविश्वसनीय किंतु आह्लादित कर देने वाला अनुभव था। समापन समारोह में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरफ़ से कही गई इस बात में अतिशयोक्ति नहीं थी कि आज पूरा भोपाल हिंदीमय है। यहाँ के ताल-तलैया,शिखर-शिखरिया सब हिंदीमय हैँ।
इसे आप भले ही भव्यता और आडंबर कह लेंलेकिन भोपाल ने ऐसा माहौल रच दिया था कि हिंदी के प्रति गौरव का भाव स्वतः आता था। शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसे वहाँ अंग्रेज़ी बोलने की आवश्यकता महसूस हो रही हो और हिंदी के प्रति हीनता का भाव प्रतीत हुआ हो। क्या आज हिंदी को सबसे बड़ी आवश्यकता इसी आत्म गौरव को जगाने की नहीं हैक्या हिंदी भाषियों को हिंदी की हीनता के भाव से मुक्ति दिलाना हमारा पहला लक्ष्य नहीं हैयदि हाँतो भोपाल को बधाई दीजिए कि उसने यह लक्ष्य हासिल करके दिखा दिया। इस शहर ने इन आयोजनों को भारत में ही स्थायी रूप से आयोजित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है। अगर सभी राजधानियाँ हिंदी को इसी तरह का गौरव और सम्मान दे सकें तो क्या बात हो!
विश्व हिंदी सम्मेलन को केंद्र और राज्य सरकारों से जैसी अहमियत इस बार मिलीवैसी इंदिरा गांधी के दौर के बाद कभी नहीं मिली। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनके सहयोगी मंत्री जनरल. डॉ. विजय कुमार सिंह कई सप्ताह से तैयारियों में जुटे थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद राज्य स्तर पर सारे इंतजाम की देखरेख कर रहे थे। सुषमा स्वराज ने इस सिलसिले में भोपाल के कई दौरे किए और सम्मेलन शुरू होने से कुछ दिन पहले से वहाँ मौजूद थीं। मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्री और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री की प्रत्यक्ष भूमिका रही। राज्यसभा सदस्य अनिल माधव दवेमध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव और लोकसभा सदस्य आलोक संजर दिन-रात प्रबंधन के काम में जुटे रहे। उसके बाद भोपाल के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों- माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय ने जमीनी स्तर पर हुई तैयारियोंयोजनाओंढाँचागत विकास और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिल्ली में विदेश विभाग ने एक अलग प्रकोष्ठ स्थापित किया था। सम्मेलन में भागीदारी करने से पहले लगता था कि इतने सारे पक्ष मिलकर विश्व हिंदी सम्मेलन का क्या हाल करेंगेसबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएँअपना-अपना सोचअपने-अपने तौर-तरीके और अपना-अपना अहं। लेकिन सम्मेलन में जाने पर अहसास हुआ कि इतने सारे लोगों को सम्मेलन की व्यवस्था से जोड़ना कितना ज़रूरी था।
अगर केंद्र और राज्य सरकार के बीच यह उत्कृष्ट तालमेल न होतायदि जमीनी स्तर पर सैंकड़ों छात्रों और दर्जनों शिक्षकों को न लगाया जातायदि मध्य प्रदेश सरकार और भोपाल नगर निगम ने इसे प्रतिष्ठा और गौरव का प्रश्न न बनाया होता तो चार-पाँच हजार लोगों की भागीदारी वाला यह आयोजन इस किस्म की उत्कृष्टता की छाप नहीं छोड़ सकता था। किसी बड़े आयोजन का प्रबंधन कैसे किया जानाचाहिएइसे भोपाल ने बखूबी सिखाया है। इतने लोगों की मौजूदगी के बावजूद कहीं कोई अफरा-तफरी नहींकहीं कोई कुव्यवस्था नहींकहीं किसी चीज़ की कमी नहीं। हजारों लोगों का भोजन इतनी सुगमता से हो जाता था कि आश्चर्य होता था। न पानी की कमीन जन-सुविधाओं की। सभी प्रतिनिधियों के पंजीकरण के लिए कई केबिन लगे थे जहाँ कंप्यूटर से आपका नाम खोजकर तुरंत प्रतिभागी कार्ड हाथ में थमाने के लिए बेताब स्वयंसेवक मौजूद थे। कोई मदद चाहिए तो आपके सहयोग के लिए तत्पर। कहीं इधर-उधर होने या बहाना बना देने की प्रवृत्ति नहीं दिखी। मैंने इसे प्रत्यक्ष आजमाया था।
हिंदी के जिन विद्वानों और विशेषज्ञों को सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिलाउनके लिए यह अविस्मरणीय अनुभव था। मध्य प्रदेश सरकार को ऐसे जुटी थी जैसे हर मंत्री और अधिकारी के घर का अपना आयोजन हो। मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों के बीच इस आयोजन को लेकर भावुकता दिखाई देती थी। अब भले ही आप इसे व्यापम से जोड़ लें या फिर बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से लेकिन भोपाल के आयोजन में कुछ बात थी! अन्यथा हमने कब ऐसा देखा था कि किसी आयोजन में रवानगी से पहले ही टिकट के साथ-साथ आधिकारिक रूप से यह सूचना दी जाए कि भोपाल में आपके साथ फलाँ छात्र को सहायक के रूप में नियुक्त किया गया है और फलाँ वाहन चालक एक वाहन लेकर हमेशा आपके साथ रहेगा। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि धन खर्च कर कोई भी सरकार ऐसा कर सकती है। लेकिन यदि दिल्ली से रवानगी के पहले खुद विदेश मंत्री के कार्यालय से फोन कर आपसे पूछा जाए कि क्या आपको टिकट और अन्य चीजें मिल गई हैं और क्या भोपाल में आपके लिए नियुक्त सहायक ने आपसे फोन पर बात कर ली है तोदिल्ली के इंदिरागांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुँचकर चेकिन कराने लगते हैं तो एअर इंडिया के अधिकारी बताते हैं कि आपका तो पहले ही 'वेब चेकिनकिया जा चुका है। आपको इस काम में समय लगाने की जरूरत नहीं हैबोर्डिंग पास लीजिए और सुरक्षा जाँच के लिए बढ़िए। उत्कृष्ट प्रबंधन और मेहमाननवाजी की इससे बेहतर मिसाल कहाँ मिलेगीवह भी किसी हिंदी आयोजन के संदर्भ मेंकृपया बताएँ। इसकी तुलना न्यूयॉर्क से कीजिए जब भारत से गए प्रतिनिधि घंटों तक पंक्तिबद्ध खड़े होकर यह स्पष्ट होने का इंतजार करते रहे थे कि उन्हें रहनाकहाँ है। और सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में रूसी विद्वान वारान्निकोव तथा कमलेश्वर जी को कैसे अपमान का अहसास हुआ थायाद है आपको! भोपाल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई। हिंदी और उसके साधकों को वहाँ यदि कुछ मिला तो वह था- स्नेह और सम्मान।


मुझे लगता है कि दोनों सरकारों के उस संकल्प और उन सैंकड़ों अधिकारियों तथा कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ हम बड़ी नाइंसाफी कर रहे हैं अगर हम कतिपय छोटी चूकों और लापरवाहियों को बहुत बड़े आकार में पेश कर सम्मेलन को नाकामसिद्ध करने की कोशिश करते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि एक लेखक और पत्रकार के रूप में घटनाक्रम की निष्पक्ष तसवीर पेश करना हमारा कर्तव्य है।


भोपाल में हवाई अड्डे से आयोजन स्थल तक पहुंचने के मार्ग में आप चारों ओर हिंदी का जो सम्मान देखते हैंवह आपको सम्मेलन की शुरूआत से पहले ही भावुक कर देता है। मुझे लगता है कि दोनों सरकारों के उस संकल्प और उन सैंकड़ों अधिकारियों तथा कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ हम बड़ी नाइंसाफी कर रहे हैं अगर हम कतिपय छोटी चूकों और लापरवाहियों को बहुत बड़े आकार में पेश कर सम्मेलन को नाकाम सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि एक लेखक और पत्रकार के रूप में घटनाक्रम की निष्पक्ष तसवीर पेश करना हमारा कर्तव्य है।
अब बात प्रधानमंत्री के भाषण की। कुछ विद्वानों ने लिखा कि उन्होंने यह कहा कि दुनिया में सिर्फ तीन भाषाएँ बच जाएंगी। क्षमा करेंमैं वहाँ मौजूद था और प्रधानमंत्री का भाषण तो रिकॉर्ड होकर विश्व हिंदी सम्मेलन की वेबसाइट पर उपलब्ध हैजरा उसे देख तो लीजिए। श्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि आज के तकनीकी दौर मेंआगे चलकर जिन तीन भाषाओं का दबदबा रहने वाला हैवे हैं- अंग्रेजीमंदारिन और हिंदी। यह वही बात है जो तकनीकी विश्व में एरिक श्मिट (गूगल के चेयरमैन) समेत बहुत से दिग्गज कह रहे हैं। हिंदी भाषा पर मोदी जीका अधिकार हैइसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन वे भाषा को एक विश्लेषक की दृष्टि से भी देखते हैं और उसके बारे में उनकी एक अलग मौलिक दृष्टि हैइसका अनुमान सम्मेलन से पहले मुझे नहीं था। भाषा पर उनका भाषण न सिर्फ रुचिकर था बल्कि जमीन से जुड़ा हुआ था। उन्होंने कहा कि गुजरात में जब कोई झगड़ता है तो हिंदी में बोलने लगता है। यह एक तथ्य हैजिसका जिक्र उन्होंने विनोदपूर्ण ढंग से किया था। आशय यह था कि जैसे कोई हिंदी भाषी व्यक्ति खास परिस्थितियों में अंग्रेज़ी बोलना अधिक प्रतिष्ठा का विषय समझता है उसी तरह कुछ अन्य भारतीय भाषाएँ बोलने वाले लोग हिंदी में बोलना प्रतिष्ठा का प्रश्न समझते हैं। झगड़ा होगा तो वे हिंदी में बोलने लगेंगे ताकि बात में ज़्यादा वज़न आए। मैं एक राजस्थानी होने के नाते इस तरह का अनुभव स्वयं अनेक बार कर चुका हूँ। दिल्ली में एक आयोजन में जब यह कहा जा रहा था कि हिंदी पच्चीसेक साल में खत्म हो जाएगीतब मैंने असहमति दर्ज करते हुए कहा था कि आज अगर एक धारा हिंदी से अंग्रेजी की ओर बह रही है तो दूसरी धारा भारतीय भाषाओं से हिंदी की तरफ भी बह रही है। अगर हिंदी कुछ लोगों को खो रही है तो बहुत से नए लोगों को जोड़ भी रही है। हिंदी की बोलियाँ बोलने वाले इसका एक उदाहरण हैं। मैं जब अपने गांव जाता हूँ तो राजस्थानी में बोलता हूँ लेकिन वहाँ के बच्चे मुझे हिंदी में जवाब देते हैं। कारणउन्हें लगता है कि दिल्ली से आए व्यक्ति के साथ राजस्थानी की बजाए हिंदी में बात करेंगे तो ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। मोदी जी ने क्या गलत कहा?
जो अहम बात प्रधानमंत्री ने कही और जिसकी उपेक्षा कर दी गईवह यह थी कि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए आवश्यक है कि तमिलतेलुगू आदि भाषा-भाषियों को यह अहसास कराया जाए कि हिंदी उनके लिए अंग्रेज़ी जैसी चुनौती नहीं है। परस्पर साहचर्य और मेल-मिलाप का एक अच्छा सुझाव भी उन्होंने दिया और वह यह कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करे तथा अन्य भारतीय भाषाएँ हिंदी के शब्द ग्रहण करें। जैसे हिंदी तमिल के और तमिल हिंदी के। कितना अच्छा सुझाव है यहयदि हम ऐसा करेंगे तो क्या दोनों भाषाओँ के समृद्ध नहीं करेंगेदोनों भाषाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का कितना सुगम मार्ग होसकता है यह?
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के बारे में जो टिप्पणी इस सम्मेलन में कीवैसी पिछले कई दशकों में नहीं सुनी गई। क्या हम हिंदी वालों को इस टिप्पणी के लिए उनका अभिनंदन नहीं करना चाहिएमाना कि लक्ष्य बहुत दूर है और आम तौर पर सरकारी तंत्र खुद ही हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मार्ग में आ जाता हैलेकिन यह कम साहसिक नहीं है कि देश का गृह मंत्री तमाम विवादों के बावजूद सार्वजनिक मंच से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करता है। हमें उनके बयान को ताकत देनी चाहिए या आलोचनाओं से उन्हें हतोत्साहित करना चाहिए?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हिंदी के प्रति जिस किस्म की भावुकता दिखाई और एक आदर्श मेजबान की जैसी भूमिका दुनिया भर से जुटे हिंदी विद्वानों और हिंदी प्रेमियों के प्रति दिखाई वह भी अद्वितीय थी। उन्होंने खुद सम्मेलन के दौरान सत्रों की अध्यक्षता की और वहाँ पारित किए गए अनेक प्रस्तावों पर कम से कम मध्य प्रदेश में तुरंत प्रभाव से अमल करने की घोषणा भी समापन समारोह में ही कर दी। श्री चौहान की वह भावनात्मकता मध्य प्रदेश में हिंदी के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है जो उन्होंने अपने समापन भाषण में दिखाई। लंबे-चौड़े वायदे और घोषणाएँ कोई भी कर सकता है लेकिन वैसी भावुकता जबरदस्ती पैदा नहीं की जा सकती। वह हृदय के भीतर से निकलती है।
केंद्र और राज्य सरकारों ने सम्मेलन के सत्रों को कितना महत्व दिया होगावह श्री चौहानदो राज्यपालों और केंद्र सरकार के मंत्रियों की निरंतर मौजूदगी से स्पष्ट है जिन्होंने हिंदी से जुड़े कुछ सत्रों की खुद अध्यक्षता की और कुछ में दर्शक के रूप में बैठे। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 'सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदीविषय पर उस सत्र की अध्यक्षता कीजिसमें मैंने भागीदारी की थी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एक अन्य सत्र की अध्यक्षता की। गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरी नारायण त्रिपाठी ने दो अन्य सत्रों की अध्यक्षता की। विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह अनेक सत्रों में दिखाई देते रहे।हिंदी के सम्मेलनों को सरकारों की तरफ़ से इतनी अहमियत दिया जाना हमारे लिए एक नया अनुभव था। लेकिन पता चला कि सुषमा जी और शिवराज सिंह जी चाहते हैं कि सम्मेलन की चर्चाएँ महज रस्म-अदायगी बनकर न रह जाएँ। मंत्री मुद्दों को समझें और जब मंत्री खुद जमीनी मुद्दों से वाकिफ़ होंगे तो सरकार के स्तर पर सम्मेलन के मंतव्यों को गंभीरता से लेना सुनिश्चित होगा। कोई ठोस नतीजा सामने आएगा।

बालेन्दु शर्मा दाधिची 
 डॉ.एम्.एल.गुप्ता 

प्रस्तुत कर्त्ता
संपत देवी मुरारका
अध्यक्षा, विश्व वात्सल्य मंच
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन : सही राह और सच्चे सरोकारों का आईना डॉ एम.एल. गुप्ता’ आदित्य,’




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10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन : सही राह और सच्चे सरोकारों का आईना
10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन अब तक के विश्व हिंदी सम्मेलनों में मील के पत्थर की तरह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के संबंध मेँ अभिभूत, गद्गद्, भाव-विभोर, अभूतपूर्व, श्रेष्ठतम जैसे किसी एक शब्द का प्रयोग किया जाए तो बात अधूरी होगी । शायद ये सभी शब्द मिलकर भी कमजोर पड़ जाएँ। भोपाल मेँ आयोजित 10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन न केवल अब तक का सर्वश्रेष्ठ हिंदी सम्मेलन कहा जा सकता है बल्कि यह कहा जाए कि भारत में शायद ही कभी इतना बड़ा, भव्य और सार्थक सम्मेलन हुआ होगा तो भी शायद गलत न होगा। लगता था कि सारा शहर पलक–पावड़े बिछा कर बैठा था। भोपाल मेँ गाड़ी से उतरकर बाहर निकले ही थे कि सम्मेलन के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह आगे बढ़कर बुलाया बैठाया और फिर चाय-पानी के बारे में पूछा तो एकबारगी लगा कि शायद इनमें कुछ परिचित हैं जो आवभगत कर रहे हैं, पर ऐसा था नहीं। फिर पूछा कहाँ जाना है, तत्काल गाड़ी की व्यवस्था और वह भी एक कार्यकर्ता सहित । भारत में और वह भी इतने बड़े सम्मेलन में हर व्यक्ति के प्रति ऐसा प्रेम और सद्भाव कल्पना से दूर था । मैंने पूछा आप कौन से विभाग से हैं तो उन्होंने कहा साहब हम स्थानीय भाजप और संघ के कार्यकर्ता हैं । हमारे देश, हमारे राज्य और हमारे शहर में विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है यह गर्व और गौरव की बात है। ‘अतिथि देवो भव’ । हर दिन हर पल ऐसे ही अनुभव थे।DSCN7809 DSCN78122015_9$largeimg110_Sep_2015_221713510gallery
रास्ते भर हिंदी के लेखकों, कवियों व साहित्यकारों की तस्वीरें लगता था कि पूरा शहर हिंदीमय हो गया है । पंडाल हिंदी के रचनाकार साहित्यकारोँ की अमर रचनाओं से गुंथा हुआ था। सरकारी अधिकारियोँ और कार्यकर्ताओं की टोलियाँ विनम्रता व सम्मान के साथ सेवा परोसती दिखीं। संख्या की दृष्टि से भी यह सम्मेलन संभवत: सबसे बड़ा सम्मेलन होगा । विदेशों में जहाँ पांच-सात सौ लोग होते हैं तो यहाँ उससे दस गुना लोग थे। कोई सभागार, कोई परिसर इन्हें कहाँ समेट सकता था। इसलिए लाल परेड मैदान को एक विशाल सभा परिसर का स्वरूप प्रदान किया गया था। सुरक्षा ऐसी कि पंछी तक पर न मार सके, खातिरदारी ऐसी कि जैसे बारातियों की होती है। स्वयं मुख्यमंत्री व्यवस्था को इस प्रकार देख रहे थे जैसे बारात में लड़की का पिता काम करता है। उस पर भव्यता स्वच्छता और संयोजन भी उत्कृष्ट था । मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान दिन रात इसके आयोजन मेँ लगकर पूरे समय व्यक्तिगत तौर पर इस पर ध्यान दे रहे थे। इस सम्मेलन में सरकार ने आवाभगत, भव्य आयोजन करके और देश और प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत कर जिस प्रकार देश-विदेश के प्रतिनिधियों व अतिथियों को लुभाया उससे राज्य सरकार ने सम्मेलन के बहाने राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने का कार्य भी कुशलतापूर्वक किया है।

12032173_922535517801540_4820242081049134582_n पहले ही दिन भारतDSCN7857 के प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में पधारकर राजभाषा हिंदी के प्रति अपने सरोकार प्रकट  कर दिए और अपने ओजस्वी भाषण के माध्यम से हिंदी को उचित स्थान दिलवाने का निश्चय भी  प्रकट कर दिया था। प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, गृहमंत्री, गृह राज्यमंत्री, विदेश राज्य मंत्री, सूचना  प्रौद्योगिकी मंत्री, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री, तीन राज्यपाल और अनेक सांसद और विधायकों  सहित हिंदी के लिए देश और राज्य सरकार के तमाम बड़े चेहरे पूरी तन्मयता से लगे थे। समापन में तो  हरियाणा और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी मौजूद थे। स्वयं मुख्यमंत्री एक सत्र की संगोष्ठी संचालक के  रुप मेँ तीनों दिन एक कुशल संगोष्ठी-संचालक के रूप में विद्वानों और प्रतिभागियों के विचार व  सुझाव सुन रहे थे।

 मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भाषण तो प्रभावमय था ही समानान्तर प्रशासन सत्र  में स्वयं बैठकर एक कुशल संगोष्ठी संचालक के रूप में भी उनकी भूमिका प्रभावी व महत्वपूर्ण थी। वे  प्रतिनिधियों और विद्वानों के विचार सुनने व सभी को अवसर देने के लिए प्रयासरत थे और शायद सर्वाधिक प्रतिनिधियों ने अपनी बात रखी। उन्होंने सम्मेलन के दौरान बार - बार यह संकल्प व्यक्त किया कि वे सम्मेलन मेँ लिए गए सभी निर्णयों को अपनी राज्य मेँ लागू करेंगे। इससे सम्मेलन में पधारे प्रतिनिधियों का उत्साह तो बढ़ ही रहा था अन्य मंत्रियों व नेताओं को भी संदेश जा रहा था । निश्चय ही हरियाणा  और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री तक भी संदेश पहुंचा होगा और कुछ वैसा ही वहाँ भी होने की आस तो पैदा होती है। 
पहली बार ऐसा हुआ विभिन्न सत्रों में लिए व दिए गए सुझाव सम्मेलन मेँ ही निष्कर्ष रुप मेँ और सिफारिश रुप मेँ प्रस्तुत किए गए और उन्हें लागू करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया। अंत मेँ भारत के गृह मंत्री ने आगे बढ़कर यह कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए । उन्होंने यह संकल्प भी व्यक्त किया कि जिस प्रकार योग दिवस के लिए विश्व के विभिन्न देशों का समर्थन प्राप्त किया गया है, उसी प्रकार हिंदी के लिए भी समर्थन जुटाने के प्रयास किए जाएंगे। निश्चय ही सार्थकता की दृष्टि से भी यह सम्मेलन बाकी सम्मेलनों से काफी आगे दिखाई देता है। सभी पक्षों में सबसे आगे होने के चलते 10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन भुलाए न भूलेगा ।
पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में काका साहेब कालेलकर ने हिंदी को सेवा की भाषा बनाने की बात कही थी लेकिन अब तक के प्राय: सभी विश्व हिंदी सम्मेलन मुख्यत: साहित्य पर ही केंद्रित रहे और तमाम सेवाएं, सुविधाएँ, वाणिज्य-व्यापार और शिक्षा व रोजगार अंग्रेजी की तरफ जाता रहा । इस सम्मेलन में सरकार ने इस विषय पर भी भरपूर ध्यान दिया और गंभीरता से चर्चा की गई । कुछ लोगों को यह कहते सुना गया कि भाषा को महत्व देकर साहित्यकारों की उपेक्षा की गई है। पर विचार की बात तो यह है कि भाषा पिछड़ेगी तो उस भाषा का साहित्य कैसे आगे बढ़ेगा और दूसरी बात यह कि साहित्य भाषा का घटक है न कि पर्याय। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस सम्मेलन में भी सम्मान तो अधिकांशतः साहित्यकारों को ही दिए गए हैं। दो –एक अपवाद छोड़ दें तो हिंदी के लिए संघर्षरत लोग तो इस बार भी सम्मान के मंच पर कुछ दिखे नहीं। पर निश्चय ही भोपाल में आयोजित 10वां विश्व हिंदी सम्मेलन पूर्णतः संतुलित था और सही राह पर लौटता दिखाई दिया।                                                                  DSCN7790DSCN7837
जिस प्रकार एक-एक सुझाव को भारत सरकार व राज्य के मंत्रियों, प्रतिनिधियों और स्वयं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गंभीरता से लिया है, निश्चय ही यह ऐतिहासिक था। दूसरे दिन रात्रि मेँ भाषा को लेकर जो सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया वह अकल्पनीय, अविस्मरणीय और जिन्होंने नहीं देखा उनके लिए अविश्वसनीय था। सम्मेलन के आयोजन में लगे मध्यप्रदेश के आई.ए.एस. अधिकारी, सांस्कृतिक सचिव और हिंदी साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव की भूमिका विशेषकर महत्वपूर्ण थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जिस प्रकार आवाभगत की है चुन चुन कर व्यंजन ही नहीं अपना प्रेम भरोसा है उसे भुलाया नहीं जा सकता
DSCN7860 DSCN7825कुछ कमियाँ तो रही ही होंगी क्योंकि निर्णय लेने वाले और कार्य करने वाले तो आखिर इन्सान ही थे अपनी  खूबियों और खामियों के साथ । डॉ. वेद प्रताप वैदिक, डॉ. श्यामरुद्र पाठक और ऐसे अनेक लोग जो हिंदी के  लिए संघर्ष करते रहे उनकी कमी खली।
 लेकिन समग्रत: इस सम्मेलन के माध्यम भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार ने हिंदी-प्रेमियों के मन में  आशाओं का संचार किया है। भोपाल विश्व हिंदी सम्मेलन के माध्यम से सरकार ने हिंदी के प्रति अपनी  प्रतिबद्धता को जताया है और जनतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप इसे राष्ट्रभाषा के रुप मेँ अपनाने और  विभिन्न  क्षेत्रों मेँ, सेवा मेँ, सुविधाओं मेँ, सूचनाओं मेँ, शिक्षा मेँ इसका समावेश करने का संकल्प रखा है।  इस मंतव्य को  कार्यान्वित करने मेँ कितनी सफलता मिलती है यह तो वक्त ही बताएगा ।
 
                                                                                          डॉ एम.एल. गुप्ता’ आदित्य,’
(वैश्विक हिंदी सम्मेलन मुंबई)

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दसवां विश्व हिंदी सम्मलेन- उदघाटन समारोह 
 
सवां विश्व हिंदी सम्मलेन- सांस्कृतिक कार्यक्रम
 
 
सवां विश्व हिंदी सम्मलेन- सांस्कृतिक कार्यक्रम
 
 
दसवां विश्व हिंदी सम्मलेन- समापन समारोह

प्रस्तुत कर्त्ता
संपत देवी मुरारका
अध्यक्षा, विश्व वात्सल्य मंच
लेखिका यात्रा विवरण
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद

सोमवार, 28 सितंबर 2015

त्रिदिवसीय, “10वां विश्व हिन्दी सम्मेलन” का महाकुंभ भोपाल में आयोजित संपत देवी मुरारका – विश्व वात्सल्य मंच







































त्रिदिवसीय, “10वां विश्व हिन्दी सम्मेलन का महाकुंभ भोपाल में आयोजित

संपत देवी मुरारका – विश्व वात्सल्य मंच  

भारत के ह्रदय प्रदेश मध्य-प्रदेश की सुंदर राजधानी एवं सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं झीलों की नगरी  भोपाल में दिनांक 10-12 सितम्बर, 2015 तक त्रिदिवसीय 10 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन लाल परेड मैदान में विशेष रूप से बनाए गए माखनलाल चतुर्वेदी नगर के रामधारी सिंह दिनकर सभागार में भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी के द्वारा उद्घाटित किया गया | मोदीजी ने हिंदी के विशाल स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए अपने हिन्दी सीखने के माध्यम के रूप में अपना चाय बेचने का काम बताया | उन्होंने कहा कि दुनिया में हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है | हिन्दी की समृद्धि के लिए इसे अन्य भारतीय भाषाओं के साथ न केवल जोड़ने की प्रक्रिया चलानी चाहिए, बल्कि इसे निरंतर जारी भी रखना चाहिए |

इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, माननीय विदेश मंत्री व प्रवासी भारतीय कार्यमंत्री सुषमा स्वराज, मध्य-प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्यपाल श्री रामनरेश यादव, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरीनाथ त्रिपाठी, गोवा की राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद, झारखंड के मुख्यमंत्री श्री रघुवरदास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, गृह राज्य मंत्री डॉ. किरेन रिजिजू, मॉरीशस की माननीय शिक्षा व मानव संसाधन, क्षेत्रीय शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री श्रीमती लीला देवी दूखन-लछुमन, विदेश सचिव श्री अनिल वाधवा, प्रबंधन समिति के उपाध्यक्ष सांसद श्री अनिल माधव दवे तथा आयोजन के संकल्पक मंच पर अवस्थित हुए | मंच से हिन्दी का जयघोष सभी गणमान्यों के शब्दों में मुखरित रहा | सम्मेलन का शुभारंभ हिन्दी के स्तुति गान के साथ हुआ | मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री और अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र भेंट कर किया | श्री चौहान ने कहा कि जिस गुजरात से महात्मा गांधी ने हिंदी का जयघोष किया था, उसी गुजरात से आज श्री मोदी जी हिन्दी का मान बढ़ा रहे हैं | उन्होंने कहा कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा भी गुजरात से हुई थी | श्री मोदी हिन्दी बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने देश-विदेश में हिंदी का मान बढ़ाया है | यहाँ तक की संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा में भी हिन्दी को सम्मान दिलाया है | मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य-प्रदेश इस सम्मेलन के निष्कर्षों का पालन करेगा | उन्होंने कहा देश-विदेश से पधारे सभी हिंदी-प्रेमियों का साढ़े सात करोड़ मध्यप्रदेशवासियों की ओर से हार्दिक स्वागत, वंदन, अभिनन्दन | मुझे पूरा विश्वास है कि तीन-दिवसीय विश्व हिंदी सम्मेलन में मंथन
से जो अमृत निकलेगा, वह हमारी राष्ट्रभाषा को और अधिक पुष्पित-पल्वित करेगा | इसकी सुगंध चारों दिशाओं में और तीव्रता से प्रसारित होगी |

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने विश्व के 39 देशों से आये प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए हिन्दी को चैतन्य
भाषा बनाये रखने का आह्वान किया | इस अवसर पर उन्होंने समारोह के शुभंकर पर विशेष डाक टिकट
के साथ विश्व हिंदी सम्मेलन की स्मारिका, गगनांचल पत्रिका के विशेषांक और प्रवासी साहित्य जोहांसबर्ग
से आगे का लोकार्पण भी किया | इनका प्रकाशन विदेश मंत्रालय ने किया है | श्री मोदीजी ने बताया कि हिन्दी भाषा का आन्दोलन चलाने वाले ज्यादातर अग्रणी लोग अहिन्दी भाषी है, जैसे – सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, काका साहेब कालेलकर या राजगोपालाचारी हों, इन सबकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी | इसके साथ आचार्य विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारीजी आदि ने हिन्दी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए दीर्घ दृष्टि से काम किया है, वे हमें प्रेरणा देता है | उन्होंने आगे कहा कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे |

श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा कि दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन ऐतिहासिक साबित होगा | अभी तक जितने भी विश्व हिन्दी सम्मेलन हुए हैं वे साहित्य पर केन्द्रित थे | यह पहला ऐसा सम्मेलन है जो भाषा को समर्पित है | उन्होंने बताया कि पिछले नौ हिन्दी सम्मेलन साहित्य को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किये गये, जबकि यह सम्मेलन हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया गया है | सम्मेलन में ऐसे विषयों का चयन किया गया है जिनमें वर्त्तमान समय में हिन्दी भाषा के विस्तार की संभावनाएं हैं | संचार एवं सूचना, प्रशासन, सूचना प्रौद्योगिकी, विज्ञान और विदेश नीति ऐसे ही कुछ विषय है | इन सभी विषयों पर समानांतर सत्रों में चर्चा होगी और शोध पत्र भी प्रस्तुत किये जायेंगे | उन्होंने आगे बताया कि सम्मेलन को मध्य-प्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण यह है कि मध्य-प्रदेश हिन्दी के लिए समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिए जाना जाता है | अपनी बात जारी रखते हुए सुषमाजी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हिन्दी बोलने को प्रोत्साहित करने से हर नागरिक गौरव अनुभव करता है | इस सम्मेलन से श्री मोदी के प्रयासों को गति मिलेगी और हिन्दी को उचित स्थान और सम्मान मिलेगा |

इस अवसर पर पंजीकृत प्रतिभागी के तौर पर ब्लॉगर संपत देवी मुरारका तीनों दिनों के कार्यवाही की प्रत्यक्षदर्शी रही | अधिक संख्या में मॉरीशस से हिन्दी प्रेमियों का आगमन एवं संगोष्ठियों में सहभागिता रही | सम्पूर्ण देश से लगभग पांच हजार प्रतिनिधियों ने हिन्दी के इस महाकुंभ में अपनी सहभागिता निभायी | हैदराबाद एवं तेलंगाना राज्य के विश्वविद्यालयों से हिन्दी में शोध छात्रों की संख्या अधिक रही | हिन्दी प्रचार-प्रसार में जुटी संस्थाओं का भी प्रतिनिधित्व रहा | काकातीया विश्वविद्यालय के शोध छात्रों ने अधिकाधिक जानकारी एकत्र करने का कार्य किया | इस अवसर पर विभिन्न देश से आये हिंदी विद्वान और राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य उपस्थित थे | कार्यक्रम के अंत में विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने आभार व्यक्त किया |

इस सम्मेलन के मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर अन्दर प्रवेश करते ही विभिन्न साहित्यकारों की भाषा,
रचना एवं चित्रों की विशालता देखते ही बनता था | विभिन्न विषयों पर 16 सत्रों में चर्चा हुई | कई सत्रों में हिंदी की विभिन्न समस्याओं पर चर्चा की गई | भाषा पर केन्द्रित सत्रों का आयोजन प्रमुख रहा | अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय (भोपाल), महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा), भारतकोष, वेबदुनिया (इंदौर), राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (भारत), केन्द्रीय हिन्दी संस्थान (आगरा), एप्पल, माइक्रोसाफ्ट, गूगल, सीडैक आदि प्रौद्योगिक प्रदर्शनीं एवं हिन्दी के काम-काज की विस्तृत जानकारी दी गई | ‘मध्य-प्रदेश: शब्द वैभव’ शीर्षक से एक अन्य प्रदर्शनी मध्य-प्रदेश प्रशासन द्वारा लगाईं गई जो मध्य के हिंदी परिदृश्य में उसके गौरवशाली इतिहास को दर्शाती है | हिंदी साहित्य में मध्य-प्रदेश के अनुपम योगदान को भी अत्यंत रोचक रूप से दर्शाया गया है |

सांस्कृतिक संध्या की मनोरम छटा बिखेरते हुए असम के बिहू नृत्य एवं गुजरात के सूरत, भावनगर, भरूच में बसी अफ्रीकी जनजातीयों ने मनोरम सिद्दीगौमा नृत्य प्रस्तुत कर समां बाँध दिया और हिन्दी प्रेमियों को मन्त्र-मुग्ध कर दिया | सभागार में नृत्य छटा के दौरान भारत के लघु रूप के दर्शन देखने को मिले | कार्यक्रम में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण हर कोने की संस्कृतियों की झलक देखने को मिली | सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में कश्मीर के रूफ नृत्य ने, केरल के कलारीपयट्टू नृत्य ने, पश्चिम बंगाल का पुरूलिया छाऊ नृत्य ने तथा ‘महिषासुर का वध’ ने अच्छाई की जीत का सन्देश देकर दर्शकों का मन मोह लिया | दुसरे दिन शुक्रवार 11 सितंबर को कई रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई | मृदुला पहाड़ी के नृत्य निर्देशन में इस नृत्य वाटिका को 200 कलाकारों ने प्रस्तुत किया | अद्भुत प्रस्तुति वाला यह कार्यक्रम 58 मिनट तक चला | रंगारंग प्रस्तुतियों की श्रृंखला में भील जनजाति का भगोरिया नृत्य, बैगा जनजाति का घोड़ी पेठाई नृत्य, कोरकू का गदली नृत्य, निमाड़ का गणगौर और काठी नृत्य, मालवा का मटकी नृत्य, बुंदेलखंड का बरेदी बघेलखंड का अहिराई नृत्य ख़ास आकर्षण का केंद्र बना रहा | उत्सव में कलाकारों की वेशभूषा और हर प्रस्तुति को चार-चाँद लगाती रोशनी दर्शकों का मन मोह लिया |

समापन में गृहमंत्री राजनाथ सिंह पधारे | सत्र विषयों पर दी गई अनुशंसाओं की प्रस्तुति तथा विद्वानों को विश्व हिन्दी सम्मान से नवाजा गया | यात्रा क्रम-तृतीय भाग, मध्य-प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराजजी सिंह चौहान, मॉरीशस सरकार की मानव संसाधन मंत्रीजी सुश्री लीला दुखन, श्रीमती सरिता बुद्दू, अशोक चक्रधर, स्नेह ठाकुर, उषा राजे सक्सेना, ललित शर्मा, ओम थानवी, प्रभाकर श्रोत्रियजी एवं अन्य कई गणमान्य साहित्यकारों को संपत देवी मुरारका द्वारा भेंट की गई | अंत में यह सम्मेलन साहित्य केन्द्रित न होकर भाषा एवं तकनीक केन्द्रित रही | इसमें बी.जे.पी. का वर्चस्व झलकता रहा | हाँ कुछ उपयोगी भाषण भी हुए | सम्मेलन से उभर कर एक बात सामने आयी कि हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने की विकलता तो है किन्तु अपने ही देश के वनवास से इसे राजगद्दी पर कब बिठाया जाएगा | यानी यह सम्पूर्ण देश की भाषा कब बनेगी | इतने वर्षों बाद एवं 10 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन समाप्त करने के पश्चात भी हम अपने हिन्दी को नहीं अपना पा रहे हैं | अपने अंतर से नहीं स्वीकार पा रहे हैं | इसका निदान निकलना चाहिए |
प्रस्तुति: संपत देवी मुरारका 

संपत देवी मुरारका
लेखिका यात्रा विवरण एवं ब्लॉगर
अध्यक्षा विश्व वात्सल्य मंच
मीडिया प्रभारी
हैदराबाद